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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 408 में से

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पृष्ठ 185

विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 183
रहे, यह सब क्या सच ही एकदम व्यर्थ हो गया ! क्षात्र शक्ति के आदर्श ने क्या
देश में कुछ भी प्रतिष्ठा नहीं पाई ? मरने का डर क्या भारतवासियों के मन से
कुछ भी दूर नही हुआ ? देश के अन्यान्य प्रकाश्य आन्दोलनों पर विप्लव आन्दोलन
क्या किसी तरह का भी प्रभाव नही डाल पाया ? वर्ल्ड पॉलिटिक्स (विश्व की
राजनीति) पर, संसार के सभ्य देशों में क्या भारत का यह विप्लवान्दोलन कुछ
भी छाया नही डाल सका ? अथवा इस विप्लवान्दोलन के कारण भारत का
गौरव जगत् की सभा में कुछ भी नही बढ़ा ? इस सम्बन्ध में हार्वर्ड विश्वविद्यालय
के प्रोफेसर ऐसर लिखित 'पैन-जर्मनिजम', बर्न हार्डी कृत 'जर्मनी एण्ड दि नेक्स्ट
वार' इत्यादि ग्रन्थों की ओर ध्यान देने का पाठकों से अनुरोध करता हूँ—इससे
वे मेरी बात का तात्पर्य बहुत-कुछ हृदयंगम कर सकेंगे ।
बहुत लोग कहते हैं कि विप्लवियों के कार्यों के कारण मंगल की अपेक्षा
अमंगल ही अधिक हुआ, अंग्रेज सरकार को इन विप्लवियों के कारण ही प्रजा-
पीड़न का अधिक सुयोग मिल गया है, इसी से नित्य नये-नये कठोर-से-कठोर
क़ानूनों के सहारे भारत के वैध खुले आन्दोलनो मे भी अंग्रेज सरकार अनेक
प्रकार से बाधाएँ डाल पाई है। पर सच बात कहें तो वैध प्रकाश्य आन्दोलन का
दमन होने के बाद से ही विप्लव का कार्य-कलाप प्रकाशित होने लगा है, और
रोलट कमेटी की सिडीशन रिपोर्ट मे अग्रेजो ने कदाचित् अनजान मे ही इस
प्रकार सब विषयों की आलोचना की है जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि विप्लवियों
के प्रत्येक उद्योग के कारण ही बारी-बारी अंग्रेज़ों ने भारत को राजनैतिक
अधिकार दिए हैं।
यह बात भी अवश्य ही बहुत लोग स्वीकार करते हैं कि भारत को जो कुछ
सामान्य राजनैतिक अधिकार मिले है वे मुख्यतः भारत के इन दृढ़चित्त विप्लवियों
के प्रयास से ही मिले हैं।
खैर, जो भी हो, विप्लवियो ने जो चाहा था वह तो नही हो पाया ; विप्लवी
देश को स्वाधीन करना चाहते थे, सो वे कर नही सके, विप्लवियों की मुख्य चेष्टा
व्यर्थ हुई ।
मैं समझता हूँ, चिन्तनशील प्रतिभावान् उपयुक्त नेता का अभाव ही इस
व्यर्थता का सबसे बड़ा कारण था। रूस या जर्मनी के विप्लव दल के बीच ऐसे
बहुत व्यक्ति हैं या थे, जो संसार के श्रेष्ठ चिन्तनशील व्यक्तियों मे आसन पाने
योग्य थे, किन्तु भारतीय विप्लव दल में ऐसे कोई भी चिन्तनशील शक्तिमान्
व्यक्ति न थे जिन्हें ठीक थिंकर (विचारक) कहा जा सके, इसी से भारतीय
विप्लव दल अपना प्रचार-कार्य, कहना चाहिए, कुछ भी नही कर पाया और
इसीलिए इस विप्लव दल का प्रभाव वैसा नही दिखाई दिया जैसा होना चाहिए
था। यह भले ही सच है कि भारत के इस विप्लववाद के अन्दर विवेकानन्द का
ज्वलन्त आदर्श वर्तमान था और भारतीय विप्लवियों में से अधिकांश इसी महा-
पुरुष की प्रेरणा से अनुप्राणित थे किन्तु विवेकानन्द के समान कोई भी प्रतिभा-