औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १३
इसके योग्य किसी पुरुष की रचना करने की क्षमता नहीं थी तो संसार में इस
तन्वी की सृष्टि कर लाभ क्या हुआ, यह वही जानें ।
अत्र "तन्व्याः" इति पदं केवलशब्दानुप्रासव्यसनितया निबद्धं न
काञ्चिदर्थौचित्यचमत्कारकणिकामाविष्करोति । "सुन्दर्याः" इत्यत्र
पदमनुरूपं स्यात् । अन्यानि वा निरतिशयरूपलावण्यव्यञ्जकानि ।
तन्वीपदं तु विरहविधुररमणीजने प्रयुक्तमर्थौचित्यशोभां जनयति ।
उपपादयति-अत्रेति । उपर्युक्तपद्ये "तन्व्याः" इतिपदं केवलशब्दानुप्रा-
सव्यसनितया केवलं 'तनुं तन्वता' इत्यत्रोक्तकारानुप्रासाग्रहितया,
निबद्धं योजितं, न काञ्चित् कामपि, अर्थौचित्यचमत्कारकणिकाम्
वाच्यौचित्यचमत्कारकणम्, आविष्करोति जनयति । अत्र तन्व्या
इति पदस्थाने सुन्दर्या इति पदम् अनुरूपं समुचितप्रयोगयोग्यं स्यात् ।
नन्वेवं छन्दोभङ्ग इति चेत्तत्राह—अन्यानीति इतराणि वा, निरतिशयरूप-
लावण्यव्यञ्जकानि विलक्षणरूपसोन्दर्यप्रतिपादकानि, प्रयोगयोग्यानि
स्युरिति शेषः । वस्तुतस्तु छन्दोभङ्गप्रसङ्गोऽकिञ्चित्करः । "कान्तामिमां
तन्वता" इत्येवं निर्माणे दोषाभावात् । तन्वीपदं तु विरहविधुररमणीजने
वियोगक्षामकामिनीलोके प्रयुक्तं सदर्थौचित्यशोभां वाच्यौचित्यचारुतां
जनयति । इह तु तदन्यथाप्रयुक्तमित्यौचित्यक्षयान्नितरां सहृदयहृदय-
हानिरिति बोध्यम् ।
उपर्युक्त पद में तन्वी शब्द का प्रयोग केवल तकारानुप्रास के आग्रह से किया
गया है । यथार्थतः यहाँ इसकी कुछ भी उपयोगिता नहीं है, क्योंकि दुर्बलता वियोग
का स्वाभाविक गुण है अतः इस पद का प्रयोग केवल विरहविधुर रमणीजनों
के लिए ही उपयुक्त हो सकता है । यहाँ तो कवि का अभिप्राय उत्कृष्ट सौन्दर्य
वर्णन से है फिर तो सुन्दरी, कान्तिमयी इत्यादि विलक्षण सौन्दर्यव्यञ्जक शब्दों
का प्रयोग ही उचित था ऐसा न करके कवि ने एक भारी भूल की है । इस एक
मात्र पद के अनौचित्य से पूरा का पूरा पद्य प्राणहीन-सा मालूम पड़ता है । यही
"तन्व्यास्तनुं तन्वता" की जगह यदि "कान्तामिमां-तन्वता" ऐसा पाठ कर दिया
जाय तब कान्ता पद से अनुरूप सौन्दर्य की अभिव्यक्ति के द्वारा औचित्य की रक्षा
हो सकती है ।