औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता २१
वर्षोऽमृतवर्षं, तेन तद्रूपेणेति यावत्, समुचितार्थविशेषेणौचित्यानुप्राणि-
तार्थेन, महावाक्यं सर्गबन्धात्मककाव्यविशेषः, स्फुरद्भासमानमिव, चम-
त्कारितामलौकिकानन्दजनकतामापद्यते प्राप्नोतीति भावः ।
उपर्युक्त कारिका का ही तात्पर्य व्यक्त करने के लिये कहा गया है—
अम्लानेति । विलक्षण प्रतिभा के द्वारा उत्प्रेक्षित, संपूर्ण प्रबन्धार्थ को सुधाशीकर
के समान आप्लावित करने वाले अनुरूप अर्थ से महाकाव्य अत्यन्त स्पृहणीयता
को प्राप्त करता है, अर्थात् अलौकिक आनन्दजनक हो जाता है ।
यथा कालिदासस्य—
जातं वंशे भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां,
जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः ।
तेनार्थित्वं विधिपरवशाद् दूरबन्धुर्गतोऽहं
याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा ॥
प्रबन्धार्थगतौचित्यमुदाहर्तुमाह-यथा कालिदासस्येति । जातमिति ।
पुष्कराश्चावर्तकाश्चेति पुष्करावर्तकास्तत्तन्नामकमेघविशेषास्तेषां भुवन-
विदिते संसारप्रसिद्धे, वंशेऽन्वये, जातमुत्पन्नम्, एतेन मेघस्याभिजात्यम-
भिसूचितं, कामरूपमिच्छाधीनविग्रहं, मघोन इन्द्रस्य, प्रकृतिपुरुषं प्रधा-
नामात्यं, त्वां मेघं, जानामि परिचिनोमि, तेनोदात्तकुलप्रसूतत्वेन परो-
पकारकरणक्षमतया, दूरबन्धुः कान्तावियोगविधुरोऽहम् अनिर्दिष्टनामा
यक्षः, विधिपरवशाद्दैवयोगात्त्वयि तवाग्र इति भावः, अर्थित्वं याचकत्वं,
गत उपेतः । उत्तमजने याचनहेतुमाह-अधिगुण इति । अधिगुणेऽधिक
गुणशालिनि, याच्ञा याचना, मोघाऽसफलाऽपि, वरं श्रेष्ठम्, अधमे
नीचपुरुषे, लब्धकामा सफलापि, न श्रेष्ठेति भावः ।
प्रबन्धार्थगत औचित्य का उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है—जातमिति ।
प्रस्तुत पद्य महाकवि कालिदास के प्रबन्धकाव्य मेघदूत से लिया गया है । प्रिया
के वियोग से विधुर यक्ष मेघ के द्वारा अपनी प्रेयसी को संदेश भेजने का औचित्य
प्रदर्शित कर रहा है। हे मेघ ! पुष्कर और आवर्तक नामक महामेघ के उदात्त
कुल में उत्पन्न, देवेन्द्र के प्रधान पुरुष और कामनाानुकूल शरीर धारण करने वाले
तुमको मैं अच्छी तरह जानता हूँ । सत्कुलप्रसूत व्यक्ति पर-पीड़ा का आदर