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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ९
(१२ उपसर्गे क्रियायोगाश्रिते प्र-परादिरूपे, (१३) निपातेऽद्रव्यार्थके च-
वा-हेत्यादिरूपे, (१४) काले समये, (१५) देशे स्थानविशेषे, (१६) कुले
वंशपरम्परायाम्, (१७) व्रते नियमविशेषरूपे, (१८) तत्त्वे तत्त्वाख्याने
यथावद्वस्तुवर्णन इत्यर्थः, (१९) सत्त्वे सत्त्वस्यान्तर्बलस्य वर्णनायाम्,
(२०) अभिप्राये तात्पर्ये, (२१) स्वभावे प्रकृतौ, (२२) सारसंग्रहे निष्कृ-
ष्टार्थकथने, (२३) प्रतिभायां नवनवोन्मेषशालिबुद्धिरूपायाम्, (२४) अव-
स्थायां वयःक्रमे, (२५) विचारे विवेचनायां, (२६) नाम्नि संज्ञाभिधाने,
(२७) आशिषि आशीर्वादे । एतेषु च काव्याङ्गेषु व्यापि व्यापकं, जीवितं
जीवनमौचित्यमेव प्राहुर्मनीषिण इति भावः । एतद्ग्रन्थाशयमेव स्फोर-
यत्येतेष्विति । अयं भावः—कारिकोक्तं पदादिकमादायैव काव्यशरीरं
संपन्नं भवति । एवञ्च पदादिकं काव्यस्य शरीरस्य हस्तादिकमिव लब्धंश-
भूतम्, सकलतदंशव्यापिनस्तत्त्वस्यौचित्यस्यात्मत्वमुचितं न तु रसादे-
स्तस्य सकलतदंशव्यापित्वविरहात् । किञ्च काव्ये कारिकोक्तपदादि-
भिन्नोऽप्यंशः संभवति चेत् ? भवतु नाम, किन्तु मर्मभूता अंशास्त एव ।
तथा च यथा प्राणिशरीरगतमर्मस्थानेषु जायमानेनाघातेन प्राणोत्क्रमण-
क्रमेण जीवस्तच्छरीरं जहाति तथैव काव्यशरीरगतमर्मस्थलेषु पदादिषु
व्याघाते चमत्काराजननद्वारौचित्यं काव्यं परिहरति, येन तदकाव्यमेव
सम्पद्यते ॥ ८-१० ॥
औचित्य का क्षेत्र यद्यपि बहुत विस्तृत है, काव्य में ही नहीं अपितु लोक में
भी सब जगह औचित्य का ही साम्राज्य दृष्टिगोचर हो रहा है, फिर इसकी गणना
कर निश्चित संख्या बताना आसान काम नहीं है। तथापि दृष्टान्त के रूप में
ग्रंथकार ने सत्ताईस स्थानों का निर्देश किया है जो कि निम्नलिखित हैं :—
(१) पद, (२) वाक्य, (३) प्रबन्धार्थ, (४) गुण, (५) अलंकार, (६) रस,
(७) क्रिया, (८) कारक, (९) लिंग, (१०) वचन, (११) विशेषण, (१२) उपसर्ग,
(१३) निपात, (१४) काल, (१५) देश, (१६) कुल, (१७) व्रत, (१८) तत्त्व,
(१९) सत्त्व, (२०) अभिप्राय, (२१) स्वभाव, (२२) सारसंग्रह, (२३) प्रतिभा,
(२४) अवस्था, (२५) विचार. (२६) नाम, (२७) आशीर्वाद, अर्थात् काव्य के
मर्म के समान इन स्थानों में औचित्य की स्पष्ट प्रतीति होती है । सारांश यह है
कि जैसे प्राणि-शरीर के प्रत्येक अंश में व्याप्त तत्त्व का नाम आत्मा होता है,
उसी तरह काव्यशरीर के उक्त सभी अंशों में रहने वाले तत्त्व "औचित्य"