औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ औचित्यविचारचर्चा
अत एव विकटं भयानकम्, उदरं, यस्य तत् तादृशमिति भावः, अस्तु
जायताम् ।
प्रबन्धार्थगत औचित्य का ही द्वितीय उदाहरण दिखलाने के लिये भवभूति-
रचित उत्तररामचरित का एक अंश उद्धृत किया जाता है—नेपथ्ये इत्यादि ।
लंकाविजयानंतर अयोध्यावासी राम ने सीता-परित्याग के बहुत बाद में अश्वमेघ
यज्ञ करने की कामना से लक्ष्मणपुत्र चन्द्रकेतु की संरक्षकता मे यज्ञीय अश्व को
छोड़ा । वह अश्व घूमता हुआ जब वाल्मीकि आश्रम के निकट वन में पहुँचा,
तब वहाँ सीतातनय लव के साथ खेलते हुए बालब्रह्मचारियों ने अश्वरक्षक
सैनिकों से पूछा किस लिये सैनिकों से वेष्टित यह अश्व पर्यटन कर रहा है ?
इसी के उत्तर में नेपथ्य से सैनिक कह रहे हैं—योऽयमश्व इत्यादि । अर्थात्
यह जो अश्व आप देख रहे हैं वह सातों भुवनों में सर्वश्रेष्ठ वीर, रावणवंश-
विनाशक, रामचन्द्र की विजयपताका है, अथवा अतुल पराक्रमसूचक डिंडिम-
ध्वनि है ।
लवः ( सगर्वमिति )—उपर्युक्त घोषणा के द्वारा अन्य वीरों पर जो आघात
पहुँचाया गया था वह लव से सहा नहीं गया, उसकी स्वाभाविक वीरता जग
गयी, वह साभिमान बोला, अरे रे ! इस घोषणा के अक्षर तो बड़े ही क्लेशकर
हैं, अरे बकने वालो ! क्या पृथिवी क्षत्रियों से विहीन हो गयी जो तुम इस तरह
बोल रहे हो ? (फिर कुछ हँस कर) हमारे ऊपर प्रहार करने के लिये विपक्षियों
के शस्त्र चमक रहे हैं क्या ?—( धनुष को सम्हालता हुआ ) बोला - अपनी
प्रत्यञ्चारूपिजिव्हा से आवेष्टित, उन्नतकोटिरूप दांतों से युक्त और निकलते हुए
भयानक घने घर्घर शब्दों वाला, मेरा यह धनुष निगलने में तत्पर, हँसता हुआ
यमराज के यंत्ररूप मुख की जमुहाई की नकल करने वाला अतएव भयंकर उदर
( मध्यभाग ) वाला हो जाय ।
अत्रार्थे रामायणकथातिक्रमेण नूतनोत्प्रेक्षिता रामतनयस्य सहज-
विक्रमानुसारिणी शौर्योत्कर्षभूमिः परप्रतापस्पर्शासहिष्णुता प्रबन्धस्य
रसबन्धुरामोचित्यच्छायां प्रयच्छति ।
अत्रार्थे, रामायणकथातिक्रमेण रामायणकथापरित्यागेन, नूतनोत्प्रे-
क्षिता अतिनवीनविन्यस्ता, रामतनयस्य लवस्य सहजविक्रमानुसारिणी