बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ें178 / बन्दी जीवन
राष्ट्र का उसमें कोई हाथ न रहे—यही थी भारतीय विप्लवियों की दुराकांक्षा !
भारत की यह स्वाधीनता ब्रिटिश साम्राज्य के बीच रहकर किसी तरह भी
अक्षुण्ण नहीं रह सकती, बालक जिस प्रकार निःसंशय रूप से अपने माता-पिता
को पहचानता है, भारत के विप्लवी भी यह बात उसी प्रकार निःसंशय रूप से
जानते थे। इसी से भारतीय विप्लवियों की सब चेष्टाओं की जड़ में यह बात थी
कि भारत को इस प्रकार शक्ति सामर्थ्य-सम्पन्न कर दिया जाय जिससे वह
भारत-भिन्न सभी जातियों के हाथ से सब प्रकार से छुटकारा पा सके। इस
भारतेतर राष्ट्रों के समूह में अंग्रेज़ अपवाद नहीं हैं, वरन् साक्षात् रूप से इन
अंग्रेजों के साथ ही पहला संघर्ष आरम्भ होता है। कारण कि अंग्रेजों का ही
साक्षात् रूप से भारत की सब अभिलाषा-आकांक्षाओं और भारत के सब उद्यमों
के साथ घनिष्ठ रूप से संसर्ग है और वे लोग यह समझते थे कि भारत को इस
प्रकार स्वाधीन करने का सबसे मुख्य उपाय है, भारत की क्षात्र शक्ति को
जागृत कर देना—इस क्षात्र शक्ति के आदर्श को ही केन्द्र बनाकर हमारे विप्ल-
वियों ने अपनी सर्व कर्म-प्रचेष्टा को नियन्त्रित किया था। महात्मा गांधी का
भारत के राष्ट्र-क्षेत्र में आविर्भाव होने से बहुत पहले से ही हमारे विप्लवियों
को इस क्षात्र आदर्श और ब्राह्मण्य आदर्श के विषय में बहुत आलोचनाएँ और द्वंद्व
करने पड़े हैं। उन दार्शनिक आदर्शों का विचार और विश्लेषण करने की जगह
यहाँ नहीं है, समय और सुयोग मिलने पर किसी और जगह वह करने की
इच्छा है। तो भी, संक्षेप से यहाँ इस सम्बन्ध में केवल दो-चार बातें कह देना
बुरा न होगा। यथार्थ बात तो यह है कि ब्राह्मण्य आदर्श और क्षात्र आदर्श
में, सच-मच कहें तो, कोई भेद नहीं है, क्योंकि ब्राह्मण्य आदर्श की अंतिम
परिणति जहाँ होती है, क्षात्र आदर्श की भी अन्तिम परिणति ठीक वही होती
है। अर्थात् क्षत्रिय धर्मावलम्बी पुरुष जब प्रकृति-ज्ञान का अवलम्बन करके जीवन
को नियन्त्रित करते हैं तब उसका जो फल होता है, ब्राह्मण भावापन्न पुरुष भी
वैसे ही प्रकृति ज्ञान का अवलम्बन लेकर जीवन बिताएँ, तो उसका भी वही एक
ही फल होता है। अर्थात् यह जगत् ब्रह्म का ही प्रकाश है, और ब्रह्म ही कभी
सगुण और कभी निर्गुण रूप में अपना प्रकाश करते हैं, यह विश्व ब्रह्माण्ड जो नित्य
नये-नये रूपों में परिवर्तित होता है वह भी उसी ब्रह्म का ही सगुण प्रकाश है,
और जो अनिर्वचनीय है, जो मुंह से प्रकट नहीं किया जाता, जहाँ जाकर मन-बुद्धि
धक्का खाकर प्रवेश करने में असमर्थ होकर वापस लौट आते हैं, जिसे किसी भी
विशेषण से विशेषित नहीं किया जा सकता, अर्थात् जो ब्रह्म का ही निर्गुण स्वरूप
है—उस निर्गुण और सगुण ब्रह्म में यथार्थ में कोई भेद नहीं है, उस ज्ञान की
उपलब्धि करना ही ब्राह्मण्य और क्षात्र आदर्श का अन्तिम लक्ष्य रहा है। वेदान्त
के इस आदर्श का अनुसरण करें तो ब्राह्मण्य और क्षात्र धर्म में सचमुच कोई भेद
नहीं रहता, किन्तु वेदान्त के इस धर्म को सब लोग स्वीकार नहीं करते; भारत
के सब सम्प्रदाय यह बात नहीं मानते कि ब्रह्म का सगुण स्वरूप सम्भव है। वे