बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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नाम था मोतीचन्द और दूसरे का नाम था माणिकचन्द या जयचन्द ।
इन सब विप्लवियों के मत के तार ऐसे ऊँचे सुर में बँधे थे, जो प्रायः साधु
और फ़क़ीरों के बीच ही पाया जाता है। इन सब विप्लवियों के जो प्रतिपक्षी थे,
वे अंग्रेज भी अनेक बार दिल खोलकर इनकी प्रशंसा किए बिना नही रह सके।
उस जमाने के खुफ़िया विभाग के सर्वेसर्वा, आजकल कलकत्ता के पुलिस-कमिश्नर
मि० टेगार्ट ने, सुनते हैं, परलोक गत प्रतिष्ठित बैरिस्टर मि० जे० एन० राय को
यतीन्द्रनाथ के सम्बन्ध में कहा था, “Though I had to do my duties I
have great admiration for him. He was the only Bengali who
died in an open fight from a trench.” (यद्यपि मुझे अपना कर्त्तव्य
पालना पड़ा, पर मेरे दिल में उसके लिए बड़ा आदर है। वह एकमात्र बंगाली
था जो एक खुली लड़ाई में खन्दक से लड़ता हुआ मारा गया)।” किन्तु टेगार्ट
साहब ने जिस समय यह बात कही थी उसके बाद और भी अनेक बंगाली ऐसी
ही खुली लड़ाई में काम आए, उनका भी थोड़ा-सा परिचय पाठको को देता
हूँ ।
9 सितम्बर सन् 1915 को यतीन बाबू और उनके साथियों ने खुली लड़ाई
में प्राण दिए। किन्तु उसके बाद भी प्रायः 1918 तक विप्लवियों के अस्तित्व का
परिचय विशेष रूप से मिलता रहा। सन् 1916 के अन्तिम भाग में खुफिया
विभाग के डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट बसन्तकुमार चट्टोपाध्याय पर, जो इससे पहले दो
बार आश्चर्यमय तरीकों से बच गए थे, तीसरी बार विप्लवियों ने हाथ साफ़
किया। सन् 1917 में गोहाटी में विप्लवियों के साथ पुलिस का खंड-युद्ध
(skirmish) हुआ, और सन् 1918 में ढाका में फिर पुलिस के साथ विप्लवियों
का सशस्त्र मुकाबला हुआ, जिसमें विप्लवियों के दो व्यक्ति खेत रहे। पाबना मे
भी एक छोटी-मोटी मुठभेड़ हुई, इस सबके अलावा खून-डकैती तो जारी ही थी।
इन सब सशस्त्र मुठभेड़ों का थोड़ा-बहुत परिचय यहाँ देते हैं। सम्भवतः सन् 1916
में विप्लव दल की ओर से बिहार में विप्लववाद का प्रचार करने को वीरभूम के
नलिनी वाक्चि भागलपुर के कालेज में पढ़ने भेजे गए। कुछ ही दिन में इस
बंगाली पर पुलिस की नज़र पड़ गई। नलिनी पढ़ना छोड़कर फ़रार हो गए।
नलिनी छात्रवृत्ति पाने वाले अच्छे विद्यार्थी थे, पर छात्रवृत्ति के झंझट में कौन
पड़े ? नलिनी एकदम खालिस बिहारी बनकर बिहार के शहर-शहर में घूमने
लगे। कुछ दिन बाद फिर पुलिस की नज़र में पड़े। नलिनी बंगाल आए तब था
सन् 1917, बंगाल का उस समय बुरा हाल और टेढ़े दिन थे—चारों ओर थी घर-
पकड़, खाना-तलाशी, इण्टर्नमेण्ट (नज़रबन्दी), डिपोर्टेशन (देशनिकाला) और
गोलियों की बौछार ! इसी से बंगाल में रहना तब बेखटके न था। विप्लव दल में
तब यह फैसला हुआ कि दल के अच्छे-अच्छे कार्यकर्त्ताओं को आसाम के किसी
अच्छे स्थान में रिज़र्व फोर्स (सुरक्षित सेना) के रूप में रखा जाए। फलतः नलिनी
वाक्चि, नलिनी घोष, नरेन बैनर्जी और अन्य अनेक लोगों ने गोहाटी (आसाम)