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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 408 में से

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पृष्ठ 181

विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 179.

कहते है, गुणातीत ब्रह्म का रूप-भेद सम्भव नही है, ब्रह्म ही एकमात्र वस्तु है,
और सभी अनित्य है, ब्रह्म के सिवाय और किसी वस्तु का यथार्थ रूप मे कोई
अस्तित्व नही है—आपातत. उनका होना प्रतीत होता है, पर वह भ्रममात्र है,
यही ब्रह्म माया है । यह माया कहाँ से आई और इस माया का स्वरूप क्या है ?
इस सम्बन्ध मे वे कहते है कि वह कहा नही जाता, वह अनिर्वचनीय है,—इसी से
वे ससार को भी अनित्य कहते है और इसी से उनके जीवन का श्रेष्ठ आदर्श रहा
है इस संसार को त्यागकर, ससार के रास्ते से दूर जाकर निर्जन मे, वन मे,
पर्वत मे, गुफा मे रहकर अर्थात् सन्यास लेकर तपस्या करना, भगवान् की
आराधना करना । ब्राह्मणो द्वारा परिचालित हिन्दू समाज का यही सनातन और
सर्वश्रेष्ठ आदर्श रहा है यह बहुतो की धारणा है, इस आदर्श को ही जो मानव-
समाज के सम्मुख श्रेष्ठ आसन पर प्रतिष्ठित करना चाहते है, वे ब्राह्मण्य धर्म के
पक्षपाती है, इसी आदर्श का मैने ब्राह्मण्य धर्म कहकर उल्लेख किया है। और
क्षात्र धर्म कहने से मेरा प्रयोजन उस आदर्श से है, जिस आदर्श मे इस नित्य नूतन
परिवर्तनशील जीव-जगत् को मिथ्या माया कहकर उड़ा नही दिया जाता, जिस
आदर्श मे इस जीव-जगत् को इस ससार को निर्गुण ब्रह्म से अभिन्न समझा जाता
है, जिस आदर्श की प्राप्ति के लिए इस ससार की अवहेलना न करके, इसका
त्याग न करके, इस ससार के भले-बुरे को, इष्ट-अनिष्ट को, हिंसा-अहिंसा को,
राग-द्वेष को समतुल्य समझकर इस भीषण सग्रामस्थल मे रहकर ही ब्रह्म ही
जीव-जगत् हुए है और इस जीव-जगत् मे जो कुछ भला या बुरा है वह सभी ब्रह्म
का ही स्वरूप है, इस सत्य की उपलब्धि करने के लिए सासारिक कर्म मे लिप्त
रहकर ही अर्थात् सासारिक कर्म के साथ ज्ञानयोग को युक्त करके, कर्मयोग के
पथ मे जो साधन करना होता है, उसको ही मै क्षात्र धर्म कहकर पुकारता हूँ ।
इन दोनो आदर्शों मे सचमुच तीव्र द्वंद्व रहा है। एक का आदर्श है बुद्ध और दूसरे
का आदर्श वही कुरुक्षेत्र के श्रीकृष्ण, एक का आदर्श है श्री चैतन्य और दूसरे का
आदर्श गुरु गोविन्द । एक के आदर्श का अनुसरण करने पर इस ससार को अनित्य
माया-ज्ञान कहकर इसकी अवज्ञा और अवहेलना करनी होती है और दूसरे
के आदर्श की प्राप्ति करने के लिए इस ससार को नित्य नये-नये रूपो मे सजाकर
पूजना होता है, युग-युग मे सृष्टि की उद्दाम प्रेरणा से उस संसार को तोड-फोडकर,
चूर-चूरकर फिर नये सिरे से गढकर खडा करना होता है। कभी ज्ञान के आलोक
मे जगत को उद्भासित करके, कभी खड्ग की धार से रक्त का स्रोत बहाकर,
पृथ्वी को रंगकर, कभी प्रेम के प्रवाह मे धरित्री सुन्दरी को स्नान करा के,
संसार के सौन्दर्य को अद्भुत कारीगरी के साथ विविध आभाओ मे अनेक रंगों
मे रंगीन, स्निग्ध और उज्ज्वल करके विस्मयकर बना डालना होता है ।
आदर्शों का यह सब द्वंद्व केवल वाक्चातुरी अथवा भाषा का द्वंद्व ही न था,
इस दल मे जिन्होने जिस आदर्श को श्रेष्ठ समझा, उन्होने उसी आदर्श के पीछे
सारा जीवन व्यतीत किया; इस प्रकार कितनो ने ही घर-बार छोड़कर सन्यास