औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 71, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वामिन् ! मग्नानि लीनानि, इति एवंभूतायां वन्दिवाचि वन्दिजन-
समुच्चारितवाण्यां, पुरा, बहुशोऽनेकवारं, श्रुतायामाकर्णितायां सत्यां,
मुग्धा सरलचित्ता, गुर्जरभूमिपालमहिषी गुर्जरभूमिपालस्य गुर्जरपृथिवी-
पतेः, महिषी राज्ञी, पाथसो जलस्य, प्रत्याशया पिपासामभिसान्त्वयितुम्,
आशाविशेषेण, कान्तारे वने, चकिता सती, पत्युः स्वामिनः, कृपाणे
खड्गे, दृशौ नेत्रे, विमुञ्चति प्रक्षिपतीत्यर्थः ।
पदगत औचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—यथा परिम-
लस्येति । मग्नानीति—जंगल में सरल हृदयवाली गुर्जर देश की सम्राज्ञी चकित
होकर अपने पति की तलवार को दोनों आँखों से देख रही है और कह रही है
कि—हे नाथ ! बन्दीजनों के मुख से पहिले मैंने अनेकों बार सुन रखा है कि युद्ध
में आपके तलवार की धारा के जल में शत्रुओं के झुंड के झुंड डूब गये हैं, परन्तु
अभी इसकी धारा के जल से मेरी प्यास क्यों नहीं बुझ पाती ? बेचारी रानी
इतनी भोली है कि उसे पता नहीं कि इस खड्गधारा को प्यास मिटाने की
क्षमता नहीं है, शत्रुओं को भले ही डुबा दे । यह पद्य गुर्जरराजविजेता किसी
राजा की स्तुति में किसी कवि के द्वारा कहा गया है ।
अत्र मुग्धापदेनौचित्यचमत्कारिणी सूक्तिः शरदिन्दुवदनेव श्याम-
तिलकेन श्यामेव शुभ्रविशेषकेण विभूषिता सकलकविकुलललामभूतां
विच्छित्तिमातनोति ।
अत्र अर्थौचित्यचमत्कारिणाभिधेयौचित्यचमत्कारप्रवणेन, मुग्धा-
पदेन मुग्धेतिपदप्रयोगेण, सूक्तिः, श्यामतिलकेन कस्तूर्यादिघटितकृष्ण-
बिन्दुना, विभूषिता, शरदिन्दुवदना शरच्चन्द्रानना गौरीति यावत्, इव,
शुभ्रविशेषकेण श्रीखण्डद्रवतिलकेन, विभूषिता, श्यामा श्यामवर्णा नायि-
केव च, सकलकविकुलललामभूतां समस्तसरसजनस्पृहणीयां विच्छित्तिं
चमत्कारस्, आतनोति विस्तारयतीत्यर्थः । कृपाणधारातः पिपासा-
शान्तिमिच्छन्त्याः गुर्जरराजमहिष्याः मुग्धेतिविशेषणतया प्रयोगं कुर्वाणः
कविः सम्पूर्णमपि पद्यं चमत्कारचर्चितमिवाकरोदिति सुतरां पदगतौ-
चित्यमत्रेति ।
उपर्युक्त पद्य में अर्थौचित्य के कारण चमत्कार को उत्पन्न करने वाले मुग्धा
( भोली ) पद के प्रयोग से यह सूक्ति श्याम तिलक से चन्द्रानना एवम् स्वच्छ
तिलक से श्यामा की तरह समस्त सरस सम्प्रदाय के हृदय में एक अपूर्व ही