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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

करणे" -> ल, ङ्क, र, णे.
In line 28: "(५) अलङ्क" - wait, the ङ्क has a 'र' under it? "अलङ्क्र"? No, it's ङ्क.
Wait, is it "अलङ्कारे"? If it were "अलङ्कारे", it would have 'ा' after ङ्क. Is there an 'ा'? No!
Wait, could it be "अलङ्करणे"?
Wait, look at the right edge of line 28:
It ends with: "(५) अलङ्क" then a letter that looks like 'र' with something, maybe 'णे' is cut off or compressed?
Actually, looking closely at the image:
"(५) अलङ्क" -> wait, after ङ्क, there is 'रणे'?
Wait, look at the very edge:
It is: ( ५ ) अ ल ङ्क र [णे is cut off or very faint?]
Wait, let's zoom in on that exact spot:
Line 27 ends with: "कुमार-"
Line 28 ends with: "(५) अलङ्क..."
Wait, under "कुमार-":
The 'कु' is above '(४)'.
'मा' is above 'गुणे'.
'र' is above 'ओजः'.
'-' is above 'प्रसादादौ,'.

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ९
(१२ उपसर्गे क्रियायोगाश्रिते प्र-परादिरूपे, (१३) निपातेऽद्रव्यार्थके च-
वा-हेत्यादिरूपे, (१४) काले समये, (१५) देशे स्थानविशेषे, (१६) कुले
वंशपरम्परायाम्, (१७) व्रते नियमविशेषरूपे, (१८) तत्त्वे तत्त्वाख्याने
यथावद्वस्तुवर्णन इत्यर्थः, (१९) सत्त्वे सत्त्वस्यान्तर्बलस्य वर्णनायाम्,
(२०) अभिप्राये तात्पर्ये, (२१) स्वभावे प्रकृतौ, (२२) सारसंग्रहे निष्कृ-
ष्टार्थकथने, (२३) प्रतिभायां नवनवोन्मेषशालिबुद्धिरूपायाम्, (२४) अव-
स्थायां वयःक्रमे, (२५) विचारे विवेचनायां, (२६) नाम्नि संज्ञाभिधाने,
(२७) आशिषि आशीर्वादे । एतेषु च काव्याङ्गेषु व्यापि व्यापकं, जीवितं
जीवनमौचित्यमेव प्राहुर्मनीषिण इति भावः । एतद्ग्रन्थाशयमेव स्फोर-
यत्येतेष्विति । अयं भावः—कारिकोक्तं पदादिकमादायैव काव्यशरीरं
संपन्नं भवति । एवञ्च पदादिकं काव्यस्य शरीरस्य हस्तादिकमिव लब्धंश-
भूतम्, सकलतदंशव्यापिनस्तत्त्वस्यौचित्यस्यात्मत्वमुचितं न तु रसादे-
स्तस्य सकलतदंशव्यापित्वविरहात् । किञ्च काव्ये कारिकोक्तपदादि-
भिन्नोऽप्यंशः संभवति चेत् ? भवतु नाम, किन्तु मर्मभूता अंशास्त एव ।
तथा च यथा प्राणिशरीरगतमर्मस्थानेषु जायमानेनाघातेन प्राणोत्क्रमण-
क्रमेण जीवस्तच्छरीरं जहाति तथैव काव्यशरीरगतमर्मस्थलेषु पदादिषु
व्याघाते चमत्काराजननद्वारौचित्यं काव्यं परिहरति, येन तदकाव्यमेव
सम्पद्यते ॥ ८-१० ॥
औचित्य का क्षेत्र यद्यपि बहुत विस्तृत है, काव्य में ही नहीं अपितु लोक में
भी सब जगह औचित्य का ही साम्राज्य दृष्टिगोचर हो रहा है, फिर इसकी गणना
कर निश्चित संख्या बताना आसान काम नहीं है। तथापि दृष्टान्त के रूप में
ग्रंथकार ने सत्ताईस स्थानों का निर्देश किया है जो कि निम्नलिखित हैं :—
(१) पद, (२) वाक्य, (३) प्रबन्धार्थ, (४) गुण, (५) अलंकार, (६) रस,
(७) क्रिया, (८) कारक, (९) लिंग, (१०) वचन, (११) विशेषण, (१२) उपसर्ग,
(१३) निपात, (१४) काल, (१५) देश, (१६) कुल, (१७) व्रत, (१८) तत्त्व,
(१९) सत्त्व, (२०) अभिप्राय, (२१) स्वभाव, (२२) सारसंग्रह, (२३) प्रतिभा,
(२४) अवस्था, (२५) विचार. (२६) नाम, (२७) आशीर्वाद, अर्थात् काव्य के
मर्म के समान इन स्थानों में औचित्य की स्पष्ट प्रतीति होती है । सारांश यह है
कि जैसे प्राणि-शरीर के प्रत्येक अंश में व्याप्त तत्त्व का नाम आत्मा होता है,
उसी तरह काव्यशरीर के उक्त सभी अंशों में रहने वाले तत्त्व "औचित्य"

१० औचित्यविचारचर्चा
आत्म-संज्ञा प्राप्त करता है, और जैसे प्राणि-शरीर के मर्मभूत स्थानों पर आघात
होने से प्राण-निष्क्रमण द्वारा आत्मा शरीर को त्याग देता है, उसी तरह काव्य-
शरीर के मर्मभूत पूर्वोक्त स्थानों में किसी प्रकार की गड़बड़ी होने से औचित्य
काव्य का परित्याग कर देता है । फिर वह काव्य कहलाने का अधिकारी नहीं
रह जाता है ॥ ८-१० ॥
तेषूदाहरणानि क्रमेण दर्शयितुमाह—
तिलकं बिभ्रती सूक्तिर्भात्येकमुचितं पदम् ।
चन्द्राननेव कस्तूरीकृतं श्यामेव चान्दनम् ॥ ११ ॥
एकमेवोचितं पदं तिलकायमानं बिभ्राणा सूक्तिः समुचितपरभाग-
शोभातिशयेन रुचिरतामावहति ।
उपर्युक्तौचित्योदाहरणप्रदर्शनक्रमे प्रथमं पदगतौचित्यं विवेचयति-
तिलकमिति । कस्तूरीकृतं मृगमदविरचितं श्याममिति यावत्, तिलकमिव
विशेषकं, बिभ्रती धारयन्ती, चन्द्राननेव गौरवर्णनायिकेव, चान्दनं
श्रीखण्डद्रवकल्पितं धवलमिति यावत्, तिलकं, बिभ्रती, श्यामेव श्याम-
वर्णा कामिनीव च तिलकं तिलकवदाचरत्, एकमप्युचितं पदं किमुत
बहूनि पदानि, बिभ्रती, सूक्तिः काव्यरूपा वाक्, भाति शोभते, इत्यर्थः
वृत्त्यर्थः स्पष्ट एव ।
जैसे शरदिन्दुवदना सुन्दरी के ललाट पर कस्तूरीविरचित श्याम तिलक और
श्यामवर्णा कामिनी के भाल पर श्वेत चन्दन का एक भी टीका उनके सौन्दर्य में
चार चांद लगा देता है वैसे ही एक भी समुचित पद-पदान्तर की शोभा को
बढ़ाती हुई संपूर्ण सूक्ति ( काव्यात्मक वाणी ) में अपूर्व मधुरिमा का संचार कर
देता है ॥ ११ ॥
यथा परिमलस्य—
मग्नानि द्विषतां कुलानि समरे त्वत्खड्गधाराकुले,
नाथास्मिन्निति वन्दिवाचि बहुशो देव श्रुतायां पुरा ।
मुग्धा गुर्ज्जरभूमिपालमहिषी प्रत्याशया पाथसः,
कान्तारे चकिता विमुञ्चति मुहुः पत्युः कृपाणे दृशौ ॥
पदगतमौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा परिमलस्येति । मग्नानीति । हे देव
राजन् ! त्वत्खड्गधाराकुले त्वत्खड्गप्रवाहेणाकुले व्याप्ते, अस्मिन्
सद्योजाते, समरे युद्धे, द्विषतां शत्रूणाम्, कुलानि समूहाः, नाथ

स्वामिन् ! मग्नानि लीनानि, इति एवंभूतायां वन्दिवाचि वन्दिजन-
समुच्चारितवाण्यां, पुरा, बहुशोऽनेकवारं, श्रुतायामाकर्णितायां सत्यां,
मुग्धा सरलचित्ता, गुर्जरभूमिपालमहिषी गुर्जरभूमिपालस्य गुर्जरपृथिवी-
पतेः, महिषी राज्ञी, पाथसो जलस्य, प्रत्याशया पिपासामभिसान्त्वयितुम्,
आशाविशेषेण, कान्तारे वने, चकिता सती, पत्युः स्वामिनः, कृपाणे
खड्गे, दृशौ नेत्रे, विमुञ्चति प्रक्षिपतीत्यर्थः ।
पदगत औचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—यथा परिम-
लस्येति । मग्नानीति—जंगल में सरल हृदयवाली गुर्जर देश की सम्राज्ञी चकित
होकर अपने पति की तलवार को दोनों आँखों से देख रही है और कह रही है
कि—हे नाथ ! बन्दीजनों के मुख से पहिले मैंने अनेकों बार सुन रखा है कि युद्ध
में आपके तलवार की धारा के जल में शत्रुओं के झुंड के झुंड डूब गये हैं, परन्तु
अभी इसकी धारा के जल से मेरी प्यास क्यों नहीं बुझ पाती ? बेचारी रानी
इतनी भोली है कि उसे पता नहीं कि इस खड्गधारा को प्यास मिटाने की
क्षमता नहीं है, शत्रुओं को भले ही डुबा दे । यह पद्य गुर्जरराजविजेता किसी
राजा की स्तुति में किसी कवि के द्वारा कहा गया है ।
अत्र मुग्धापदेनौचित्यचमत्कारिणी सूक्तिः शरदिन्दुवदनेव श्याम-
तिलकेन श्यामेव शुभ्रविशेषकेण विभूषिता सकलकविकुलललामभूतां
विच्छित्तिमातनोति ।
अत्र अर्थौचित्यचमत्कारिणाभिधेयौचित्यचमत्कारप्रवणेन, मुग्धा-
पदेन मुग्धेतिपदप्रयोगेण, सूक्तिः, श्यामतिलकेन कस्तूर्यादिघटितकृष्ण-
बिन्दुना, विभूषिता, शरदिन्दुवदना शरच्चन्द्रानना गौरीति यावत्, इव,
शुभ्रविशेषकेण श्रीखण्डद्रवतिलकेन, विभूषिता, श्यामा श्यामवर्णा नायि-
केव च, सकलकविकुलललामभूतां समस्तसरसजनस्पृहणीयां विच्छित्तिं
चमत्कारस्, आतनोति विस्तारयतीत्यर्थः । कृपाणधारातः पिपासा-
शान्तिमिच्छन्त्याः गुर्जरराजमहिष्याः मुग्धेतिविशेषणतया प्रयोगं कुर्वाणः
कविः सम्पूर्णमपि पद्यं चमत्कारचर्चितमिवाकरोदिति सुतरां पदगतौ-
चित्यमत्रेति ।
उपर्युक्त पद्य में अर्थौचित्य के कारण चमत्कार को उत्पन्न करने वाले मुग्धा
( भोली ) पद के प्रयोग से यह सूक्ति श्याम तिलक से चन्द्रानना एवम् स्वच्छ
तिलक से श्यामा की तरह समस्त सरस सम्प्रदाय के हृदय में एक अपूर्व ही

१२ औचित्यविचारचर्चा
चमत्कार चमका देती है। तात्पर्य यह है कि जो गुर्जरराजमहिषी इतना भी
नहीं समझ पाती कि खड्गधारा से जलधारा की तरह प्यास नहीं बुझ सकती
उसके लिए मुग्धा पद का प्रयोग कितना वाञ्छनीय है, इसका अनुभव कोई
सहृदय ही कर सकता है।
न तु यथा धर्मकीर्तेः—
लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः क्लेशो महान्स्वीकृतः,
स्वच्छन्दस्य सुखं जनस्य वसतश्चिन्ताज्वरो निर्मितः ।
एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्वराकी हता,
कोऽर्थश्चेतसि वेधसा विनिहितस्तन्व्यास्तनुं तन्वता ॥
पदगतौचित्यं प्रदर्श्य सम्प्रति तदनौचित्यं प्रदर्शयितुमाह-नतु यथेति।
लावण्येति। कस्या अप्यलौकिककान्तिमय्याः कामिन्याः सौन्दर्यवर्णनेयम्।
लावण्यद्रविणव्ययो लावण्यं सौन्दर्यरूपमेव यद् द्रविणं द्रव्यन्तस्य व्ययो
न, गणितः संख्यातः, महानतिशयः, क्लेशो दुःखं तन्निर्माणे श्रम इति
यावत्, स्वीकृतोऽङ्गीकृतः, स्वच्छन्दस्य स्वतन्त्रस्य, सुखं वसतो निश्चिन्त-
तया सुखपूर्वकं तिष्ठतो निश्चिन्तजीवनं यापयत इति भावः, जनस्य
मानवस्य कृते इति शेषः, चिन्ताज्वरश्चिन्तारूपतापमयरोगविशेषो
निर्मितो रचितः । तुल्यरमणाभावादनुरूपप्रियतमाभावात्, एषापीयमपि
वराकी दुःखदग्धेति भावः, स्वयमेव नतु परेण हता नष्टा, (तर्हि) तन्व्याः
कृशाङ्गयाः, तनुं शरीरं, तन्वता सृजता, वेधसा विधात्रा, चेतसि
चित्ते, कोऽर्थः—कोऽभिप्रायः, विनिहितः स्थापित इति न जाने-इति शेषः।
पदगत औचित्य को दिखलाकर अभी तद्गत अनौचित्य को दिखलाने के लिए
कहा गया है—नतु यथेति। किसी अलौकिक कान्तिमयी कामिनी की प्रशंसा में
कवि कह रहा है कि विधाता ने इस तन्वी की शरीर-रचना कर अपने हृदय में
किस लाभ की आशा की थी पता नहीं, क्योंकि इसके निर्माण में सौन्दर्य-सम्पत्ति
का जो अपार व्यय हुआ उसकी तो गिनती ही नहीं की, ऊपर से परिश्रम भी
खूब ही करना पड़ा। इस तरह अपनी हानि तो हुई ही, साथ ही आज तक
स्वच्छन्द और सुखमय जीवन बितानेवाले पुरुषजाति के हृदय में कामिनी-जिज्ञासा
जगाकर चिंतारूप एक व्याधि की सृष्टि कर दी। इतना ही नहीं, अनुरूप
प्रियतम के अभाव में यह बेचारी खुद भी बेमौत मारी गयी। यदि ब्रह्मा के

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १३
इसके योग्य किसी पुरुष की रचना करने की क्षमता नहीं थी तो संसार में इस
तन्वी की सृष्टि कर लाभ क्या हुआ, यह वही जानें ।
अत्र "तन्व्याः" इति पदं केवलशब्दानुप्रासव्यसनितया निबद्धं न
काञ्चिदर्थौचित्यचमत्कारकणिकामाविष्करोति । "सुन्दर्याः" इत्यत्र
पदमनुरूपं स्यात् । अन्यानि वा निरतिशयरूपलावण्यव्यञ्जकानि ।
तन्वीपदं तु विरहविधुररमणीजने प्रयुक्तमर्थौचित्यशोभां जनयति ।
उपपादयति-अत्रेति । उपर्युक्तपद्ये "तन्व्याः" इतिपदं केवलशब्दानुप्रा-
सव्यसनितया केवलं 'तनुं तन्वता' इत्यत्रोक्तकारानुप्रासाग्रहितया,
निबद्धं योजितं, न काञ्चित् कामपि, अर्थौचित्यचमत्कारकणिकाम्
वाच्यौचित्यचमत्कारकणम्, आविष्करोति जनयति । अत्र तन्व्या
इति पदस्थाने सुन्दर्या इति पदम् अनुरूपं समुचितप्रयोगयोग्यं स्यात् ।
नन्वेवं छन्दोभङ्ग इति चेत्तत्राह—अन्यानीति इतराणि वा, निरतिशयरूप-
लावण्यव्यञ्जकानि विलक्षणरूपसोन्दर्यप्रतिपादकानि, प्रयोगयोग्यानि
स्युरिति शेषः । वस्तुतस्तु छन्दोभङ्गप्रसङ्गोऽकिञ्चित्करः । "कान्तामिमां
तन्वता" इत्येवं निर्माणे दोषाभावात् । तन्वीपदं तु विरहविधुररमणीजने
वियोगक्षामकामिनीलोके प्रयुक्तं सदर्थौचित्यशोभां वाच्यौचित्यचारुतां
जनयति । इह तु तदन्यथाप्रयुक्तमित्यौचित्यक्षयान्नितरां सहृदयहृदय-
हानिरिति बोध्यम् ।
उपर्युक्त पद में तन्वी शब्द का प्रयोग केवल तकारानुप्रास के आग्रह से किया
गया है । यथार्थतः यहाँ इसकी कुछ भी उपयोगिता नहीं है, क्योंकि दुर्बलता वियोग
का स्वाभाविक गुण है अतः इस पद का प्रयोग केवल विरहविधुर रमणीजनों
के लिए ही उपयुक्त हो सकता है । यहाँ तो कवि का अभिप्राय उत्कृष्ट सौन्दर्य
वर्णन से है फिर तो सुन्दरी, कान्तिमयी इत्यादि विलक्षण सौन्दर्यव्यञ्जक शब्दों
का प्रयोग ही उचित था ऐसा न करके कवि ने एक भारी भूल की है । इस एक
मात्र पद के अनौचित्य से पूरा का पूरा पद्य प्राणहीन-सा मालूम पड़ता है । यही
"तन्व्यास्तनुं तन्वता" की जगह यदि "कान्तामिमां-तन्वता" ऐसा पाठ कर दिया
जाय तब कान्ता पद से अनुरूप सौन्दर्य की अभिव्यक्ति के द्वारा औचित्य की रक्षा
हो सकती है ।

२४ औचित्यविचारचर्चा
यथा श्रीहर्षस्य—
परिम्लानं पीनस्तनजघनसङ्गादुभयत-
स्तनोर्मध्यस्यान्तः परिमलनमप्राप्य हरितम् ।
इदं व्यस्तन्यासं श्लथभुजलताक्षेपवलनैः,
कृशाङ्ग्याः सन्तापं वदति बिसिनीपत्रशयनम् ॥
तन्वीपदसमानार्थकस्य कृशाङ्गीपदस्यानुरूपप्रयोगं दर्शयितुमाह-यथा
श्रीहर्षस्येति । परिम्लानमिति—रत्नावलीनाटिकाप्रधाननायिकायाः
सागरिकाया विरहावस्थासूचकम् पद्यमिदम् । पीनस्तनजघनसङ्गात्
पीनयोः अतिस्थूलयोः, स्तनयोर्जघनयोश्च, सङ्गात्सम्पर्कात्, उभयत
उभयत्र, परिम्लानं शुष्कप्रायं, तनोः क्षीणस्य, मध्यस्य मध्यभागस्य,
परिमलनं सङ्घर्षणम्, अप्राप्य न लब्ध्वा, अन्तर्मध्ये, हरितं स्वाभाविक-
रूपेण हरिद्वर्णकमेव स्थितमित्यर्थः, स्तनयोर्जघनयोश्चात्युच्चत्वेनाधो-
मुखं शयानाया नायिकाया मध्यभागस्य शय्यासम्पर्कविरहितत्वेन तत्रत्य-
शय्यायाः स्वाभाविकत्वं सुतरां सम्भवतीति बोध्यम् । श्लथभुजलता-
क्षेपवलनैः श्लथे शिथिले ये भुजलते बाहुबल्लर्यौ, तयोराक्षेपवलनैराकुञ्चन-
प्रसारणैः, व्यस्तन्यासं व्यस्तो विपरीतो न्यासः स्थापनं यस्य तथाभूतम्,
इदं पुरोवर्ति बिसिनीपत्रशयनं कमलपत्रशय्या, कृशाङ्ग्यास्तन्व्याः,
सन्तापं विरहज्वरज्वालां वदति कथयति ।
तन्वी शब्द के समान अर्थ रखने वाले कृशांगी पद का समुचित प्रयोग
दिखाने के लिये कहा गया है यथा—श्रीहर्षस्येति । परिम्लानमिति यह श्लोक
'रत्नावली नाटिका' से उद्धृत किया गया है—इसमें लंकेशकुमारी सागरिका की
विरहावस्था का सजीव चित्र खींचा गया है । वत्सराज उदयन के विरह में
सागरिका विह्वल हो गयी है । अंग सूखकर कृश हो गये हैं, विरहज्वर की
ज्वाला से कहीं भी उसे शान्ति नहीं मिलती, जिधर ही आँखें फिरती हैं उधर
ही उद्वेजक दृश्य दीख पड़ते हैं । अतः अधोमुख होकर कमलदलकल्पित शय्या
पर पड़ी रहती है । इस स्थिति में परितापसूचक अन्य चिह्नविशेष के न रहने
पर भी उसके संताप के संबन्ध में किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं होती,
क्योकि वह कमलपत्र की बनी शय्या ( जिस पर वह सोई रहती है ) ही उसके
संताप को प्रकट कर रही है । कारण, उस शय्या के पार्श्वदेश ( दोनों बगल )
उच्च कुच तथा स्थूल जघनों के संपर्क से मलिन हो रहे हैं, पर शय्या का मध्य
भाग कृश मध्य-उदर-भाग के स्पर्श को न पाकर हरा-ताजा बना हुआ है और

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १५
इस शय्या की रचना तो सर्वत्र शिथिल बाहुवल्लरी के आकुंचन-प्रसारण से
अस्तव्यस्त हो ही गयी है। ऐसी शय्या को देखकर भी क्या किसी दर्शक को उस
पर लोटती हुयी कामिनी के संताप को समझने के लिये किसी से पूछने की
आवश्यकता पड़ सकती है ? कभी नहीं ।
अत्र सागरिकाया विरहावस्थासूचकं "कृशाङ्ग्याः" इति पदं परमौ-
चित्यं पुष्णाति ॥ ११ ॥
उपपादयन्नाहात्रेति । उक्तश्लोके, सागरिकाया लङ्केशकुमार्याः, विर-
हावस्थासूचकं वियोगस्थितिव्यञ्जकम्, "कृशाङ्ग्याः" इतिपदं, परमौ-
चित्यम् औचित्यस्य परां काष्ठां, पुष्णाति पोषयति ॥ ११ ॥
यहाँ पर लंकेशकुमारी सागरिका के लिये वत्सराज उदय के वियोग को
सूचित करने वाले कृशांगी पद का प्रयोग अत्यन्त समीचीन होने के कारण पाठकों
को अपूर्व आनन्द प्रदान करता है ॥ ११ ॥
वाक्यगतौचित्यं दर्शयितुमाह—
औचित्यरचितं वाक्यं सततं संमतं सताम् ।
त्यागोदग्रमिवैश्वर्यं शीलोज्ज्वलभिव श्रुतम् ॥ १२ ॥
औचित्यरचितं वाक्यं काव्यविवेकविचक्षणानामभिमततमम् ।
पदगतौचित्यं प्रदर्श्य सम्प्रति द्वितीयं वाक्यगतौचित्यप्रदर्शनायाह—
औचित्येति । औचित्यरचितम् औचित्याभिनिवेशपूर्वकं निर्मितं, वाक्यं
पदसमूहः, त्यागोदग्रं त्यागेन दानादिनोदग्रमुदात्तमैश्वर्यं, विभूतिरिव,
शीलोज्ज्वलं शीलेन सत्स्वभावेन, उज्ज्वलं प्रशस्तं, श्रुतं शास्त्रमिव, सततं
सर्वदा, सतां सज्जनानां, सम्मतमभिमतमभीष्टमित्यर्थः । अस्यैव निर्ग-
लितार्थमाह—औचित्यरचितमिति । औचित्यरचितं वाक्यं, काव्यविवेक-
विचक्षणानां काव्यालोचनचतुराणां, विदुषाम्, अभिमततमं निरतिशय-
मभीष्टमिति भावः ।
पदगत औचित्य को दिखाकर अभी क्रमागत द्वितीय वाक्यगत औचित्य
का प्रदर्शन करने के लिये कहा गया है—औचित्येति । जैसे दान आदि के द्वारा
संपत्ति की उदात्तता और दाक्षिण्यादि गुणों के द्वारा विद्या की उज्ज्वलता सज्जनों
के लिये विशिष्ट स्थान रखती है वैसे ही औचित्य को ध्यान में रखकर की गयी
वाक्यरचना काव्यालोचकों के लिये सर्वदा स्पृहणीय बनी रहती है । इसी
आशय को सीधे शब्दों में वृत्ति के द्वारा स्पष्ट किया है । औचित्यरचितमिति—

१६ औचित्यविचारचर्चा
औचित्य की मर्यादा से युक्त वाक्य-विन्यास काव्यालोचनचतुरों का अत्यन्त प्रिय
होता है ।
यथा मम विनयवल्ल्याम्—
देवो दयावान्विजयो जितात्मा यमौ मनः संयममाननीयौ ।
इति ब्रुवाणः स्वभुजं प्रमाष्टि यः कीचकालिककालदण्डम् ॥
धीरः स किर्मीरजटासुरारिः कुबेरशौर्यप्रशमोपदेष्टा ।
दृष्टो हिडिम्बादयितः कुरूणां पर्यन्तरेखागणनाकृतान्तः ॥युग्मकम्॥
वाक्यगतमौचित्यमुदाहर्तुमाह-यथा ममेति । देव इति । देवो युधि-
ष्ठिरः, दयावान् दयाशीलः, विजयोऽर्जुनः, जितात्मा विजितात्मव्यापारो
यमौ नकुलसहदेवौ, मनःसंयममाननीयौ मनसश्चित्तस्य संयमेन वशी-
करणेन, माननीयौ मानार्हौ, इति पूर्वोक्तरूपेण, ब्रुवाणः—कथयन्, यः
( भीमसेनः ) कीचकाकालिककालदण्डे कीचकाय तन्नामकनृपविशेषाय
विराटश्यालकायेति भावः, अकालिकमसामयिकं कालदण्डं कृतान्तल-
गुडमिव वर्तमानं, स्वभुजं निजबाहूदण्डं, प्रमाष्टि प्रमार्ज्यति, दयादि-
भिर्हेतुभिर्युधिष्ठिरादयः शत्रुशातने नितरामसमर्था इति स्वभुजस्यैव
संवलत्वेन तत्परिमार्जनमुचितमेवेति भावः । किर्मीरजटासुरारिः किर्मीरी
चित्रविचित्रा, जटा केशग्रन्थिर्यस्यैवंभूतो योऽसुरो राक्षसः, तस्यारिर्घातकः
कुबेरशौर्यप्रशमोपदेष्टा कुबेरस्य धनाधिपस्य, शौर्यस्य शूरतायाः, प्रशमस्य
विनाशस्योपदेष्टा, कुरूणां कौरवाणां, दुर्योधनादीनां, पर्यन्तरेखागणना-
कृतान्तः पर्यन्तरेखाया जीवनान्तलेखायाः, गणनायां संख्याने, कृतान्तो
यमराडिव वर्तमानः गुरुकुलविनाशकारक इत्यर्थः, हिडिम्बादयितः
हिडिम्बायास्तन्नामकासुरकन्यकायाः, दयितः प्रियतमो, धीरो गम्भीरो
स भीमसेनो दृष्टोऽवलोकितो लोकैरिति शेषः ।
वाक्यगत औचित्य के उदाहरणस्वरूप ग्रंथकार ने स्वरचित विनयवल्ली
नामक पुस्तक में से यह पद्य उद्धृत किया है । धर्मराज युधिष्ठिर अत्यन्त दयावान्
हैं, अर्जुन बलवान् होते हुए आत्मविजेता भी हैं, नकुल और सहदेव चित्तवृत्ति
के संयम में पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं, ऐसी स्थिति में इनलोगों के द्वारा
शत्रुसंहार असंभव है ऐसा कहता हुआ जिसने कीचक के लिये दूसरे यमदंड के
समान आचरण करने वाले अपने बाहुयुगलों को चढ़ाना शुरू कर दिया, किर्मीर

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १७
जटा वाले असुर विशेष का विघातक, कुबेर की वीरता का विनाशक, कुरुकुल की
जिन्दगी का अन्त करने वाला, हिडिम्बा का पति, अत्यन्त धैर्यशाली वह भीमसेन
देखा गया ।
अत्र भीमस्य भीमचरितोचितकीचकाकालिककालदण्डहिडिम्बाद-
यितादिभिः पदैरुन्निद्ररौद्रस्वरूपानुरूपो वाक्यार्थः सजीव इव भासते ।
अत्र पद्यद्वये भीमस्य युधिष्ठिरानुजस्य, भीमचरितोचितकीचका-
कालिककालदण्डहिडिम्बादयितादिभिः भीमचरित्रानुरूपतत्तद्विशेषणो-
पादानैरुन्निद्ररसानुरूपं उद्बुद्धरौद्ररसोचितो वाक्यार्थः सजीवः
प्राणवानिव, भासते शोभते । अत्रौचित्यस्य पदाधिकस्थितिमत्तया
वाक्यगतत्वमित्यवसेयम् ।
उपर्युक्त पद्यों में भीमसेन की प्रकृति के अनुकूल कीचकाकालिक कालदंड,
हिडिम्बादयित आदि पदों का प्रयोग रौद्ररस को जगाता हुआ सहृदयों के मानस-
पटल में अपूर्व आनन्द प्रदान करता है, जिससे पूरा का पूरा वाक्यार्थ सजीव के
समान प्रतिभासित हो रहा है । अनेक पदव्यापी होने के कारण ही यह वाक्यगत
औचित्य का उदाहरण हुआ ।
अथवा राजशेखरस्य—
सम्बन्धी पुरुभूभुजां मनसिजव्यापारदीक्षागुरु-
गौराङ्गीवदनोपमापरिचितस्तारावधूवल्लभः ।
सद्योमर्जितदाक्षिणात्यतरुणीदन्तावदातद्युति-
श्चन्द्रः सुन्दरि दृश्यतामयमितश्चण्डीशचूडामणिः ॥
वाक्यगतौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयत्यथवा राजशेखर-
स्येति । सम्बन्धीति । हे सुन्दरि ! पुरुभूभुजां पुरुवंशोद्भवराज्ञां, सम्बन्धी
सम्पर्क, पुरुवंशस्य चन्द्रत एवोत्पत्तिरिति तत्सम्बन्धः स्फुट एव । मनसि-
जस्य कामस्य, व्यापारस्य व्यवहारस्य, दीक्षायाः शिक्षणस्य, गुरुरुपदेष्टा,
उद्दीपकत्वादिति भावः । गौराङ्ग्या गौरवर्णायाः ( नायिकायाः ), वदन-
स्याननस्य, उपमया परिचितः, कामिनीमुखोपमाभूत इति यावत्,
तारा नक्षत्राण्येव वध्वः पत्न्यस्तासां वल्लभः प्रियतमः, सद्योऽचिरादेव,
मार्जितानां परिष्कृतानां, दाक्षिणात्यानां दक्षिणदेशोद्भूतानां, तरुणीनां
२ औ०

१८ औचित्यविचारचर्चा
युवतीनां, दन्तानां, याऽवदाता निर्मला द्युतिः शोभा, सेव द्युतिर्यस्य सः,
दन्तचन्द्रयोरुभयोरपि समुज्ज्वलत्वेन युक्तोपमेति बोध्यम्। चण्डीशस्य
शिवस्य, चूडाया मौलिग्रन्थेर्मणिभूषणमिव वर्तमानोऽयं लब्धोदयश्चन्द्रः
सुधांशुरितः पूर्वस्यां दिशि दृश्यतामवलोक्यतां त्वयेति शेषः।
आलोचक कवि राजशेखर के द्वारा रचित यह पद्य वाक्यगत औचित्य के
द्वितीय उदाहरण के रूप में उपस्थित किया गया है। सम्बन्धीति—नायिका को
अनुकूल बनाने के लिये उगते हुये चन्द्र को लक्ष्य कर नायक कह रहा है—अये
सुन्दरि ! देखो पूरब दिशा में चन्द्र उग आये हैं, जो कि भगवान् शंकर के
शिरोभूषण, तारातरुणी के तरुण प्रियतम और पौरवों के कुल के मूल ही नहीं,
अपितु कामकला के शिक्षक, गौरांगी के मुख की उपमा से परिचित, तथा
दाक्षिणात्यकामिनी के सद्योमार्जित धवल दन्तपंक्ति के समान स्वच्छ भी है।
अत्रापि चन्द्रमसः शृङ्गारान्तरङ्गैरनङ्गोद्दीपनैः पदैर्निर्वर्तितो वाक्यार्थः
सर्वथौचित्यसामर्थ्येन समुचितार्थवशेनार्थात्यर्थमत्यन्तमर्थनीयतां प्राप्तः।
अत्रापि चन्द्रमसः, शृङ्गारान्तरङ्गैः शृङ्गाराऽनुकूलैरनङ्गोद्दीपनैः कामो-
त्तेजकैः, मनसिजव्यापारदीक्षागुरुरित्यादिभिः पदैर्निर्वर्तितो निष्पादितो
वाक्यार्थः, सर्वथौचित्यसामर्थ्येन समुचितार्थवशेनार्थात्यर्थमत्यन्तमर्थनी-
यतामुपादेयतां, प्राप्तो गतः, चन्द्रमसो विशेषणीभूतैरौचित्यपोषकैः-
कियद्भिः पदैर्वाक्यगतौचित्यं पोष्यते इति भावः।
इस पद्य में भी शृङ्गाररसोद्दीपक् “मनसिजव्यापारदीक्षागुरुः” इत्यादि पदों
के द्वारा पूरे वाक्य का अर्थ औचित्य की महिमा से अत्यन्त उपादेयता को प्राप्त
कर गया है, अर्थात् चन्द्रमा के विशेषण में कहे गये समुचित पदों के प्रयोग से
पूरे वाक्य में औचित्य का आधान हो रहा है। इसलिये यह भी वाक्यगत औचित्य
का उदाहरण सिद्ध होता है।
नतु यथास्यैव—
नाले शौर्यमहोत्पलस्य विपुले सेतौ समिद्वारिधेः
शश्वत्खड्गभुजङ्गचन्दनतरौ क्रीडोपधाने श्रियः।
आलाने जयकुञ्जरस्य सुदृशां कन्दर्पदर्पे परं
श्रीदुर्योधनदोष्णि विक्रमपरे लीनं जगन्नन्दतु ॥

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १९
वाक्यगतौचित्यस्योदाहरणद्वयं प्रदर्श्य सम्प्रति तद्गतानौचित्यं प्रदर्श-
यितुमाह—नतु यथास्यैवेति। नाले इति। शौर्यं शूरतैव महत् विशदमुत्पलं
कमलं, तस्य, नाले दण्डस्वरूपे, समितो युद्धान्येव वारिधिः समुद्रस्तस्य,
विपुले महति, सेतौ बन्धरूपे, शश्वत्समन्तात्, खड्गः कृपाणः एव भुजङ्गः
सर्पस्तस्य कृते, चन्दनतरौ श्रीखण्डवृक्षे, यथा सर्पाणां चन्दनतरुरेवैक
बाश्रयस्तथैव खडगस्यापि दुर्योधनबाहुरेवैकमात्राधार इति भावः। श्रियो
लक्ष्म्याः सम्पत्तेरित्यर्थः, क्रीडोपधाने खेलोपबर्हरूपे, जयकुञ्जरस्य
विजयस्वरूपहस्तिन आलाने बन्धनसाधने शृङ्खलारूपे इत्यर्थः, सुदृशां
दीर्घलोचनानां, परमुत्कृष्टं यथा स्यात्तथा, कन्दर्पदर्पे मनसिजगर्वरूपे,
विक्रमपरे पराक्रमशालिनि, श्रीदुर्योधनदोषिण शोभाशीलदुर्योधनबाहौ,
लीनं निमज्जितं, जगत् संसारः, नन्दतु प्रसीदतु। अनेकविशेषणविशिष्ट-
श्रीदुर्योधनभुजच्छायायां विश्रान्तोऽयं समग्रः संसारः परमानन्दमासादय-
त्वित्यर्थः। एतेनैतद्बाहुदण्ड एव राजदण्डधारणक्षम इत्यपि सूचितम्।
वाक्यगत औचित्य के पूर्वोक्त दो उदाहरणों को दिखाकर अभी तद्गत
अनौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है—नतु यथास्यैवेति। अर्थात्
राजशेखर के इस श्लोक में अनौचित्य के कारण पूरा वाक्यार्थ ही उपहासास्पद
हो रहा है। नाले इति—महाराज दुर्योधन की पराक्रमशालिनी बाहु (जो कि
वीरता कमलिनी का नालदंडरूप, युद्ध-समुद्र का बांध रूप, खड्गभुजङ्गों के
लिये चन्दनवृक्षरूप, राज्यश्री का क्रीड़ोपधान (सिरहानी) रूप, विजयकुंजर
को वश में करने वाला श्रृंखलारूप, मृगलोचनाओं के लिये कामदेव के अखर्व
(गर्वरूप है) की छत्रच्छाया में विश्रान्त यह सारा संसार परमानंद को
प्राप्त करे।
अत्रातिशयपरकर्कशसोत्कर्षसुभटभुजस्तम्भस्यासमुचितेन कुवलय-
नालतुलाधिरोपणेन वाक्यार्थः सोपहासतयेव निबद्धः परिज्ञायते ॥ १२ ॥
अत्र पद्येऽतिशयेन नितरां, परस्मै शत्रवे, कर्कशः कठिनः, सोत्कर्ष
उत्कृष्टवीरतापादकः, सुभटस्य श्रेष्ठवीरस्य, यो भुजस्तम्भो बाहुदण्डस्त-
स्यासमुचितेनाननुरूपेण, कुवलयनालतुलाधिरोपणेन कोमलकमलदण्ड-
साम्यप्रतिपादनेन वाक्यार्थः सोपहासतयेवोपहासास्पदत्वेनेव निबद्ध-

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उल्लिखितः परिज्ञायतेऽवबुद्ध्यते । वीरोचिततादृशकठिनविशेषणविशिष्टे
दुर्योधनदोषिण कोमलकमलनालसाम्यप्रतिपादनं नितरामयुक्तमित्यभिम-
तवीररसाभिव्यक्तौ व्याघातः समुत्पद्यतेऽत एवानौचित्यात्सम्पूर्णमेव
वाक्यमुपहासास्पदमिति सारांशो वेदितव्यः ॥ १२ ॥
उपर्युक्त पद्य में वर्णित दुर्योधन की बांह में जहाँ उतने कठिन विशेषण
प्रयुक्त किये गये हैं वहाँ कोमल कमलनाल की समता का कथन अत्यन्त अनुचित
है, जिसने वीररस-बोधनरूप कवि का तात्पर्य अपुष्ट हीन होकर सहृदयों के
हृदय में उपहासास्पद भी प्रतीत होता है। इस लिये यह वाक्यगत औचित्य का
ज्वलंत उदाहरण सिद्ध होता है । ॥ १२ ॥
प्रबन्धार्थौचित्यं दर्शयितुमाह—
उचितार्थविशेषेण प्रबन्धार्थः प्रकाशते ।
गुणप्रभावभव्येन विभवेनेव सज्जनः ॥ १३ ॥

संस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता २१
वर्षोऽमृतवर्षं, तेन तद्रूपेणेति यावत्, समुचितार्थविशेषेणौचित्यानुप्राणि-
तार्थेन, महावाक्यं सर्गबन्धात्मककाव्यविशेषः, स्फुरद्भासमानमिव, चम-
त्कारितामलौकिकानन्दजनकतामापद्यते प्राप्नोतीति भावः ।
उपर्युक्त कारिका का ही तात्पर्य व्यक्त करने के लिये कहा गया है—
अम्लानेति । विलक्षण प्रतिभा के द्वारा उत्प्रेक्षित, संपूर्ण प्रबन्धार्थ को सुधाशीकर
के समान आप्लावित करने वाले अनुरूप अर्थ से महाकाव्य अत्यन्त स्पृहणीयता
को प्राप्त करता है, अर्थात् अलौकिक आनन्दजनक हो जाता है ।
यथा कालिदासस्य—
जातं वंशे भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां,
जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः ।
तेनार्थित्वं विधिपरवशाद् दूरबन्धुर्गतोऽहं
याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा ॥
प्रबन्धार्थगतौचित्यमुदाहर्तुमाह-यथा कालिदासस्येति । जातमिति ।
पुष्कराश्चावर्तकाश्चेति पुष्करावर्तकास्तत्तन्नामकमेघविशेषास्तेषां भुवन-
विदिते संसारप्रसिद्धे, वंशेऽन्वये, जातमुत्पन्नम्, एतेन मेघस्याभिजात्यम-
भिसूचितं, कामरूपमिच्छाधीनविग्रहं, मघोन इन्द्रस्य, प्रकृतिपुरुषं प्रधा-
नामात्यं, त्वां मेघं, जानामि परिचिनोमि, तेनोदात्तकुलप्रसूतत्वेन परो-
पकारकरणक्षमतया, दूरबन्धुः कान्तावियोगविधुरोऽहम् अनिर्दिष्टनामा
यक्षः, विधिपरवशाद्दैवयोगात्त्वयि तवाग्र इति भावः, अर्थित्वं याचकत्वं,
गत उपेतः । उत्तमजने याचनहेतुमाह-अधिगुण इति । अधिगुणेऽधिक
गुणशालिनि, याच्ञा याचना, मोघाऽसफलाऽपि, वरं श्रेष्ठम्, अधमे
नीचपुरुषे, लब्धकामा सफलापि, न श्रेष्ठेति भावः ।
प्रबन्धार्थगत औचित्य का उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है—जातमिति ।
प्रस्तुत पद्य महाकवि कालिदास के प्रबन्धकाव्य मेघदूत से लिया गया है । प्रिया
के वियोग से विधुर यक्ष मेघ के द्वारा अपनी प्रेयसी को संदेश भेजने का औचित्य
प्रदर्शित कर रहा है। हे मेघ ! पुष्कर और आवर्तक नामक महामेघ के उदात्त
कुल में उत्पन्न, देवेन्द्र के प्रधान पुरुष और कामनाानुकूल शरीर धारण करने वाले
तुमको मैं अच्छी तरह जानता हूँ । सत्कुलप्रसूत व्यक्ति पर-पीड़ा का आदर

२२ औचित्यविचारचर्चा
अवश्य करता है और वह सम्भवतः परोपकारी भी हुआ करता है, इसलिये मैं
विधिविडम्बनावश कान्तावियोगजन्य क्लेश को पाकर तुमसे सन्देश पहुँचाने की
याचना करता हूँ क्योंकि कापुरुष के द्वारा सफल की गयी याचना की अपेक्षा
सत्पुरुष के द्वारा विफल बनाई गयी याचना भी कहीं श्रेष्ठ है ।
अत्राचेतनस्य चेतनाध्यारोपेण मेघस्य दौत्ययोग्यताधानाय प्रथित-
पुष्करावर्तकपर्जन्यवंश्यत्वममात्यप्रकृतिपुरुषत्वञ्च यदुपन्यस्तं तेन समस्त-
प्रबन्धस्योत्प्रेक्षितेतिवृत्तप्रचिरतरस्य निरतिशयमौचित्यमुद्योतितम् ।
अत्राचेतनस्याप्राणिनश्चेतनाध्यारोपेण प्राणित्वारोपेण मेघस्य, दौत्य-
योग्यताधानाय दूतकर्मकारित्वस्थापनाय, प्रथितपुष्करावर्तकपर्जन्यवंश्य-
त्वं प्रसिद्धपुष्करावर्तककुलप्रसूतत्वम्, अमात्यप्रकृतिपुरुषत्वञ्चेन्द्रसचिवप्रधा-
नव्यक्तित्वञ्च, यदुपन्यस्तं यस्मात्प्रतिपादितं, तेन उत्प्रेक्षितं कल्पितं यदि-
तिवृत्तमितिहासस्तेन रुचिरतरस्य समस्तप्रबन्धस्य, निरतिशयमत्यन्तं यथा
स्यात्तथौचित्यमनुरूपत्वमुद्योतितं प्रकाशितम् ।
यहाँ मेघ के द्वारा ( जो कि चेतन न होकर एकमात्र जब पदार्थ है ) संदेश
पहुँचाने की कामना की गयी है, यह बात असंगत कही जा सकती थी, परन्तु खुद
यक्ष ने ही इसका भी परिहार कर दिया है, अर्थात् वंशगत उच्चता के साथ ही
मेघ में व्यक्तिगत महत्ता भी है । ऐसे व्यक्ति से पर-पीड़ा की अवहेलना की आशा
नहीं की जा सकती, इसलिये मेरा मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा । साथ ही अपनी
असफलता का भान भी उसे है ही, उसी के निराकरण के लिये अन्तिम पद के
द्वारा आत्मतोष कर रहा है । इस तरह अचेतन में चेतन का आरोप कर मेघ में
दूतकारिता की स्थापना करने के लिये वंशगत और व्यक्तिगत उच्चता का जो
वर्णन किया गया है उससे कल्पित इतिहास भी संगत प्रतीत होने लगता है, जिससे
सम्पूर्ण प्रबन्ध ही औचित्य से चमत्कृत हो उठता है ।
यथा वा भवभूतेः—
( नेपथ्ये )
योऽयमश्वः पताकेयमथवा वीरघोषणा ।
सप्तलोकैकवीरस्य दशकण्ठकुलद्विषः ॥
लवः—( सगर्वमिव ।) अहो सन्तापनान्यक्षराणि । भो, भोः !

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता २३

किमक्षत्रिया पृथिवी यदेवमुद्घुष्यते । ( विहस्य ) आः किं नाम स्फुरन्ति
शस्त्राणि । ( धनुरारोपयन् )
ज्याजिह्वया वलयितोत्कटकोटिदंष्ट्रमुद्गारिघोषघनघर्घरघोषमेतत् ।
ग्रासप्रसक्तहसदन्तकवक्त्रयन्त्रजृम्भाविडम्बिविकटोदरमस्तु चापम् ॥
प्रबन्धार्थगतौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणं प्रदर्शयितुमाह-यथा वा भव-
भूतेरिति । नेपथ्ये इति । रङ्गमञ्चपृष्ठभागगतप्रसाधनस्थाने इत्यर्थः !
योऽयमिति । अयं निकटस्थो योऽश्वो घोटकः, इयमेषा, विधेयभूतायाः
पताकाया वीरघोषणाया वाऽनुसारेण स्त्रीलिङ्गनिर्देशः, उद्देश्यविधेययो-
रैक्यमापादयत्सर्वनाम पर्यायेणान्यतरलिङ्गभागभवतीति नियमात्, सप्त-
लोकैकवीरस्य सप्तसु भूरादिषु लोकेषु भुवनेषु, एकवीरस्य मुख्यशूरस्य,
दशकण्ठकुलद्विषो रावणवंशविनाशकस्य रामचन्द्रस्येति यावत्, पताका
विजयध्वजः, अथवा वीरघोषणा पराक्रमसूचको डिण्डिमध्वनिरिति भावः ।
किं प्रयोजनोऽयमश्वः परिवृतः पर्यटति ? इति लवसहचरबटुगणकृतप्रश्न-
स्योत्तरमिदं पद्यमिति बोध्यम् ।
तच्छ्रवणानन्तरं लवस्य प्रतिक्रियां वर्णयति—लव इति। लवो वाल्मी-
केराश्रमे पाल्यमानो जानकीपुत्रः, सगर्वमिव साभिमानं यथा स्यात्तथा,
अहो खेदसूचकमव्ययमेतत् सन्तापनानि क्रोधजननद्वारा दाहकानि,
अक्षराणि योऽयमश्वः इत्यादीनीति भावः । भो भोः अरेऽरे अक्षत्रिया
क्षत्रिय ( वीर ) विहीना, पृथिवी मेदिनी, किमिति प्रश्ने, यदेवं येनैवं
प्रकारेण, उद्घुष्यते घोषणा क्रियते । (विहस्य हसित्वा) । आः शस्त्राण्य-
स्त्राणि, स्फुरन्ति विद्योतन्ते, किं नाम ? अश्वहरणार्थमुद्यतानामस्माकमुपरि
प्रहाराय सैनिकैः शस्त्राणि समुत्तोल्यन्ते किम् ? इति भावः । (धनुः कार्मुक-
मारोपयन्सज्जयन्) । ज्याजिह्वयेति । ज्या मौर्वी, सैव जिह्वा रसना तया
वलयिते वेष्टिते, उत्कटकोटी उग्राग्रभागावेव, दंष्ट्रे दशने यस्य तत्,
उद्गारिण उद्गच्छन्तः, घोरा भयानकाः, घनाः सान्द्राः, घर्घरघोषा घर्घ-
रेत्याकारक शब्दा यस्य तत्, एतत् मद्हस्तवर्ति, चापं धनुर्ग्रासे कवलने,
प्रसक्तं संलग्नमत एव हसत् उपहासमिव कुर्वत् यदन्तकस्य कृतान्तस्य,
वक्त्रं मुखं तदेव यन्त्रं तस्य; जृम्भाया व्यादानस्य, विडम्बि अनुकारि,

२४ औचित्यविचारचर्चा

अत एव विकटं भयानकम्, उदरं, यस्य तत् तादृशमिति भावः, अस्तु
जायताम् ।
प्रबन्धार्थगत औचित्य का ही द्वितीय उदाहरण दिखलाने के लिये भवभूति-
रचित उत्तररामचरित का एक अंश उद्धृत किया जाता है—नेपथ्ये इत्यादि ।
लंकाविजयानंतर अयोध्यावासी राम ने सीता-परित्याग के बहुत बाद में अश्वमेघ
यज्ञ करने की कामना से लक्ष्मणपुत्र चन्द्रकेतु की संरक्षकता मे यज्ञीय अश्व को
छोड़ा । वह अश्व घूमता हुआ जब वाल्मीकि आश्रम के निकट वन में पहुँचा,
तब वहाँ सीतातनय लव के साथ खेलते हुए बालब्रह्मचारियों ने अश्वरक्षक
सैनिकों से पूछा किस लिये सैनिकों से वेष्टित यह अश्व पर्यटन कर रहा है ?
इसी के उत्तर में नेपथ्य से सैनिक कह रहे हैं—योऽयमश्व इत्यादि । अर्थात्
यह जो अश्व आप देख रहे हैं वह सातों भुवनों में सर्वश्रेष्ठ वीर, रावणवंश-
विनाशक, रामचन्द्र की विजयपताका है, अथवा अतुल पराक्रमसूचक डिंडिम-
ध्वनि है ।
लवः ( सगर्वमिति )—उपर्युक्त घोषणा के द्वारा अन्य वीरों पर जो आघात
पहुँचाया गया था वह लव से सहा नहीं गया, उसकी स्वाभाविक वीरता जग
गयी, वह साभिमान बोला, अरे रे ! इस घोषणा के अक्षर तो बड़े ही क्लेशकर
हैं, अरे बकने वालो ! क्या पृथिवी क्षत्रियों से विहीन हो गयी जो तुम इस तरह
बोल रहे हो ? (फिर कुछ हँस कर) हमारे ऊपर प्रहार करने के लिये विपक्षियों
के शस्त्र चमक रहे हैं क्या ?—( धनुष को सम्हालता हुआ ) बोला - अपनी
प्रत्यञ्चारूपिजिव्हा से आवेष्टित, उन्नतकोटिरूप दांतों से युक्त और निकलते हुए
भयानक घने घर्घर शब्दों वाला, मेरा यह धनुष निगलने में तत्पर, हँसता हुआ
यमराज के यंत्ररूप मुख की जमुहाई की नकल करने वाला अतएव भयंकर उदर
( मध्यभाग ) वाला हो जाय ।
अत्रार्थे रामायणकथातिक्रमेण नूतनोत्प्रेक्षिता रामतनयस्य सहज-
विक्रमानुसारिणी शौर्योत्कर्षभूमिः परप्रतापस्पर्शासहिष्णुता प्रबन्धस्य
रसबन्धुरामोचित्यच्छायां प्रयच्छति ।
अत्रार्थे, रामायणकथातिक्रमेण रामायणकथापरित्यागेन, नूतनोत्प्रे-
क्षिता अतिनवीनविन्यस्ता, रामतनयस्य लवस्य सहजविक्रमानुसारिणी

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता २५
स्वाभाविकपराक्रमानुरूपिणी, शौर्योत्कर्षभूमिर्वीरताप्राचुर्यस्थानं, पर-
प्रतापस्पर्शासहिष्णुता परकीयतेजोऽसहनशीलता, प्रबन्धस्य सम्पूर्णकाव्यस्य,
रसबन्धुरां वीरादिरसस्पृहणीयाम्, औचित्यच्छायामौचित्यावरणं, प्रयच्छति
ददाति।
पूर्वोक्त अर्थ में यद्यपि रामायण कथा का अतिक्रमण करके एक नवीन ही
कथा की सृष्टि की गयी है, जो कि वास्तविक बात न होकर सर्वथा कविकल्पित
है, परन्तु फिर भी राम के पुत्र लव के लिये दूसरे के प्रताप को नहीं सह सकने
की जो स्वाभाविक वीरता का वर्णन किया गया है, उससे संपूर्ण प्रबन्ध एक
अनिर्वचनीय रसानुभूतिदायक औचित्य से आप्लावित हो उठा है।
नतु यथा राजशेखरस्य—
रावणः-यत्पार्वतीहठकचग्रहणप्रवीणे पाणौ स्थितं पुरभिदः शरदां सहस्रम्।
गीर्वाणसारकणनिर्मितगात्रमत्र, तन्मैथिलीक्रयधनं धनुराविरस्तु ॥
जनकः-आविरस्तु सममगर्भसम्भवया सीतया।
प्रबन्धार्थगतमनौचित्यं दर्शयितुमुपन्यस्यति—न तु यथा राजेति।
जानकीस्वयंवरे समुपस्थितस्य राक्षसाधिपतेः रावणस्योक्तिरियम्—
यदिति। पार्वत्या उमायाः, हठेन हठपूर्वकं, यत्कचग्रहणं केशस्पर्शः, तत्र
प्रवीणे दक्षे, पुरभिदः शंकरस्य, पाणौ हस्ते, यद्धनुः, शरदां सहस्रं सहस्र-
वर्षपर्यन्तं, स्थितमतिष्ठत्, गीर्वाणानां देवानां, सारस्य तत्त्वस्य अस्थ्या-
देर्वा, कणेन कणिकया, निर्मितं रचितं, गात्रं वपुर्यस्य तत् मैथिल्या
जानक्याः, क्रयस्य स्वायत्तीकरणस्य, धनं द्रविणस्वरूपं मूल्यरूपमिति
यावत्, तत् धनुः कार्मुकम्, अत्र सभास्थले, आविरस्तु प्रकटीभवतु।
इति रावणवचनश्रवणानन्तरं स्वयंवरस्य रचयिता महाराजो जनकः
कथयति—आविरस्त्विति। अगर्भसंभवयाऽज्ञातगर्भविभासकष्टया, स्वत
उद्भूतयेत्यर्थः, सीतया जानक्या, समं साकं, (तद्धनुः) आविरस्तु उप-
तिष्ठताम्।
प्रबन्धार्थगत अनौचित्य को प्रदर्शित करबे के लिये कविवर राजशेखर का
यह पद्य-उद्धृत किया गया है। इसमें सीतास्वयंवर में सम्मिलित राक्षसपति
रावण कह रहा है कि—जो धनुष पार्वती के केशपाश से हठपूर्वक खेलने वाले

२६ औचित्यविचारचर्चा
भगवान् शंकर के कर में हजारों वर्ष तक रह चुका है । देवताओं के तेज से
निर्मित जो कि अभी जनकतनया को खरीदने का मूल्य सा हो रहा है, वह
(धनुष) यहाँ प्रत्यक्ष होवे ।
रावण के इस वचन को सुनकर महाराज जनक ने भी कहा कि स्वतः उद्भूत
जानकी के साथ वह धनुष प्रगट होवे ।
अत्र 'आविरस्तु समं सीतया' इति जनकराजेन यदुच्यते तेनास्य
पिशिताशनाय तनयाप्रतिपादनमभिमतमिवोपलक्ष्यते । नचैतद्विद्मः कथं
भक्ष्यभूता कुसुमकोमलाङ्गी पुरुषादाय प्रतिपाद्यते, इत्यनौचित्येन प्रसिद्धं
वृत्तवैपरीत्यं परं हृदयविसंवादमादधाति ।
अत्र प्रकरणे सीतया सममाविरस्तु—इति जनकराजेन यदुच्यते, तेन
तत्कथनेन, अस्य जनकराजस्य पिशिताशनाय मांसभोजिने राक्षसाय
रावणायेत्यर्थः, तनयाप्रतिपादनं कन्याप्रदानम्, अभिमतमभीष्टमिवोप-
लक्ष्यते विज्ञायते । भक्ष्यभूता खाद्यभूता मानवा राक्षसानां खाद्या
भवन्तीति भावः, कुसुमकोमलाङ्गी पुष्पमसृणावयवा, पुरुषादाय नरभक्ष-
काय, कथं प्रतिपाद्यते किमर्थं प्रदीयते, एतच्च नैव, विद्मो जानीमः, इत्य-
नौचित्येनानुचिततया, प्रसिद्धं विख्यातं, वृत्तवैपरीत्यमितिवृत्तविरुद्धं,
परमत्यन्तं हृदयविसंवादं चित्तासदृशमादधात्युपस्थापयति ।
उपर्युक्त कथनोपकथन में राजा जनक के कथन से ऐसा प्रतीत होने लगता
है कि उस राक्षस को कन्या देना उन्हें जैसे अभिमत हो, पर नरभक्षक को
कुसुमकोमलांगी कन्या कैसे दी जा सकती है ? अतः इस उक्ति से वृत्तवैपरीत्य—
अर्थात् इतिहासप्रसिद्धि विपरीत स्थिति (जो अनौचित्यरूप में प्रसिद्ध है) की
अत्यधिक हृदयासहमति को उपस्थित करता है ।
यथा वा कालिदासस्य—
ऊरुमूलनखमार्गपंक्तिभिस्तत्क्षणं कृतविलोचनो हरः ।
वाससः प्रशिथिलस्य संयमं कुर्वतीं प्रियतमामवारयत् ॥
प्रबन्धार्थानौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणं प्रदर्शयितुं पार्वतीपरमेश्वरयोः
सम्भोगवर्णनप्रसङ्गे कालिदासेन निर्मितं पद्यमिदं कुमारसंभवस्याष्टम-
सर्गादुद्धृत्येहोपस्थापयन्नाह—यथा वा कालिदासस्येति । ऊरुमूलेति, तत्क्षणं

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता २७
प्रातःकालीनवायुसेवनकाले, ऊरुमूले जघनारम्भे, स्थितानां नखमार्गाणां
नखक्षतानां, याः पङ्क्तयो राजयस्ताभिर्हृते वशीकृते विलोचने नयने
यस्य सः, हरस्य कर्त्रंशे नित्यसाकांक्षत्वेन "देवदत्तस्य गुरुकुलम्" इति
वत्समासः ।
हरः शङ्करः, प्रशिथिलस्य जघनमूलात्सर्वथा भ्रष्टस्य, वाससो वसनस्य,
संयमं यथास्थानन्यासं, कुर्वन्तीं विदधतीं, प्रियतमां प्रेयसीं पार्वतीमिति
भावः, अवारयन्न्यवारयत् अर्थात् तद्दर्शनलालसया वासोबन्धनात्प्रि-
यतमां निवारयाञ्चक्रे ।
प्रबन्धार्थगत अनौचित्य का दूसरा उदाहरण उपस्थित करते हुए ग्रंथकार
ने कविवर कालिदासरचित कुमारसंभव के अष्टम सर्ग से यह श्लोक उद्धृत
किया है । प्रातःकाल का समय हो रहा था, मलयानिल कुछ तीव्र गति से
बह रहा था, रतिश्रमज शीकरों से क्लिन्न होकर जगदम्बा और परमेश्वर कंठा-
श्लेष को शिथिल करके वायुसेवन कर रहे थे, उस समय पार्वती अपने ऊरुमूल-
विगलित वसन को पुनः यथास्थान धारण करने की चेष्टा करने लगी, परन्तु
उनके जघनमूल में दीख पड़ते हुए नखक्षत की पंक्तियों ने भगवान् शंकर की
आँखें अपनी ओर आकृष्ट कर लीं, अतः उन्हें बार बार देखने की लालसा से
परमेश्वर ने अपनी प्रियतमा को शिथिल वस्त्र को पुनः यथास्थान धारण करने
से रोक लिया ।
अत्राम्बिकासंभोगवर्णने पामर नारीसमुचितनिर्लज्जसज्जनखराजि-
विराजितोरुमूलहृतविलोचनत्वं त्रिलोचनस्य भगवतस्त्रिजगद्गुरोर्यदुक्तं
तेनानौचित्यमेव परं प्रबन्धार्थः पुष्णाति ॥ १३ ॥
अत्र पद्ये अम्बिकासंभोगवर्णने जगदम्बासंभोगवर्णनप्रसङ्गे, त्रिजगद्-
गुरोस्त्रिलोकीपतेः, भगवतस्त्रिलोचनस्य, पामरनारीसमुचितनिर्लज्जसज्ज-
नखराजिविराजितोरुमूलहृतविलोचनत्वम् अधमाङ्‌गनोचितनिस्त्रपकल्प-
नखक्षतविभासितजघनमूलाकृष्टनेत्रत्वं यदुक्तं तेन प्रबन्धार्थो वाक्यबन्धाभि-
प्रायः परं निरतिशयमनौचित्यमेव पुष्णाति (अर्थादुदात्तस्तरयोर्व्यक्तयो-
र्निखिलमपि कर्मोदात्तमेव समुचितमिह तु त्रैलोक्याधिपतेः शङ्करस्य,
सकललोकैकलाभभूताया जगदम्बायाश्च जनवदाचरणमत्यन्तमनुचित-