सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 75

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १५
इस शय्या की रचना तो सर्वत्र शिथिल बाहुवल्लरी के आकुंचन-प्रसारण से
अस्तव्यस्त हो ही गयी है। ऐसी शय्या को देखकर भी क्या किसी दर्शक को उस
पर लोटती हुयी कामिनी के संताप को समझने के लिये किसी से पूछने की
आवश्यकता पड़ सकती है ? कभी नहीं ।
अत्र सागरिकाया विरहावस्थासूचकं "कृशाङ्ग्याः" इति पदं परमौ-
चित्यं पुष्णाति ॥ ११ ॥
उपपादयन्नाहात्रेति । उक्तश्लोके, सागरिकाया लङ्केशकुमार्याः, विर-
हावस्थासूचकं वियोगस्थितिव्यञ्जकम्, "कृशाङ्ग्याः" इतिपदं, परमौ-
चित्यम् औचित्यस्य परां काष्ठां, पुष्णाति पोषयति ॥ ११ ॥
यहाँ पर लंकेशकुमारी सागरिका के लिये वत्सराज उदय के वियोग को
सूचित करने वाले कृशांगी पद का प्रयोग अत्यन्त समीचीन होने के कारण पाठकों
को अपूर्व आनन्द प्रदान करता है ॥ ११ ॥
वाक्यगतौचित्यं दर्शयितुमाह—
औचित्यरचितं वाक्यं सततं संमतं सताम् ।
त्यागोदग्रमिवैश्वर्यं शीलोज्ज्वलभिव श्रुतम् ॥ १२ ॥
औचित्यरचितं वाक्यं काव्यविवेकविचक्षणानामभिमततमम् ।
पदगतौचित्यं प्रदर्श्य सम्प्रति द्वितीयं वाक्यगतौचित्यप्रदर्शनायाह—
औचित्येति । औचित्यरचितम् औचित्याभिनिवेशपूर्वकं निर्मितं, वाक्यं
पदसमूहः, त्यागोदग्रं त्यागेन दानादिनोदग्रमुदात्तमैश्वर्यं, विभूतिरिव,
शीलोज्ज्वलं शीलेन सत्स्वभावेन, उज्ज्वलं प्रशस्तं, श्रुतं शास्त्रमिव, सततं
सर्वदा, सतां सज्जनानां, सम्मतमभिमतमभीष्टमित्यर्थः । अस्यैव निर्ग-
लितार्थमाह—औचित्यरचितमिति । औचित्यरचितं वाक्यं, काव्यविवेक-
विचक्षणानां काव्यालोचनचतुराणां, विदुषाम्, अभिमततमं निरतिशय-
मभीष्टमिति भावः ।
पदगत औचित्य को दिखाकर अभी क्रमागत द्वितीय वाक्यगत औचित्य
का प्रदर्शन करने के लिये कहा गया है—औचित्येति । जैसे दान आदि के द्वारा
संपत्ति की उदात्तता और दाक्षिण्यादि गुणों के द्वारा विद्या की उज्ज्वलता सज्जनों
के लिये विशिष्ट स्थान रखती है वैसे ही औचित्य को ध्यान में रखकर की गयी
वाक्यरचना काव्यालोचकों के लिये सर्वदा स्पृहणीय बनी रहती है । इसी
आशय को सीधे शब्दों में वृत्ति के द्वारा स्पष्ट किया है । औचित्यरचितमिति—