औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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अवश्य करता है और वह सम्भवतः परोपकारी भी हुआ करता है, इसलिये मैं
विधिविडम्बनावश कान्तावियोगजन्य क्लेश को पाकर तुमसे सन्देश पहुँचाने की
याचना करता हूँ क्योंकि कापुरुष के द्वारा सफल की गयी याचना की अपेक्षा
सत्पुरुष के द्वारा विफल बनाई गयी याचना भी कहीं श्रेष्ठ है ।
अत्राचेतनस्य चेतनाध्यारोपेण मेघस्य दौत्ययोग्यताधानाय प्रथित-
पुष्करावर्तकपर्जन्यवंश्यत्वममात्यप्रकृतिपुरुषत्वञ्च यदुपन्यस्तं तेन समस्त-
प्रबन्धस्योत्प्रेक्षितेतिवृत्तप्रचिरतरस्य निरतिशयमौचित्यमुद्योतितम् ।
अत्राचेतनस्याप्राणिनश्चेतनाध्यारोपेण प्राणित्वारोपेण मेघस्य, दौत्य-
योग्यताधानाय दूतकर्मकारित्वस्थापनाय, प्रथितपुष्करावर्तकपर्जन्यवंश्य-
त्वं प्रसिद्धपुष्करावर्तककुलप्रसूतत्वम्, अमात्यप्रकृतिपुरुषत्वञ्चेन्द्रसचिवप्रधा-
नव्यक्तित्वञ्च, यदुपन्यस्तं यस्मात्प्रतिपादितं, तेन उत्प्रेक्षितं कल्पितं यदि-
तिवृत्तमितिहासस्तेन रुचिरतरस्य समस्तप्रबन्धस्य, निरतिशयमत्यन्तं यथा
स्यात्तथौचित्यमनुरूपत्वमुद्योतितं प्रकाशितम् ।
यहाँ मेघ के द्वारा ( जो कि चेतन न होकर एकमात्र जब पदार्थ है ) संदेश
पहुँचाने की कामना की गयी है, यह बात असंगत कही जा सकती थी, परन्तु खुद
यक्ष ने ही इसका भी परिहार कर दिया है, अर्थात् वंशगत उच्चता के साथ ही
मेघ में व्यक्तिगत महत्ता भी है । ऐसे व्यक्ति से पर-पीड़ा की अवहेलना की आशा
नहीं की जा सकती, इसलिये मेरा मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा । साथ ही अपनी
असफलता का भान भी उसे है ही, उसी के निराकरण के लिये अन्तिम पद के
द्वारा आत्मतोष कर रहा है । इस तरह अचेतन में चेतन का आरोप कर मेघ में
दूतकारिता की स्थापना करने के लिये वंशगत और व्यक्तिगत उच्चता का जो
वर्णन किया गया है उससे कल्पित इतिहास भी संगत प्रतीत होने लगता है, जिससे
सम्पूर्ण प्रबन्ध ही औचित्य से चमत्कृत हो उठता है ।
यथा वा भवभूतेः—
( नेपथ्ये )
योऽयमश्वः पताकेयमथवा वीरघोषणा ।
सप्तलोकैकवीरस्य दशकण्ठकुलद्विषः ॥
लवः—( सगर्वमिव ।) अहो सन्तापनान्यक्षराणि । भो, भोः !