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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

( ४४ )
जो वस्तु जिसके अनुरूप होती है उसे हम 'उचित' कहते हैं और उचित
का भाव ही 'औचित्य' कहलाता है। यद्यपि यह लक्षण उतना अनुगत नहीं
है तथापि पाठकों के मानसपटल पर औचित्य की एक व्यावहारिक रूपरेखा इससे
अवश्य खिंच जाती है।
इसके अनन्तर औचित्य के प्रभेद किये गए हैं, जिनकी संख्या क्रमशः पद,
वाक्य, प्रबन्धार्थ, गुण, अलंकार, रस, क्रिया, कारक, लिङ्ग, वचन, विशेषण,
उपसर्ग, निपात, काल, देश, कुल, व्रत, तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह,
प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम, और आशीर्वाद के रूप में सत्ताईस ( २७ )
गिनाई गई है।
ये प्रभेद उपलक्षणमात्र हैं। वस्तुतः औचित्य के अनन्त भेद हो सकते हैं।
काव्य के प्रत्येक अङ्ग तथा उपांग पर इस तथ्य का व्यापक प्रभाव है। इस बात
को ग्रन्थकार ने स्वयं ग्रंथ-समाप्ति के अवसर पर स्पष्ट लिखा है। "अन्येषु
काव्याङ्गेषु अनयैव दिशा स्वयमौचित्यमुत्प्रेक्षणीयम् । तदुदाहरणानि आनन्त्यान्न
प्रदर्शितानि अलमतिप्रसङ्गेन।" यही औचित्यविचार-चर्चा की अन्तिम पङ्क्ति है।
इन गिनाए गए २७ प्रभेदों को हम पाँच वर्गों में विभक्त कर सकते हैं।
पद, वाक्य और प्रबन्ध ये तीन प्रथम वर्ग में रक्खे जा सकते हैं, जो मीमांसा-
दर्शन से संबद्ध विषय हैं। दूसरे वर्ग में गुण, अलंकार और रस का स्थान आता
है, जो काव्यशास्त्र अथवा अलङ्कारशास्त्र की वस्तुएँ हैं। तीसरे वर्ग में क्रिया,
कारक, लिंग वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात तथा काल का समावेश हो सकता
है, जो सबके सब व्याकरणशास्त्र के पदार्थ हैं। चतुर्थ वर्ग में देश, कुल एवम्
व्रत आ सकते हैं, जिनका संबन्ध लोकतन्त्र से है।
पञ्चमवर्ग में आते हैं—तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह, प्रतिभा
अवस्था, विचार, नाम और आशीर्वाद, इनका संबन्ध वक्ता—कवि से है
इनमें आदिम चार वर्ग प्रसिद्ध काव्याङ्ग हैं, इन पर प्राचीन काव्याचार्यों
द्वारा अनेक प्रकार के विचार किए जा चुके थे, पर क्षेमेन्द्र ने इन पर भी ए
नवीन दृष्टिकोण से, किन्तु पूर्वाभास के रूप में ही विचार किया है।
पंचमवर्ग आचार्य क्षेमेन्द्र की मौलिक देन है। भारतीय आलोचना-पद्ध

( ४५ )

में आचार्य ने एक नया दृष्टिकोण उपस्थित किया है। कारण, 'कला में सौन्दर्य
है अथवा नहीं' ? यह उतना आलोचना का विषय नहीं है, जितना 'कला में
सौन्दर्य आता कहाँ से है' यह—अर्थात् गुण, रीति, अलंकार अथवा रस का
ही समावेश काव्य में हुआ है, किंवा नहीं यही नहीं देखना है आलोचकों को,
अपितु मुख्यतः यह देखना है कि इन वस्तुओं का समावेश किस ढंग से हुआ है,
इन वस्तुओं के समावेशार्थ जो ढंग अपनाया गया है वह उचित है अथवा नहीं।
फलतः प्रतिपाद्य वस्तु की ओर से हटा कर अपना ध्यान आलोचकों को
प्रतिपादन करने वाले कवि की ओर ले जाना चाहिए। सारांश यह कि कला-
गत सौन्दर्य का रहस्य कवि-हृदय में छिपा रहता है, वस्तु में नहीं। पर भारतीय
आलोचकों का दृष्टिकोण वस्तुपरक ही अधिक रहा। आचार्य क्षेमेन्द्र ने उक्त
पंचम वर्ग का समावेश अपनी 'चर्चा' में करके जो अन्तर्वीक्षा प्रस्तुत की है,
वह निस्सन्देह नूतन और श्लाघ्य है। अस्तु।

ग्रन्थ का स्वरूप
पूर्वकथित प्रभेदों के क्रमशः पहले कारिका के द्वारा स्वरूप और लौकिक
दृष्टान्तमूलक साहित्यिक स्तर निर्णीत किये गए हैं । फिर उदाहरण तथा प्रत्यु-
दाहरण द्वारा उन प्रभेदों का स्पष्टीकरण किया गया है । उदाहरण तथा प्रत्यु-
दाहरण के पद्य कुछ तो अपने अन्य ग्रन्थों से और कुछ विभिन्न कवियों के
काव्यों से उद्धृत किये गए हैं ।
बीच बीच में गद्य के द्वारा कारिकाओं तथा उदाहरण-प्रत्युदाहरण पद्यों
की व्याख्या की गई है । सामान्यतः ग्रन्थ का यही स्वरूप है ।
आलोचना में सर्वत्र ईमानदारी बरती गई है । औचित्य के उदाहरणरूप में
ही नहीं, प्रत्युदाहरणरूप में भी अपने पद्यों को ग्रन्थकार ने उद्धृत किया है ।
तत्तत् औचित्य का स्तर निश्चित करते समय कारिकाओं के द्वारा अनूठे लौकिक
दृष्टान्तों का प्रयोग किया गया है । जैसे—
तिलकं बिभ्रती सूक्तिर्भात्येकमुचितं पदम् ।
चन्द्राननेव कस्तूरीकृतं श्यामेव चान्दनम् ॥
तिलक के समान औचित्यपूर्ण एक पद वाली सूक्ति ( काव्यवाक्य ) शोभित
होती है । कैसे ? जैसे गौरवर्णा कामिनी कस्तूरीकृत काली बिन्दी से और
श्यामाङ्गी चन्दनरचित धवल विशेषक ( बिन्दी ) से । कैसा मनोहर दृष्टान्त है !
गौराङ्गी के भाल पर काली बिन्दी का और श्यामांगी के ललाट पर धवल
बिन्दी का औचित्य और तज्जन्य शोभातिशय का अनुभव सभी सहृदयों को
अवश्य होगा ।
सम्पूर्ण ग्रन्थ में इसी तरह के रुचिर दृष्टान्तों का सन्निवेश किया गया है ।
आलोचना की मार्मिकता देखते ही बनती है । बानगी के तौर पर एक दो स्थलों
का प्रदर्शन ही पर्याप्त होगा—
मग्नानि द्विषतां कुलानि समरे त्वत्खड्गधाराकुले,
नाथास्मिन्निति बन्दिवाचि बहुशो देव ! श्रुतायां पुरा ।
मुग्धा गुर्ज्जरभूमिपालमहिषी प्रत्याशया पाथसः,
कान्तारे चकिता विमुञ्चति मुहुः पत्युः कृपाणे दृशौ ॥

( ४७ )
कवि किसी राजा की स्तुति में कहता है कि हे राजन् ! गुर्जर देश के
अधिपति, जो आपके आक्रमण से भयभीत होकर सपत्नीक वन में भटकते फिरते
हैं की मुख्य रानी पहले बन्दिजनों के द्वारा बार-बार सुन चुकी थी कि युद्ध में
शत्रुओं का समूह तेरो तलवार की तीक्ष्ण धारा में डूब मरा, अब वह मुग्धा रानी
आज इस वनवास-काल में चकित होकर जल की आशा से बार-बार पति की
तलवार पर अपनी दृष्टि डाल रही है ।
इस पद्य में 'मुग्धा' यह एक पद ऐसा है जिसके चलते सम्पूर्ण पद्य सार्थक,
सुसंगत अर्थ च सुन्दर हो जाता है—सहृदय-हृदयहारी सिद्ध होता है। यदि वह
नहीं रहता तो सम्पूर्ण पद्य असंगतार्थक होकर सहृदयों के उद्वेग का कारण बन
जाता, क्योंकि तलवार की धार में जल की आशा करना उपहासास्पद है । पर
मुग्धा के लिये ऐसा करना नितान्त-उचित है, पदौचित्य के उदाहरण में यह पद्य
उद्धृत हुआ है । जरा पद के अनौचित्य की भी बानगी देखिए—
लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः क्लेशो महान् स्वीकृतः
स्वच्छन्दस्य सुखं जनस्य वसतश्चिन्ता ज्वरो निर्मितः ।
एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद् वराकी हता
कोऽप्यर्थश्चेतसि वेधसा विनिहितस्तन्व्यास्तनुं तन्वता ॥
विधाता ने एक सुन्दरी की सृष्टि की । उसकी सृष्टि करने में सौन्दर्यरूप
धन का व्यय तो करना ही पड़ा साथ-साथ कष्ट भी विधाता को कम नहीं
हुआ । पर फल क्या हुआ ? कुछ नहीं । स्वच्छन्द तथा सुखपूर्वक संसार में
बसने वाले युवकजन के हृदय में चिन्ताज्वर उत्पन्न हो गया —अर्थात् इस
सुन्दरी की प्राप्त्याशा में सब चिन्तित रहने लगे । और वह बेचारी—जिसकी
सृष्टि विधाता ने महान् व्यय तथा श्रम स्वीकार करके की--भी अपने अनुरूप
पति के नहीं मिलने से बेमौत मारी गई । ऐसी स्थिति में इस तन्वी के तनु
की सृष्टि करते हुए विधाता ने अपने मन में कौन-सा प्रयोजन रक्खा था ?
पता नहीं ।
श्लोक के शब्द तथा अर्थ--दोनों ही सुन्दर हैं, पर इस पद्य में एक पद
ऐसा अनुचित कह दिया गया है जिसके चलते 'सब गुड़ गोबर' हो जाता है ।
और वह अनुचित पद है 'तन्वी' । यह पद दुर्बलता का द्योतक है, अतः इसका
प्रयोग किसी विरहिणी के प्रसङ्ग में उचित हो सकता है । यहाँ तो विरह का
कोई प्रसङ्ग है नहीं । यहाँ तों सौन्दर्य 'सुन्दरी' आदि पद का प्रयोग उचित

( ४८ )

होता । कितनी सूक्ष्म तथा मार्मिक आलोचना है । सर्वत्र इसी तरह की मार्मिक
आलोचना प्राप्त होती है । यहाँ सब का उल्लेख संभव नहीं, और अवतारणा
का कलेवर विपुल हो जाने का भी भय है । अतः पाठकों को उन मार्मिक
आलोचनाओं से आनन्द का अनुभव करने के लिये ग्रन्थ का अध्ययन करना
चाहिए । इस ग्रन्थ में कारिकाओं की संख्या उनचालिस है और उदाहरण-
प्रत्युदाहरण के रूप में एक सौ पाँच श्लोक तैंतिस विभिन्न ग्रन्थों से उद्धृत
किये गये हैं । इनमें क्षेमेन्द्र के ग्यारह काव्यग्रन्थों के पैंतिस श्लोक हैं जो कि
औचित्य तथा अनौचित्य दोनों के उदाहरण में आए हैं । एक श्लोक
प्रस्तुत ग्रन्थ की दृष्टि से ही लिखा गया है । इस तरह छत्तिस श्लोक इनके
अपने हुए ।
इसके अतिरिक्त राजशेखर के दश, कालिदास के विभिन्न चार ग्रन्थों से
आठ, भवभूति के एक ग्रन्थ से तीन, श्रीहर्ष के पाँच, बाणभट्ट के दो ग्रन्थों से
तीन, व्यास का एक, चन्द्रक के चार, वराहमिहिर का एक, परिमल के चार,
अमरुक के दो, माघ का एक, दीपक के तीन, धर्मकीर्ति का एक, नारायणभट्ट के
दो, मालवरुद्र के दो, कर्पटक का एक, श्यामलक का एक, प्रवरसेन के दो,
राजपुत्र मुक्तापीड का एक, गौड़ कुम्भकार का एक प्रभाकरभट्ट का एक,
उत्पलराज का एक, महेन्दुराज के दो, मातृगुप्त का एक, भट्ट लट्टन का एक,
कुमारदास का एक, श्रीचन्द्र का एक, मालवकुवलय का एक, भट्ट भल्लट का
एक, परिव्राजक का एक, उपाध्याय गङ्कक का एक और यशोवर्मदेव का एक
श्लोक उदाहरण-प्रत्युदाहरण के रूप में उद्धृत हुए हैं । इस तरह इस ग्रन्थ के
अध्ययन से बहुतेरे ऐसे कवियों का पता हमें मिलता है जिनकी कृतियों से
विद्वन्मण्डली अपरिचित है ।

महाकवि क्षेमेन्द्र

प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रणेता महाकवि क्षेमेन्द्र, संस्कृत भाषा के महाकवियों में
भी अलौकिक प्रतिभाशाली महाकवि थे जिनकी प्रतिभा ने साहित्य के विभिन्न
क्षेत्रों में अपना चमत्कार दिखलाया । सरस्वती के ये वरदपुत्र शारदा देश
अर्थात् काश्मीर के निवासी थे, परन्तु जब ये उत्पन्न हुए थे तब काश्मीर का
वातावरण कविता जैसी कोमल कला के अनुशीलन के लिये नितान्त अनुपयुक्त
था । काश्मीर के इतिहास में वह युग असन्तोष, षड्यन्त्र, नैराश्य तथा रक्तपात
का काल था । तत्कालीन राजा अनन्त स्वयं मानसिक दुर्बलता का तथा

( ४६ )

बौद्धिक शिथिलता का पात्र था। तभी तो उसने १०६३ ई० में अपने ज्येष्ठ
पुत्र कलश को राज्य देकर भी थोड़े ही वर्षों के अनन्तर पुनः उसे ग्रहण
कर लिया। इसके अनन्तर वह १०७७ ई० में राज्य-कार्य से वस्तुतः विरत
हुआ और कुछ ही वर्षों के बाद, १०८१ ई० में, उसने आत्महत्या कर ली,
और उसकी विदुषी महारानी सूर्यवती भी अपने पति की चिता पर सती
बन गई।
इन्हीं पिता-पुत्र अनन्त ( १०२८ ई०--१०६३ ई० ) तथा कलश
( १०६३ ई०--१०८९ ई० ) के राज्यकाल, में क्षेमेन्द्र की जीवन-लीला
व्यतीत हुई।
इनके पूर्वपुरुष राजा के अमात्य-पद पर प्रतिष्ठित थे। क्षेमेन्द्र अपने युग के
अशान्त वातावरण से इतने असन्तुष्ट तथा मर्माहत थे कि उसे सुधारने में तथा
पवित्र और विशुद्ध बनाने के लिए और दुष्टता के स्थान पर शिष्टता की और
स्वार्थ के स्थान पर परार्थ की भावना को दृढ़ करने के लिये, अपनी द्रुतगामिनी
लेखनी को काव्य के नाना अङ्गों की रचना में लगाया। इसी का रुचिर परिणाम
है—क्षेमेन्द्र का विशाल-साहित्य '
महर्षि वेदव्यास के आदर्श पर रचना करने वाले ये महाकवि नाम्ना ही नहीं
प्रत्युत यथार्थतः 'व्यासदास' थे।
इनकी प्रतिभा बहुमुखी थी। इनकी लेखनी से जिस तरह अलंकारशास्त्र के
उत्तमोत्तम अनेक ग्रन्थ उत्पन्न हुए उसी तरह अनेक महाकाव्य और खण्डकाव्य
सम्पन्न हुए। इनके ग्रन्थों में सभी रसों के अनूठे पद्य प्राप्त होते हैं। इनकी
नीतिमय कविताओं का साम्राज्य देखते ही बनता है। हास्यरस के तो संस्कृत
साहित्य में एकमात्र प्रतिनिधि कवि क्षेमेन्द्र हैं। इन्होंने एक नवीन प्रकार के
आख्यानों का निर्माण किया है, जिसमें हास्य के व्याज से शोभन उपदेश प्रदान
किया गया है। 'देशोपदेश' तथा 'नर्ममाला' ऐसी कथाओं से परिपूर्ण हैं।
क्षेमेन्द्र का उदात्त उद्देश्य है—तत्कालीन राजनैतिक बुराइयों, सामाजिक
दोषों और कमजोरियों को दिखलाकर उनका निराकरण करना। कवि का
कथन है कि हास्य के द्वारा प्रदर्शित युक्ति श्रोताओं के हृदय पर गहरी चोट
करती है, श्रोताओं के मर्मस्थान को विद्धकर उन्हें दोषयुक्त होने की प्रेरणा
देती है।

( ५० )
इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये 'देशोपदेश' में गौड़ छात्र पर तथा 'नर्ममाला'
में राज्य के अधिकारियों, जैसे कायस्थ, नियोगी, चाक्रिक आदि पर बड़ी मीठी
चुटकियाँ ली गई हैं ।
जनता के चरित्र के सुधार तथा मनोरञ्जन की भावना से प्रेरित होकर
ही क्षेमेन्द्र ने रामायण तथा महाभारत की प्रख्यात कथाओं का संक्षिप्त वर्णन
रामायणमञ्जरी तथा भारतमञ्जरी ( रचनाकाल १०३७ ई० ) के नाम से
प्रस्तुत किया ।
इसके बाद क्षेमेन्द्र ने शालिवाहन ( हाल ) के सभाकवि गुणाढ्य द्वारा
पैशाची भाषा में रचित वृहत्कथा ( इसका मूलरूप आज अप्राप्त है ) का सरस
पद्यानुवाद प्रस्तुत कर प्राचीन कहानियों का खजाना पाठकों के लिये
खोल दिया ।
क्षेमेन्द्र की दूसरी विशाल कथात्मक कृति है 'बोधिसत्त्वावदान-कल्पलता'
जिसमें भगवान् बुद्ध के प्राचीन जन्मों से संबद्ध पारमितासूचक आख्यानों का
पद्यबद्ध वर्णन है। 'अवदान' का अर्थ है--शुभ्रचरित्र ।
क्षेमेन्द्र रचित 'सुवृत्ततिलक' छन्दःशास्त्र का अमूल्य ग्रन्थ है। इस तरह
वस्तुतः क्षेमेन्द्र अपने युग के महान् लेखक थे इसमें किसी को विप्रतिपत्ति नहीं
हो सकती ।
क्षेमेन्द्र वैष्णवधर्मावलम्बी थे, पर आज-कल के कतिपय वैष्णवों के समान
दुराग्रही नहीं थे। इनकी धार्मिक भावना अत्यन्त उदार थी । ये ब्राह्मणजातीय
थे यह बात उनके पूर्वजों के राजामात्य होने से भी सिद्ध होती है, क्योंकि
अमात्यपद पर प्राचीनकाल में ब्राह्मणों की ही नियुक्ति होती थी ।
क्षेमेन्द्र के ग्रन्थ
१. अमृततरङ्गकाव्यम्, २. अवसरसारः, ३. कनकजानकी, ४. औचि[त्य-]
विचारचर्चा, ५. कविविलासः, ६. कविकण्ठाभरणम्, ७. चतुर्वर्गसंग्र[हः,]
८. चारुचर्या, ९. चित्रभारतनाटकम्, १०. दर्पदलनम्, ११. दशावत[ार-]
चरितम्, १२. देशोपदेशः, १३. नीतिकल्पतरुः, १४. नीतिलता, १५. प[द्य-]
कादम्बरी, १६. पवनपञ्चाशिका, १७. बृहत्कथामञ्जरी, १८. बोधिसत्त्वावदा[न-]
कल्पलता, १९. भारतमञ्जरी, २०. मुक्तावली, २१. मुनिमतमीमां[सा]

( ५१ )
२२. कविकर्णिका, २३. रामायणमञ्जरी, २४. ललितरत्नमाला, २५. लावण्यवतो,
२६. वात्स्यायनसूत्रसारः, २७. विनयवल्ली, २८. व्यासाष्टकम्, २६. शशिवंश-
महाकाव्यम्, ३०. समयमातृका, ३१. सुवृत्ततिलकम् तथा ३२. सेव्य-
सेवकोपदेशः ।
इन ग्रन्थों में अधिकतर उपलब्ध हैं पर कतिपय ग्रन्थ ऐसे भी हैं जिनकी
उपलब्धि अब तक नहीं हो सकी है ।
प्रस्तुत व्याख्या
प्रस्तुत ग्रन्थ पर संस्कृत-हिन्दी व्याख्या लिखने की प्रवृत्ति मेरे अनुज के
मन में उदित हुई और मुझ से उत्साहित होकर उन्होंने लिखना आरम्भ कर
दिया । कतिपय शब्दों ( लटभा आदि ) का अर्थ-निर्णय करने में उन्हें बड़ी
परेशानी उठानी पड़ी । अन्त में बड़े परिश्रम से उन्होंने संस्कृत तथा हिन्दी
टीका को तैयार कर मेरे समक्ष उपस्थित किया । मैंने दोनों ही टीकाओं के
कतिपय अंशों को पढ़ा । व्याख्याकार्य में प्रथम प्रवृत्ति के कारण व्याख्याकार
की शैली उतनी परिमार्जित नहीं है फिर भी इन व्याख्याओं के आधार पर
पाठक ग्रन्थ के गूढातिगूढ अभिप्राय को भी अनायास समझने में समर्थ होंगे--
ऐसा मुझे विश्वास है ।
कहीं-कहीं व्याख्याकार ने ग्रन्थकार के विचारों से अपनी असहमति व्यक्त
की है और मुझे भी उन स्थलों पर व्याख्याकार के विचार अच्छे प्रतीत हुये
हैं । मैं व्याख्याकार के प्रति अपनी शुभकामना प्रकट करता हूँ ।
दीपावली } विदुषां विधेयः
} पं० श्री मदनमोहन झा
सं० २०२१ } अध्यापक, राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, भागलपुर

औचित्यविचारचर्चायाः
मूलस्थकारिकानुक्रमणिका
पृष्ठाङ्क | पृष्ठा
अकदर्थनया १५७ | कृत्वापि
अन्येषु काव्या १९१ | चमत्कारम् ११
अथौचित्यवता ३८ | तस्यात्मजः १९
अलङ्कारा ८ | तिलकम् १
अवस्थौचित्य १०२ | तेषां परस्परा ८
आसीत् प्रकाशेन्द्र १९३ | देशौचित्येन १४
उचित १० | नाम्ना कर्मानुरूपेण १८
उचितम् ११ | पदे वाक्ये १
उचितस्थान १३१ | पूर्णार्थधातुः १८
उचितार्थं २४ | प्रतिभाभरणम् १६
उचितेन १७७ | प्रतिभाया
उचितेनैव ११६ | प्रस्तुतार्थौचितः ३
उचितैरेव १२० | यः श्रीस्वयं ९१
उपसर्गे १२ | यस्यासिः १९
औचित्यरचितम् १९ | यथा मधुर
औचित्यस्य ६ | योग्योप १२
कालौचित्येन १३४ | विशेषणैः १२
काव्यम् १५१ | श्रीरत्नसिंहे १०
काव्यस्या ७ | सगुणत्वम्
काव्यार्थः १४७ | सान्वयम् ९
कुर्वन्सर्वाशये ४५ | सारसङ्ग्रह १६
कुलोपचित १४४ | स्वभावौचित्यम् १६
कृतारिवञ्चने ५ |

मूलस्थोदाहरणश्लोकानुक्रमणिका
अत्र वल्कलजुषः १४८ | कृष्णेनाम्ब ७२
अथ स विषय १४५ | क्रोधम् १८४
अदय ! दशसि १६८ | क्षीणश्चन्द्रो १३१
अयि विरहविचित्ते १६० | क्षीबस्ये ८३
अभिनव ४१ | खगोत्क्षिप्ते ४०
अयि विजहीहि १३० | गन्तव्यम् ८९
अश्वत्थाम १७८ | गाण्डीव ८५
अहो वा हारे ७८ | ग्रीष्मम् १२६
आचारम् १२८ | चिताचक्रम् ४३
आदाय १११ | चुम्बनसक्तः ५३
आलोके ते १९१ | चंद्रे सूचित १२४
आलोला १९० | च्युतसुमनसः १३६
आश्चर्यम् १५६ | जयत्युपेन्द्रः १०५
आहारम् ९९ | जातम् २५
इदमसुलभ १८१ | ज्यानिह्विया २७
इह निवसति ११२ | ज्यायान् १७५
उत्पत्ति १४६ | झणज्झणित १९२
उद्धर्तयति १९२ | तत्र स्थितम् ११४
उद्दामोत्कलिकाम् ४६ | तपो न तप्तम् १६७
ऊरुमूल ३० | तारुण्येन १८३
एतस्माज्जल ११० | तीक्षणान्त ८७
एतस्या ३६ | त्रैलोक्याक्रमणं १२०
कण्ठे मेखलया १० | दणुइन्द ६०
कण्ठे कृत्तावशेषं ६६ | दनुजेन्द्र ६०
कर्णाटीदश १४१ | दिङ्मातङ्ग १०६
कर्णात्तालित १६२ | दिवि भुवि १५२
कामः कामम् १८९ | देवो दयावान् २०
कुसुमशयनम् ७६ | देवो जानाति १३३
कृशः काणः ७१ | धीरः स किर्मीर २०

( ५४ )
नदीवृन्दो १५४ | योऽभूद्गोप १३५
नष्टं वर्ष ६७ | योऽयमश्वः २६
नायं निशामुख १२२ | यो यः शस्त्रम् ५८
नाले शौर्यमहो २२ | लाङ्गूलेन १०१
निद्रां न ११७ | लावण्य १६
निर्याते १७० | वरुणरण ११८
नीवार ६९ | विरोधी ९०
परिम्लानम् १८ | वर्णप्रकर्षे ४९
पुण्ये ग्रामे १४९ | विविधगहन १६५
पुरा यत्र १४१ | विश्रान्त २९
पौलस्त्य १०८ | वृद्धास्ते ६४
प्रम्लाने १७९ | सीतेनोद्घोषितस्य ४४
प्रत्यग्रो ५५ | शौर्याराधित ६१
बालेन्दु ४८ | श्येनाङ्घ्रि १५८
बुभुक्षितं १५२ | स कोऽपि १८८
भक्तिः कातरताम् १६३ | सग्गम् ९६
भग्नाहित १०२ | सत्यं मनोरमा ८
भोगे रोगभयं ७५ | सदा सक्तम् १०
मग्नानि १४ | समस्ता ७
महाप्रलय ३३ | सम्बन्धी २
माणं मुञ्चध ९० | सर्वापाय ७
मानं मुञ्चत ९१ | सर्वे स्वर्ग १३
मार्गे केतक ५२ | सीधुस्पर्श ५
मुक्तः कन्दुक १७३ | स्तनयुग ९
मृत्योरास्य १३८ | स्त्रीणां मध्ये ६
यः प्रख्यातजवः ९४ | स्वर्गमपारिजातम् ९
यत्पावंतो २९ | हारो जलाद्रं ३
युद्धेषु ३५ | हा नृप हा १९
हा शृङ्गार ५

औचित्यविचारचर्चा

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॥ श्रीः ॥
औचित्यविचारचर्चा
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता
—: ० :—
कृतारिवञ्चने दृष्टिर्येनाञ्जनमलीमसा ।
अच्युताय नमस्तस्मै परमौचित्यकारिणे ॥ १ ॥
वन्दे गुरुचरणाब्ज-द्वन्द्वं प्रत्यक्षदेवरूपन्तम् ।
यान्ति महत्त्वं लोका यद्रजोलवलाभतोऽप्यत्र ॥
श्रीक्षेमेन्द्रकृतायाः सम्यगौचित्यविचारचर्चायाः ।
संस्कृत-हिन्दी-सहितां कुर्वे व्याख्यां प्रभेत्याख्याम् ॥
प्रारिप्सितग्रन्थप्रतिबन्धकीभूतविघ्नविनाशार्थं शिष्यशिक्षार्थञ्च महा-
मतिः क्षेमेन्द्रः स्वेष्टदेवतानमस्कारात्मकं मङ्गलमातनोति—कृतारिवञ्चने
इति । येन विष्णुना, अरिवञ्चने शत्रुप्रतारणे, विषयसप्तमीयम् । समुद्र-
मन्थनोपलब्धामृतवितरणकाले इति भावः । दृष्टिर्नेत्रयुगलम्, अञ्जनमली-
मसा कज्जलमलिना, कृता सम्पादिता, परमौचित्यकारिणे निरतिशयौ-
चित्यसम्पादकाय शत्रुवञ्चनोचितनारीवेषधारकायेति भावः । तस्मै प्रसि-
द्धाय अच्युताय, कदाचिदपि औचित्यच्युतिरहिताय विष्णवे नमः इति
सरलोऽर्थः । एतेनौचित्यविचारात्मकवस्तुनिर्देशोऽपि ध्वनितः ।
ग्रंथ-समाप्ति में विघ्न-प्रतिबन्धक और मंगल विघ्नविनाशक होता है, ऐसी
प्राचीन विद्वानों की मान्यता रहती आयी है । अतः वैष्णव मनीषी श्री क्षेमेन्द्र
भगवान् विष्णु को नमस्कार करने के व्याज से प्रस्तुत ग्रंथ-प्रतिपाद्य औचित्य का
भागवत-गुणसंपन्न होना सिद्ध कर रहे हैं—कृतारि इति । जिन्होंने (समुद्रमंथन
से प्राप्त अमृतवितरण के समय ) असुरों को ठगने के लिये मोहिनीरूप धारण कर
अपने नेत्रों को कज्जल से मलिन कर लिया अर्थात् पुंस्त्व का त्याग भी अंगीकृत
किया, औचित्य को समादृत करनेवाले तथा कभी भी उससे च्युत नहीं होने वाले
उन परब्रह्म परमात्मा भगवान् विष्णु को नमस्कार है ॥ १ ॥

२ औचित्यविचारचर्चा
कृत्वापि काव्यालङ्कारां क्षेमेन्द्रः कविकर्णिकाम् ।
तत्कलङ्कं विवेकञ्च विधाय विबुधप्रियम् ॥ २ ॥
औचित्यस्य चमत्कारकारिणश्चारुचर्वणे ।
रसजीवितभूतस्य विचारं कुरुतेऽधुना ॥ ३ ॥ (युग्मकम्)
विवेच्यवस्तु निर्दिशति—कृत्वापीति । क्षेमेन्द्रो ग्रन्थकर्ता, काव्याल-
ङ्काराम् काव्यस्य काव्याङ्गभूतेति यावत्, अलङ्कारा उपमारूपकादयो
यस्याम् इति व्यधिकरणपदो बहुव्रीहिः, अन्यथाऽलङ्कारशब्दस्य नित्य-
पुंल्लिङ्गतया स्त्रीलिङ्गत्वमसङ्गतं स्यात्, काव्यगतालङ्कारप्रतिपादिकामिति
भावः, कविकर्णिकाम् तन्नामकग्रन्थविशेषम्, कृत्वापि सम्पाद्यापि,
अपिना तत्करणेऽपि स्वपरितोषाभावः सूच्यते, च पुनः तत्कलङ्कम् काव्य-
कलङ्कम्, तन्नामकं काव्यदोषनिरूपणपरं निबन्धविशेषमिति यावत् ।
अथवा तत्कलङ्कम् तस्याः कविकर्णिकायाः, कलङ्कम् दोषम्, प्रमार्ष्टुमिति
शेषः, धातूनामनेकार्थत्वादुद्धृत्येत्यर्थक-विधायेतिल्यबन्तक्रियापदवाच्या-
न्वयार्थकम् कर्मपदं वैतत्, विवेकम् काव्यविवेकं तन्नामककाव्यलक्ष-
णादिनिरूपकग्रन्थविशेषम् अथवा विवेकम् वस्तुतत्त्वविचारं, विधाय
कृत्वा, द्वितीयकल्पतयोहितेनार्थेन “कविकर्णिकाकरणकालं यावत्, अल-
ङ्कारतत्त्वमेव काव्ये सर्वप्रधानं मन्यमानोऽहमासम्, परन्तु पश्चात्तन्-
निजमान्यतायां दोषो मया दृष्टः, अलङ्कारतत्त्वसूक्ष्मपरिशीलनेन च
औचित्यतत्त्वं सर्वतः प्रधानं मम ध्यानपथे समायातमिति रहस्यं
ध्वनितमवगन्तव्यम् । अधुना इदानीम्, तद्विधानानन्तरमिति यावत्,
चमत्कारकारिणः विच्छित्तिविशेषप्रयोजकस्य, चारुचर्वणे रमणीयास्वादे
सुन्दरास्वाददशायामिति यावत्, रसजीवितभूतस्य रसेऽपि सारभूतस्य
तदन्तरा रसनीयताविरहेण रसत्वस्यैवासम्भवात् । एतेन रसादेः प्रधानत्व-
प्रवादोऽलङ्कारादितत्त्वान्तरापेक्षिकः, सर्वतः प्रधानत्वन्तु औचित्यतत्त्व-
स्यैवेत्यर्थो ध्वनितः, औचित्यस्य वक्ष्यमाणलक्षणस्य काव्यात्मतत्त्वभूतस्य
विबुधप्रियं विशिष्टविद्वज्जनश्लाघ्यम्, एतेन साधारणपण्डितम्मन्यजन-
प्रियत्वाभावेऽपि नैतस्य विचारस्य किञ्चिच्छिन्नं भवतीति व्यज्यते,
विचारम् आलोचनम्, कुरुते विधत्ते इत्यर्थः । यशोलाभरूपस्य क्रियाफलस्य
कर्तृगामित्वेनात्मनेपदं बोध्यम् ॥ २-३ ॥
आचार्य क्षेमेन्द्र ने पहले कविकर्णिका नामक एक ग्रन्थ बनाया जिस

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ३
अलंकारों का निरूपण किया, अतएव कविकर्णिका का विशेषण काव्यालङ्काराम्
कहा। इस विशेषणबोधक पद में काव्य के अलङ्कार—उपमा-रूपक आदि हैं
जिसमें, इस तरह से बहुव्रीहि समास समझना चाहिए। अन्यथा काव्य को
अलंकृत करने वाली—इस अर्थ में "काव्यालङ्काराम्" ऐसा स्त्रीलिंग शब्द नहीं
संगत होगा। कारण अलंकार शब्द नित्य पुंल्लिङ्ग है। इसके बाद "काव्य-
कलंक अथवा कविकलं क" नाम का दूसरा निबन्ध भी उन्होंने लिखा, जिसमें
काव्यदोषों का विवेचन किया गया। फिर तीसरा ग्रंथ "काव्यविवेक" नाम का
रचा, जिसमें काव्यलक्षण, काव्यभेद आदि का वर्णन किया गया। तदुत्तर आज
इस "औचित्यविचारचर्चा" नामक पुस्तक का प्रणयन कर रहे हैं, ऐसा ग्रंथकार
का कथन है। यह पुस्तक उस औचित्य तत्त्व का विद्वन्मनोग्राही विचार है जो
काव्य में चमत्कार को उत्पन्न करता है और जो रमणीय आस्वादावस्था में
जाकर रस का भी जीवातुभूत सिद्ध होता है अर्थात् रस में भी रसनीयता लाने
का श्रेय जिसे प्राप्त है। तात्पर्य यह कि औचित्य के बिना आस्वाद्यता के अभाव
में रस रस कहलाने योग्य हो ही नहीं सकता।
यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य यह है कि "औचित्यविचारचर्चा" के
अतिरिक्त जिन तीन ग्रन्थों का निर्देश ऊपर किया गया है वे आज प्राप्त नहीं
होते। इतिहासलेखकों ने भी केवल "कविकर्णिका" का ही उल्लेख किया है,
"काव्यकलंक" और "काव्यविवेक" का नहीं। पर मुझे मूल पंक्ति का स्वा-
भाविक स्वारस्य ऐसा ही प्रतीत होता है जिसके अनुसार "तत्कलङ्क विवेकञ्च"
को भी ग्रन्थनिर्देशपरक ही समझना संगत है। यदि क्षेमेन्द्र द्वारा "काव्यकलंक"
और "काव्यविवेक" की रचना वाली बात नहीं ही मानी जाय तब उक्त पंक्ति
की व्याख्या किसी तरह यों की जा सकती है—क्षेमेन्द्र ने पहले कविकर्णिका
लिखी, फिर उसके कलंक-दोष ( त्रुटियों ) का मार्जन करने के लिये विवेक-समु-
चित विचार-करके औचित्य का विचार किया। तात्पर्य यह कि अलंकार तत्त्व
का गंभीर मनन करते-करते उन्हें उस तत्त्व में त्रुटि दीख पड़ने लगी—फिर चिर-
चिंतन से उन्हें औचित्य तत्त्व का उद्भास हुआ और उन्होंने झट से "औचित्य-
विचारचर्चा" रच डाला जिससे "कविकर्णिका" में जो कुछ त्रुटि रह गयी थी
उसका मार्जन हो गया ॥ २-३ ॥
काव्यस्यालमलङ्कारैः किं मिथ्यागणितैर्गुणैः ।
यस्य जीवितमौचित्यं विचिन्त्यापि न दृश्यते ॥ ४ ॥

४ औचित्यविचारचर्चा
यस्य काव्यस्य, जीवितं जीवनाधायकम्, औचित्यम् अनुरूपविधान-
रूपं, विचिन्त्यापि विचार्यापि, न दृश्यते न अवलोक्यते, तस्य काव्यस्य,
अलङ्कारैरुपमारूपकादिभिः, अलम् असति प्राणे भूषणमिव व्यर्थमिति
भावः, मिथ्यागणितैर्मृषाख्यातैर्गुणैरोजःप्रसादादिभिः किम् ? न किमपी-
त्यर्थः । यत्र काव्ये रसजीवातुभूतौचित्यमेव नास्ति तत्र गुणालङ्कारादि-
चिन्तनक्लेशो मुधैवेति भावः ॥ ४ ॥
जिस काव्य में तदात्मतत्त्व अचित्य का कुछ भी लेश न हो वहाँ अलंकार
तथा गुण का चिंतन सर्वथा निरर्थक है ॥ ४ ॥
अलङ्कारास्त्वलङ्कारा गुणा एव गुणाः सदा ।
औचित्यं रस-सिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् ॥ ५ ॥
अलङ्कारा अनुप्रासोपमादयः, अलङ्कारा एव बाह्यशोभाकराणि
भूषणान्येव, एतेषामलङ्कार्यत्वाभाव इति बोध्यम् । गुणा ये च प्रसाद

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ५
हारादिवल्लोकप्रसिद्धविविधभूषणवत्, अलंकारा एव भूषणान्येव, बाह्य-
शोभाकरत्वात् शब्दार्थरूपशरीरशोभातिशायितया अलंकारकत्वेनालंका-
र्य्यत्वाभावादित्यर्थः । येऽपि काव्यगुणाः ओजःप्रसादमाधुर्यादयः, केचन
कतिपये, आन्तरिकधर्मा गुणास्तल्लक्षणविचक्षणैर्गुणलक्षणाविष्कारकै-
र्विद्वद्भिः, समाम्नाता आख्यातास्तेऽपि श्रुतसत्यशीलादिवद् गुणा एव,
अर्थात् गुणगुणिनोर्भेदस्य सर्वविदातत्वेन तेषामप्यात्मस्थानीयत्वाभाव
इत्यर्थः । तत्र हेतुमाह—आहार्यत्वात् = आरोपविषयत्वात्-इति भावः ।
औचित्यन्तु वक्ष्यमाणलक्षणमनुरूपविधानरूपं, काव्यस्य स्थिरमविनश्वरं
जीवितं जीवनम् । तेन औचित्येन विना अस्य काव्यस्य गुणालङ्कार-
युक्तस्यापि निर्जीवत्वात् काव्योद्देश्यीभूतविच्छित्तिविशेषसम्पादकत्वा-
भावात् । धातुपदव्यवहार्यैः रसैः सिद्धस्य प्रसिद्धस्य रूपवत्तयाख्यातस्येति
यावत् । शरीरस्य नश्वरत्वेऽपि तदितर आत्मा यथा स्थिरस्तथैव रसेन
शृङ्गारादिना प्रसिद्धस्य काव्यस्य औचित्यमेव निश्चितं जीवनमिति
सारांशः ।
जिस तरह यथास्थान विन्यस्त कटक, कुंडल, केयूर, हार आदि लौकिक
आभूषण शरीर की शोभा को बढ़ाते हुए परंपरया आत्मा में भी विशेष गुणा-
धान करते रहते हैं उसी तरह उपमा, उत्प्रेक्षा आदि शास्त्रीय अलंकार रसादि
का उपकारक होते हुये भी काव्य के अलंकार ( भूषण ) ही हो सकते हैं, आत्मा
( अलंकार्य ) नहीं । कारण, अलंकार बाह्य धर्म हैं और आत्मा आन्तर पदार्थ
है । इसी तरह ओजः, प्रसाद आदि गुण आत्मधर्मिक होने पर भी गुण ही हैं,गुणी
अर्थात् काव्यात्मा नहीं, क्योंकि ये गुण भी आहार्य हैं — पीछे आरोपित होते हैं—
अर्थात् उनको छोड़कर भी अपनी सत्ता कायम रख सकते हैं फिर उन्हें आत्मा
कैसे कहा जा सकता है । कारण, आत्मा तो वह पदार्थ है जिसके बिना सत्ता ही
नहीं रह सके । अतः जैसे धातु शब्द से व्यवहृत रसों से प्राणी का शरीर नश्वर
होकर भी संसार में प्रसिद्धि तो पाता है, पर आत्मा उससे भिन्न अविनश्वर
पदार्थ ही माना जाता है, वैसे ही काव्य रस से जगत् में प्रसिद्धि लाभ करता है,
आत्मा तो उसका स्थिरतत्त्व औचित्य ही है । तात्पर्य यह है कि जैसे प्राणि-शरीर
में पंच महाभूत सबसे स्थूल और धातु उससे सूक्ष्म हैं, पर आत्मा उससे भी सूक्ष्म
तत्त्व है । उसी तरह काव्य में शब्द, अर्थ और उसके धर्म अलंकार सबसे स्थूल
तत्त्व हैं, रस तथा रसधर्म गुण उनसे सूक्ष्म तत्त्व अवश्य हैं, पर आत्मा का स्थान
उनसे भी सूक्ष्म तत्त्व औचित्य को ही दिया जा सकता है ।

उक्तार्थस्यैव विशेषमाह—
उचितस्थानविन्यासादलङ्कृतिरलङ्कृतिः ।
औचित्यादच्युता नित्यं भवन्त्येव गुणा गुणाः ॥ ६ ॥
मूलार्थमेव विवृण्वन्नाह—उचितेति । अलङ्कृतिर्लौकिकालङ्कारोऽपि
उचितस्थानविन्यासात् यथोचितस्थाने साधुन्यासादेव, अलङ्कृतिर-
लङ्कारपदवाच्यो भवितुमर्हति । एवमेव औचित्यादच्युता अपरिभ्रष्टा
एव गुणा गुणा भवन्ति, गुणतामासादयन्ति ॥
मूल अर्थ पर ही विशेष प्रकाश डालने के अभिप्राय से कहा जा रहा है—
उचितेति । अलंकार तथा गुण तभी अलंकार एवम् गुण कहलाने की क्षमता रखते
हैं जब वे औचित्य की सीमा से बाहर नहीं जाते, अर्थात् उचित स्थान में
विन्यस्त अलंकार ही अलंकार और उचित स्थान में प्रदर्शित गुण ही गुण कहला
सकते हैं अन्यथा नहीं ॥ ६ ॥
अलङ्कृतिरुचितस्थानविन्यासादलङ्कर्तुं क्षमा भवति, अन्यथा
त्वलङ्कृतिव्यपदेशमेव न लभते । तद्वदौचित्यादपरिच्युता गुणा गुणता-
मासादयन्ति अन्यथा पुनरगुणा एव ।
यदाह—
कण्ठे मेखलया नितम्बफलके तारेण हारेण वा,
पाणौ नूपुरबन्धनेन चरणे केयूरपाशेन वा ।
शौर्येण प्रणते रिपौ करुणया नायान्ति के हास्यता-
मौचित्येन विना रुचिं प्रतनुते नालङ्कृतिर्नो गुणाः ॥ ६ ॥
पूर्वोक्तार्थमेवोदाहरणादिना स्पष्टयति-अलङ्कृतिरिति । अलङ्कृति
भूषणसमूहः, उचितस्थानविन्यासादेव, अलङ्कर्तुं भूषयितुं, क्षमा समर्था
भवति । अन्यथा उचितस्थानविन्यासाभावे, अलङ्कृतिव्यपदेशमेव अल-
ङ्कारपदवाच्यत्वमेव, न लभते = न प्राप्नोति । स्थूलव्यत्ययेनालङ्कृतीनां
शोभाविशेषजनकत्वापेक्षया भद्रभावनाराहित्यस्यैव द्योतनत्वमुपपद्येतेति
भावः । तद्वदौचित्यादपरिच्युताः तथैव औचित्यादहीना एव गुणा गुण-
तामासादयन्ति गुणपदवाच्या भवन्ति, अन्यथा औचित्यराहित्ये पुनरगुणा
एव । कापुरुषादीनां शौर्यादिवर्णनेऽनन्विततया रसादिपोषणापेक्षया
तद्व्याघातस्यैव सम्भावनेति बोध्यम् ।

संस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ७
गुणाङ्कारयोरनौचित्येन गुणालङ्कारतेति दर्शनाय उदाहरणमुपस्था-
पयति—यदाहेति। कण्ठे इति। कण्ठे गले, मेखलया काञ्च्या, हारस्थाने
मेखलाधारणेनेति भावः, वा अथवा, नितम्बफलके कटिप्रदेशे, तारेण
निर्मलेन, हारेण मौक्तिकेन, मेखलास्थाने हारधारणेनेत्यर्थः, पाणौ करे,
नूपुरबन्धनेन, प्रणते शरणागते, शौर्येण वीरताप्रदर्शनेन, रिपौ शत्रौ,
करुणया दयाप्रदर्शनेन, के मनुष्याः, हास्यताम् उपहासयोग्यतां, न
आयान्ति = न प्राप्नुवन्ति ? सर्वेऽपि प्राप्नुवन्त्येवेति भावः (औचित्येन
विना अलङ्कृतिर्गुणा वा रुचिं शोभां न प्रतनुते न विस्तारयति। गुणपक्षे
प्रतन्वते इति वचनविपरिणामेनान्वयः ॥ ६ ॥
पूर्वोक्त अर्थ को ही उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करने के लिये कहा जा रहा है
अलङ्कृतिरिति । औचित्यरक्षण की मर्यादा ही अलंकार तथा गुणों को अलंकार
एवं गुण की संज्ञा देती है। उसके बिना न अलंकार अलंकार ( भूषण ) हो
सकता है और न गुण गुण ही । जैसे कर्णफूल ( जो कि एक सुन्दर कर्णाभरण है )
को कान के बदले नाक में पहन लेने पर वह नायिका के सौन्दर्य का पोषण न
कर शोषण ही करता है । अथवा शौर्य ( जो कि एक विलक्षण गुण है ) का
वर्णन किसी वीर के प्रसंग में न करके किसी कायर के प्रसंग में किया जाय तो
वहाँ रसादि पुष्ट न होकर दुष्ट ही हो जाता है । फिर वे अलंकार और गुण
कहलाने का दावा कैसे कर सकते हैं ? अर्थात् औचित्य ही वह तत्त्व है जो कि
अलंकार को अलंकार और वण को गुण कहलाने का अवसर प्रदान करता है ।
औचित्य-सुरक्षा के अभाव में अलंकार और गुण किस तरह अपनी महत्ता
खो देते हैं, इसी को दिखाने के लिये कहा जा रहा है—कण्ठे इति । यदि कोई
कामिनी, कंठ में कांची, कमर में हार, हाथ में पायजेब और पैर में केयूर पहनले
तो उसकी मूर्खता पर कौन उसकी हंसी नहीं उड़ायगा ? इसी तरह यदि कोई
पुरुष शरणागत पर वीरता का और शत्रु पर दया का भाव दिखाये तो वह भी
अवश्य उपहास का पात्र समझ जायगा । सत्य बात तो यह है कि औचित्य के
बिना न तो अलंकार शोभा प्रदान करते हैं और न गुण आकृष्ट ही कर
सकते हैं ॥ ६ ॥
किं तदौचित्यमित्याह—
उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य यत् ।
उचितस्य च यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते ॥ ७ ॥