औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 256 में से
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उल्लिखितः परिज्ञायतेऽवबुद्ध्यते । वीरोचिततादृशकठिनविशेषणविशिष्टे
दुर्योधनदोषिण कोमलकमलनालसाम्यप्रतिपादनं नितरामयुक्तमित्यभिम-
तवीररसाभिव्यक्तौ व्याघातः समुत्पद्यतेऽत एवानौचित्यात्सम्पूर्णमेव
वाक्यमुपहासास्पदमिति सारांशो वेदितव्यः ॥ १२ ॥
उपर्युक्त पद्य में वर्णित दुर्योधन की बांह में जहाँ उतने कठिन विशेषण
प्रयुक्त किये गये हैं वहाँ कोमल कमलनाल की समता का कथन अत्यन्त अनुचित
है, जिसने वीररस-बोधनरूप कवि का तात्पर्य अपुष्ट हीन होकर सहृदयों के
हृदय में उपहासास्पद भी प्रतीत होता है। इस लिये यह वाक्यगत औचित्य का
ज्वलंत उदाहरण सिद्ध होता है । ॥ १२ ॥
प्रबन्धार्थौचित्यं दर्शयितुमाह—
उचितार्थविशेषेण प्रबन्धार्थः प्रकाशते ।
गुणप्रभावभव्येन विभवेनेव सज्जनः ॥ १३ ॥