औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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आत्म-संज्ञा प्राप्त करता है, और जैसे प्राणि-शरीर के मर्मभूत स्थानों पर आघात
होने से प्राण-निष्क्रमण द्वारा आत्मा शरीर को त्याग देता है, उसी तरह काव्य-
शरीर के मर्मभूत पूर्वोक्त स्थानों में किसी प्रकार की गड़बड़ी होने से औचित्य
काव्य का परित्याग कर देता है । फिर वह काव्य कहलाने का अधिकारी नहीं
रह जाता है ॥ ८-१० ॥
तेषूदाहरणानि क्रमेण दर्शयितुमाह—
तिलकं बिभ्रती सूक्तिर्भात्येकमुचितं पदम् ।
चन्द्राननेव कस्तूरीकृतं श्यामेव चान्दनम् ॥ ११ ॥
एकमेवोचितं पदं तिलकायमानं बिभ्राणा सूक्तिः समुचितपरभाग-
शोभातिशयेन रुचिरतामावहति ।
उपर्युक्तौचित्योदाहरणप्रदर्शनक्रमे प्रथमं पदगतौचित्यं विवेचयति-
तिलकमिति । कस्तूरीकृतं मृगमदविरचितं श्याममिति यावत्, तिलकमिव
विशेषकं, बिभ्रती धारयन्ती, चन्द्राननेव गौरवर्णनायिकेव, चान्दनं
श्रीखण्डद्रवकल्पितं धवलमिति यावत्, तिलकं, बिभ्रती, श्यामेव श्याम-
वर्णा कामिनीव च तिलकं तिलकवदाचरत्, एकमप्युचितं पदं किमुत
बहूनि पदानि, बिभ्रती, सूक्तिः काव्यरूपा वाक्, भाति शोभते, इत्यर्थः
वृत्त्यर्थः स्पष्ट एव ।
जैसे शरदिन्दुवदना सुन्दरी के ललाट पर कस्तूरीविरचित श्याम तिलक और
श्यामवर्णा कामिनी के भाल पर श्वेत चन्दन का एक भी टीका उनके सौन्दर्य में
चार चांद लगा देता है वैसे ही एक भी समुचित पद-पदान्तर की शोभा को
बढ़ाती हुई संपूर्ण सूक्ति ( काव्यात्मक वाणी ) में अपूर्व मधुरिमा का संचार कर
देता है ॥ ११ ॥
यथा परिमलस्य—
मग्नानि द्विषतां कुलानि समरे त्वत्खड्गधाराकुले,
नाथास्मिन्निति वन्दिवाचि बहुशो देव श्रुतायां पुरा ।
मुग्धा गुर्ज्जरभूमिपालमहिषी प्रत्याशया पाथसः,
कान्तारे चकिता विमुञ्चति मुहुः पत्युः कृपाणे दृशौ ॥
पदगतमौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा परिमलस्येति । मग्नानीति । हे देव
राजन् ! त्वत्खड्गधाराकुले त्वत्खड्गप्रवाहेणाकुले व्याप्ते, अस्मिन्
सद्योजाते, समरे युद्धे, द्विषतां शत्रूणाम्, कुलानि समूहाः, नाथ