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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता २७
प्रातःकालीनवायुसेवनकाले, ऊरुमूले जघनारम्भे, स्थितानां नखमार्गाणां
नखक्षतानां, याः पङ्क्तयो राजयस्ताभिर्हृते वशीकृते विलोचने नयने
यस्य सः, हरस्य कर्त्रंशे नित्यसाकांक्षत्वेन "देवदत्तस्य गुरुकुलम्" इति
वत्समासः ।
हरः शङ्करः, प्रशिथिलस्य जघनमूलात्सर्वथा भ्रष्टस्य, वाससो वसनस्य,
संयमं यथास्थानन्यासं, कुर्वन्तीं विदधतीं, प्रियतमां प्रेयसीं पार्वतीमिति
भावः, अवारयन्न्यवारयत् अर्थात् तद्दर्शनलालसया वासोबन्धनात्प्रि-
यतमां निवारयाञ्चक्रे ।
प्रबन्धार्थगत अनौचित्य का दूसरा उदाहरण उपस्थित करते हुए ग्रंथकार
ने कविवर कालिदासरचित कुमारसंभव के अष्टम सर्ग से यह श्लोक उद्धृत
किया है । प्रातःकाल का समय हो रहा था, मलयानिल कुछ तीव्र गति से
बह रहा था, रतिश्रमज शीकरों से क्लिन्न होकर जगदम्बा और परमेश्वर कंठा-
श्लेष को शिथिल करके वायुसेवन कर रहे थे, उस समय पार्वती अपने ऊरुमूल-
विगलित वसन को पुनः यथास्थान धारण करने की चेष्टा करने लगी, परन्तु
उनके जघनमूल में दीख पड़ते हुए नखक्षत की पंक्तियों ने भगवान् शंकर की
आँखें अपनी ओर आकृष्ट कर लीं, अतः उन्हें बार बार देखने की लालसा से
परमेश्वर ने अपनी प्रियतमा को शिथिल वस्त्र को पुनः यथास्थान धारण करने
से रोक लिया ।
अत्राम्बिकासंभोगवर्णने पामर नारीसमुचितनिर्लज्जसज्जनखराजि-
विराजितोरुमूलहृतविलोचनत्वं त्रिलोचनस्य भगवतस्त्रिजगद्गुरोर्यदुक्तं
तेनानौचित्यमेव परं प्रबन्धार्थः पुष्णाति ॥ १३ ॥
अत्र पद्ये अम्बिकासंभोगवर्णने जगदम्बासंभोगवर्णनप्रसङ्गे, त्रिजगद्-
गुरोस्त्रिलोकीपतेः, भगवतस्त्रिलोचनस्य, पामरनारीसमुचितनिर्लज्जसज्ज-
नखराजिविराजितोरुमूलहृतविलोचनत्वम् अधमाङ्‌गनोचितनिस्त्रपकल्प-
नखक्षतविभासितजघनमूलाकृष्टनेत्रत्वं यदुक्तं तेन प्रबन्धार्थो वाक्यबन्धाभि-
प्रायः परं निरतिशयमनौचित्यमेव पुष्णाति (अर्थादुदात्तस्तरयोर्व्यक्तयो-
र्निखिलमपि कर्मोदात्तमेव समुचितमिह तु त्रैलोक्याधिपतेः शङ्करस्य,
सकललोकैकलाभभूताया जगदम्बायाश्च जनवदाचरणमत्यन्तमनुचित-