औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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चमत्कार चमका देती है। तात्पर्य यह है कि जो गुर्जरराजमहिषी इतना भी
नहीं समझ पाती कि खड्गधारा से जलधारा की तरह प्यास नहीं बुझ सकती
उसके लिए मुग्धा पद का प्रयोग कितना वाञ्छनीय है, इसका अनुभव कोई
सहृदय ही कर सकता है।
न तु यथा धर्मकीर्तेः—
लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः क्लेशो महान्स्वीकृतः,
स्वच्छन्दस्य सुखं जनस्य वसतश्चिन्ताज्वरो निर्मितः ।
एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्वराकी हता,
कोऽर्थश्चेतसि वेधसा विनिहितस्तन्व्यास्तनुं तन्वता ॥
पदगतौचित्यं प्रदर्श्य सम्प्रति तदनौचित्यं प्रदर्शयितुमाह-नतु यथेति।
लावण्येति। कस्या अप्यलौकिककान्तिमय्याः कामिन्याः सौन्दर्यवर्णनेयम्।
लावण्यद्रविणव्ययो लावण्यं सौन्दर्यरूपमेव यद् द्रविणं द्रव्यन्तस्य व्ययो
न, गणितः संख्यातः, महानतिशयः, क्लेशो दुःखं तन्निर्माणे श्रम इति
यावत्, स्वीकृतोऽङ्गीकृतः, स्वच्छन्दस्य स्वतन्त्रस्य, सुखं वसतो निश्चिन्त-
तया सुखपूर्वकं तिष्ठतो निश्चिन्तजीवनं यापयत इति भावः, जनस्य
मानवस्य कृते इति शेषः, चिन्ताज्वरश्चिन्तारूपतापमयरोगविशेषो
निर्मितो रचितः । तुल्यरमणाभावादनुरूपप्रियतमाभावात्, एषापीयमपि
वराकी दुःखदग्धेति भावः, स्वयमेव नतु परेण हता नष्टा, (तर्हि) तन्व्याः
कृशाङ्गयाः, तनुं शरीरं, तन्वता सृजता, वेधसा विधात्रा, चेतसि
चित्ते, कोऽर्थः—कोऽभिप्रायः, विनिहितः स्थापित इति न जाने-इति शेषः।
पदगत औचित्य को दिखलाकर अभी तद्गत अनौचित्य को दिखलाने के लिए
कहा गया है—नतु यथेति। किसी अलौकिक कान्तिमयी कामिनी की प्रशंसा में
कवि कह रहा है कि विधाता ने इस तन्वी की शरीर-रचना कर अपने हृदय में
किस लाभ की आशा की थी पता नहीं, क्योंकि इसके निर्माण में सौन्दर्य-सम्पत्ति
का जो अपार व्यय हुआ उसकी तो गिनती ही नहीं की, ऊपर से परिश्रम भी
खूब ही करना पड़ा। इस तरह अपनी हानि तो हुई ही, साथ ही आज तक
स्वच्छन्द और सुखमय जीवन बितानेवाले पुरुषजाति के हृदय में कामिनी-जिज्ञासा
जगाकर चिंतारूप एक व्याधि की सृष्टि कर दी। इतना ही नहीं, अनुरूप
प्रियतम के अभाव में यह बेचारी खुद भी बेमौत मारी गयी। यदि ब्रह्मा के