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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 408 में से

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पृष्ठ 173

परिणाम / 171

में आकर आश्रय लिया । सोते समय उनके बिछौने के तले भरी रिवाल्वरें रहतीं
और उन्हीं में से एक-एक आदमी दो-दो घंटे के लिए पहरेदार के रूप में खिड़की
के नजदीक सावधानी से बैठा रहता। कलकत्ते की पुलिस ने किसी गिरफ्तार
विप्लववादी के पास से गोहाटी का संवाद पाकर, 9 जनवरी सन् 1917 को यह
मकान घेर लिया। पहरेदार ने पुलिस को आते देख सबको जगा दिया, पर
चुपचाप ही। रिवाल्वर और पिस्तोल हाथ में लेकर सभी बाहर आकर पुलिस
पर गोलियां दागने लगे। इस एकाएक आक्रमण से पुलिस छिन्न-भिन्न हो गई,
और इसी बीच विप्लवी भी पहाड़ की ओर खिसक गए, किन्तु तीसरे पहर
अनगिनत सशस्त्र पुलिस ने आकर सारी पहाड़ी के आस-पास घेरा डाल दिया।
दोनों ओर से गोली चली। बहुत-से घायल होकर पकड़े गए। इनमें से केवल दो
जन पुलिस की आँख बचाकर भाग सके। इन दो में से एक यही नलिनी थे। छः
दिन रास्ता चलकर पहाड़ पार होकर नलिनी लामडिंग स्टेशन पर आ पहुँचे ।
वह यात्रा क्या सीधी बात थी ? बगैर खाये और सोये प्रतिदिन चढ़ाई-उतराई पर
गोड़े तोड़ने पड़े थे। सदा पुलिस की नज़र से अपने को बचाते हुए, कभी वृक्ष पर
चढ़कर, कभी पहाड़ की चोटी पर--किसी चट्टान पर सोकर रात कटती थी।
बराबर तेज चाल से पहाड़ की चढ़ाई-उतराई में चलते-चलते हाथ-पैर की तलियों
मे दरारें पड़ गईं। फिर क्या केवल चलने का ही कष्ट था ? पहाड़ की एक किस्म
की चिपचिपी चिचड़ी नलिनी के माथे और पीठ में चिपट गई, अनेक तरह से
खींचने-छुटाने से भी वह नहीं छूटी। इस चिचड़ी का विष चढ़ जाने की पीड़ा से
जर्जरित होकर नलिनी एकदम बेहाल हो गए। अस्तु, मौत के साथ लड़ाई लड़कर
आसाम की पुलिस के हाथ से बचकर नलिनी बिहार आए; किन्तु वहाँ रहना
निरापद न था। यह देख वे फिर बंगाल चले आए। हावड़ा स्टेशन पर उतरकर
जिनके मिलने की आशा की थी उनमें से किसी को न देख पाया। संग में एक
रिवाल्वर था। कहाँ जाएँ ? पखवाड़े से अधिक हो चुका था जब से न खाना, न
सोना, न कोई और नियम रहा था, शरीर टूट चुका था, जहरीला कीड़ा तब भी
माथे और देह में चिपटा हुआ था, हावड़ा में ही नलिनी को तेज़ बुखार हो गया।
लाचार कोई उपाय न देखकर वे किले के मैदान के एक पेड़ के नीचे सो गए। मुर्दे
की तरह दिन-रात वही पड़े रहे। परले दिन दैवयोग से उनके एक परिचित
विप्लवी ने उन्हें देख लिया। उनके सब अंगों में उस समय चेचक के चिह्न दिखाई
दिए। कलकत्ते में विप्लवियों की अवस्था उस समय अत्यन्त शोचनीय थी, प्रायः
सभी विप्लवी पकड़े जा चुके थे। टका-पैसा तब किसी के हाथ में न था, दो-चार
जन जो बाकी थे वे भी तब क्षीण आशा के साथ इधर-उधर घूमते फिरते थे।
कलकत्ते की एक छोटी-सी कोठरी में उन्हें रखा गया। चेचक से उनकी आँखें
और मुँह ढक गए, जिह्वा अचल हो गई थी। तीन दिन तक बात करना भी बन्द
रहा। इस प्रकार पैसा पास न होने से चिकित्सा कराए बिना दिन काटते रहे। इस
मकान में उस समय केवल एक और विप्लववादी अपने-आपको छिपाये हुए थे।