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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 408 में से

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पृष्ठ 166

164 / बन्दी जीवन
गिनती थी, इसी से इस गवर्नमेंट में जो कुछ जहर था, इन्हीं विप्लवियों पर
उसका प्रयोग किया गया। इसी से पंजाब के विप्लव आन्दोलन का पता लगते
ही भारत सरकार ने भारत के मंगल के लिए 'भारत-रक्षा-आईन' के समान
अत्यन्त कठोर शासन-प्रणाली जारी कर दी।
इतिहास में जो चिरकाल से होता आता है, भारत की बारी में भी उससे
उलटा नहीं हुआ। जब कोई पराधीन जाति जागने लगती है तब उस जागरण को
व्यर्थ करने के लिए ऐसी ही कठोर शासन-नीति जारी की जाती है। किन्तु जाति
जब सचमुच जाग उठती है तब संसार की कोई भी कठोर नीति उस जागरण को
व्यर्थ नहीं कर सकती, वरन् इस तरह की कठोर दमन-नीति के द्वारा जाति की
केवल शक्ति-परीक्षा होती है। जाति में यदि सचमुच प्राणों की कुछ शक्ति हो
तो यह सब कठोरता जागृति की रुकावट न होकर सहायक हो जाती है। इसी
से जागरण के दिन राजकोप को वास्तव में कोप न समझकर भगवान् का अनुग्रह
समझना उचित है। भारत के विप्लवियों ने भी सचमुच कभी भी इस दमन-
नीति के लिए अंग्रेजों को दोषी नहीं ठहराया, प्रत्युत वे तो यह सोचते थे कि
इन सब कठोरताओं में से गुजारकर भगवान् हमें जाति को पुनरुज्जीवित करने
के लिए आह्वान करते हैं। वे जानते थे कि पराधीन जाति का स्वाधीनता-प्रयास
इन सब कठोरताओं में से गुज़रकर ही सार्थक होता है। सभी दमन-नीति मानो एक
प्रकार के मीलों के पत्थर (Milestone) हैं। कौन पराधीन जाति स्वाधीनता
प्राप्ति के पथ में कितनी आगे बढ़ी है यह सब दमन-नीति ही मानो उसका
परिचय देती है, भारतीय विप्लववादी यही विश्वास करते थे। इसी विश्वास के
कारण वे सब दुःख-लांछनाएँ प्रफुल्ल-वदन से सह सके, प्राणों के बलिदान से ही
जाति में प्राणों का संचार होता है, इसी विश्वास से वे प्राणों की बलि देने से भी
घबराते न थे।
डिफेंस ऑफ़ इण्डिया ऐक्ट जारी होने के बाद से समरी ट्रायल्स (संक्षिप्त
मुकद्दमे) आरम्भ हो गए। बारी-बारी से पंजाब में तीन षड्यन्त्र केस चले। प्रत्येक
मामले में साठ-सत्तर आसामी थे। इन सब मुकद्दमों के फलस्वरूप पंजाब में एक
साथ अट्ठाईस व्यक्तियों को फाँसी हुई। मेरठ पलटन में ग्यारह व्यक्तियों को
फाँसी हुई, सातवीं राजपूत सेना में कई व्यक्तियों को सम्भवतः दिल्ली में फाँसी
हुई, जिन्हें फाँसी न हुई, उन्हें प्रायः सभी को कालापानी हुआ। ऐसी अवस्था
के बाद भी पंजाब के बचे हुए विप्लवियों के बीच फिर विप्लव की योजना चलने
लगी। कुछ अकाली दल इन सब क़ैदी विप्लवियों को जेल से छुड़ाने के इरादे
बाँधने लगे। सिक्खों के एक और दल ने अस्त्र-शस्त्र की ओर ध्यान दिया। उन
दिनों बड़े-बड़े रेलवे-स्टेशनों पर और बड़े-बड़े पुलों के नीचे हथियारबन्द सिपाहियों
का पहरा रहता था। एक बार विप्लवियों के एक छोटे-से दल ने, जान पड़ता है,
केवल सात-आठ व्यक्तियों ने मिलकर अमृतसर के पुल के सिपाहियों पर एकाएक
हमला कर दिया। वहाँ पंद्रह सिपाही, पंद्रह मैगजीन राइफ़लें और प्रायः सात