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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

१८ औचित्यविचारचर्चा
युवतीनां, दन्तानां, याऽवदाता निर्मला द्युतिः शोभा, सेव द्युतिर्यस्य सः,
दन्तचन्द्रयोरुभयोरपि समुज्ज्वलत्वेन युक्तोपमेति बोध्यम्। चण्डीशस्य
शिवस्य, चूडाया मौलिग्रन्थेर्मणिभूषणमिव वर्तमानोऽयं लब्धोदयश्चन्द्रः
सुधांशुरितः पूर्वस्यां दिशि दृश्यतामवलोक्यतां त्वयेति शेषः।
आलोचक कवि राजशेखर के द्वारा रचित यह पद्य वाक्यगत औचित्य के
द्वितीय उदाहरण के रूप में उपस्थित किया गया है। सम्बन्धीति—नायिका को
अनुकूल बनाने के लिये उगते हुये चन्द्र को लक्ष्य कर नायक कह रहा है—अये
सुन्दरि ! देखो पूरब दिशा में चन्द्र उग आये हैं, जो कि भगवान् शंकर के
शिरोभूषण, तारातरुणी के तरुण प्रियतम और पौरवों के कुल के मूल ही नहीं,
अपितु कामकला के शिक्षक, गौरांगी के मुख की उपमा से परिचित, तथा
दाक्षिणात्यकामिनी के सद्योमार्जित धवल दन्तपंक्ति के समान स्वच्छ भी है।
अत्रापि चन्द्रमसः शृङ्गारान्तरङ्गैरनङ्गोद्दीपनैः पदैर्निर्वर्तितो वाक्यार्थः
सर्वथौचित्यसामर्थ्येन समुचितार्थवशेनार्थात्यर्थमत्यन्तमर्थनीयतां प्राप्तः।
अत्रापि चन्द्रमसः, शृङ्गारान्तरङ्गैः शृङ्गाराऽनुकूलैरनङ्गोद्दीपनैः कामो-
त्तेजकैः, मनसिजव्यापारदीक्षागुरुरित्यादिभिः पदैर्निर्वर्तितो निष्पादितो
वाक्यार्थः, सर्वथौचित्यसामर्थ्येन समुचितार्थवशेनार्थात्यर्थमत्यन्तमर्थनी-
यतामुपादेयतां, प्राप्तो गतः, चन्द्रमसो विशेषणीभूतैरौचित्यपोषकैः-
कियद्भिः पदैर्वाक्यगतौचित्यं पोष्यते इति भावः।
इस पद्य में भी शृङ्गाररसोद्दीपक् “मनसिजव्यापारदीक्षागुरुः” इत्यादि पदों
के द्वारा पूरे वाक्य का अर्थ औचित्य की महिमा से अत्यन्त उपादेयता को प्राप्त
कर गया है, अर्थात् चन्द्रमा के विशेषण में कहे गये समुचित पदों के प्रयोग से
पूरे वाक्य में औचित्य का आधान हो रहा है। इसलिये यह भी वाक्यगत औचित्य
का उदाहरण सिद्ध होता है।
नतु यथास्यैव—
नाले शौर्यमहोत्पलस्य विपुले सेतौ समिद्वारिधेः
शश्वत्खड्गभुजङ्गचन्दनतरौ क्रीडोपधाने श्रियः।
आलाने जयकुञ्जरस्य सुदृशां कन्दर्पदर्पे परं
श्रीदुर्योधनदोष्णि विक्रमपरे लीनं जगन्नन्दतु ॥