सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 171

परिणाम / 169
यतीन्द्रनाथ का शरीर अबसन्न होकर गिर पड़ा, प्यास से उनका गला सूख गया
था । डूबती आवाज में उन्होने कहा, "पानी ! " बालक मनोरंजन के शरीर से
उस वक्त रक्त-धारा बह रही थी । किन्तु नेता की इस अन्तिम आकांक्षा को पूर्ण
करने के लिए वह उस समय भी पास के जलाशय से चादर भिगोकर पानी लाने
के लिए चल पड़ा । इस दृश्य से पुलिस के साहब भी पिघल गए । वे मनोरंजन
से बैठने को कहकर कोई बर्त्तन न होने से अपनी टोपी में ही जल भरकर मरते
आदमी के मुंह में डालने लगे । गले में पानी पहुँचने पर यतीन्द्रनाथ के मुंह से
बात निकली, उस समय स्निग्ध मधुर हँसी हँसकर वे साहब से बोले, "इस मामले
में मैं ही अकेला उत्तरदायी हूँ, इन मेरे साथियों ने मेरे आदेश का ही पालन
किया है ।" यतीन्द्रनाथ ने कटक के अस्पताल में प्राण-त्याग किया । मनोरंजन
और नीरेन्द्र को फांसी हुई । ज्योतिष को आजन्म कालेपानी की सजा मिली ।
यही ज्योतिषचन्द्र बच गए थे, इसी से उनके पास से यह सब संवाद पाकर आज
हम देशवासियों को दे सके हैं । अण्डमन जेल मे नाना रूप निर्यातन्रों को सह न
सकने से ज्योतिषचन्द्र वही पागल हो गए थे । आजकल सुना है वे बहरामपुर के
पागलखाने में रहते हैं ।¹
मृत्यु की गोद में बैठे हुए, कटक के फांसी-घर के अंधेरे कोने से मनोरंजन
और नीरेन्द्र ने जो अन्तिम चिट्ठी कलकत्ते भेजी थी, उस अतीत की स्वप्नमय
कहानी प्रकाशित करते हुए छाती मे कैसे-कैसे स्पन्दन अनुभव होते हैं ! उन्होने
लिखा था—
“चित्तप्रिय और दादा (भैया) चले गए, हम भी जाते है । आशा है आप लोग
पहले की तरह काम चलाएँगे । भगवान् आप लोगो को सफलता दान करेंगे ।
आज हमारे जीवन की विजयदशमी है । अलविदा ! अलविदा ! जो चले गए
उन्हें लौटा लाने का कोई उपाय नही । किन्तु ज्योतिष की मुक्ति के लिए क्या
करना चाहिए, यह उनके स्वदेशवासी ही निश्चय कर सकेंगे ।”
इस चिट्ठी के प्रसंग से एक और चिट्ठी की बात याद आ गई । जैन-
धर्मावलम्बी होते हुए भी उन्होने कर्त्तव्य की खातिर देश के मगल के लिए सशस्त्र
विप्लव का मार्ग पकड़ा था । 'निमेज'² के खून के अपराध में वे भी जब फांसी की
कोठरी में क़ैद थे, तब उन्होने भी जीवन-मरण के वैसे ही सन्धिस्थल में अपने
विप्लव के साथियों के पास जो पत्र भेजा था, उसका सार कुछ ऐसा था, “भाई,
मरने से डरे नहीं और जीवन की भी कोई साध नही है; भगवान् जब जहां जैसी
अवस्था में रखेंगे, वैसी ही अवस्था में सन्तुष्ट रहेंगे ।” इन दो युवकों में से एक का

  1. पीछे फ़ारवर्ड में छपा था कि ज्योतिषचन्द्रपाल बहरामपुर के पागलखाने मे स्वर्गवासी हो
    गए ।
  2. निमेज के महन्त का वध सन् 1913 में हुआ था । रोलट कमेटी की रिपोर्ट के बिहार-
    उड़ीसा प्रकरण (आठवे अध्याय) मे उसका उल्लेख है ।