औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
( ३३ )
महिमभट्ट
यद्यपि महिमभट्ट ने आनन्दवर्धन के द्वारा स्थापित ध्वनि-पदार्थ का खण्डन
कर रस आदि व्यङ्ग्य अर्थों को अनुमेय सिद्ध करने के उद्देश्य से अपने प्रसिद्ध
ग्रन्थ व्यक्तिविवेक का निर्माण किया है, तथापि इस मुख्य विषय के उपपादन-
क्रम में अनेक काव्य-सिद्धान्तों का उल्लेख उन्होंने किया है। ऐसी स्थिति में यदि
हम काव्यसम्बन्धी व्यापक तत्त्व औचित्य का भी विश्लेषण व्यक्तिविवेक में
पाते हैं तो यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। व्यक्तिविवेककार ने प्रसङ्गवश
एक जगह लिखा है कि—"औचित्य एक ऐसा काव्यतत्त्व है को काव्य-स्वरूप के
निरूपण की महिमा से स्वतःसिद्ध है, अतः पृथक् उसकी चर्चा व्यर्थ है।
विभाव, अनुभाव और संचारीभाव का वर्णन करना ही कवि का कर्तव्य है,
दूसरा नहीं। वे ही विभावादि शास्त्रानुगार कवि के द्वारा उपनिबद्ध होने पर
रसाभिव्यक्ति के हेतु होते हैं, अन्यथा नहीं। काव्य की आत्मा है रस,
फिर उसमें अनौचित्य के स्पर्श की संभावना भी कैसे हो सकती है? जब
अनौचित्य की काव्य में संभावना ही नहीं तब उसको हटाने के लिये जो
पण्डितगण भिन्न-भिन्न तरह के काव्यलक्षणों की सृष्टि करते हैं वह सर्वथा
व्यर्थ है१। इस प्रतिपादन से सिद्ध होता है कि महिमभट्ट काव्य में औचित्य के
समर्थक थे। प्रसङ्गान्तर्गत उनकी उक्तियों से भी इस बात की पुष्टि होती है।
महिमभट्ट का दोषविवेचन बड़ा प्राञ्जल है। इस प्रसङ्ग पर उन्होंने कहा है कि
“अनौचित्य ही काव्य का एकमात्र सर्वातिशायी दोष है जिसके अन्तर्गत समस्त
दोषों का अन्तर्भाव किया जा सकता है। अनौचित्य का सामान्य लक्षण है कवि
के द्वारा वाञ्छित रस आदि की प्रतीति में विघ्नकारी होना२।” आगे चलकर
आहृतम्, क्वचिदौचित्यत्यक्तं सदप्यन्यथासम्पाद्यम् सहृदयहृदयाह्लादनाय। (४।४
वी कारिका की वृत्ति।)
१. तस्य (अनौचित्यस्य) काव्यस्वरूपनिरूपणसामर्थ्यसिद्धस्य पृथगुपादान-
वैयर्थ्यात्। विभावाद्युपनिबन्ध एव हि कविब्यापारो नापरः। ते च यथाशास्त्र-
मुपनिबध्यमानारसाभिव्यक्तेर्निबन्धनभावं भजन्ते, नान्यथा। रसात्मकं च काव्य-
मिति कुतस्तत्रानौचित्यस्पर्शः संभाव्यते, यन्निरासार्थमित्थं काव्यलक्षणमाचक्षीरन्
विचक्षणम्मन्याः। (व्य० वि० पृ० १२६)
२. एतस्य (अनौचित्यस्य) विवक्षितरसादिप्रतीतिविघ्नविधायित्वं नाम
सामान्यलक्षणम्। (व्य. वि., उन्मेष २, पृ. १५२)
पुनः उन्होंने कहा है कि—"दो प्रकार के अनौचित्य काव्य में हो सकते हैं—
( १ ) अर्थविषयक और ( २ ) शब्दविषयक । उन दोनों में प्रथम—अर्थात्
अर्थविषयक अनौचित्य का लक्षण है विभावादिकों का रसों में अयथायथ
( प्रतिकूलतापूर्ण ) निवेश । यही अनौचित्य अन्तरङ्ग है और इसका विवेचन
प्राचीन आचार्यों ने ही कर दिया है, अतः मैं अपने ग्रन्थ में उसका विस्तार नहीं
करना चाहता ।
दूसरा—अर्थात् शब्दविषयक अनौचित्य के बहुत प्रकार हो सकते हैं, जैसे—
विधेयाविमर्श, प्रक्रममेद, क्रमभेद, पौनरुक्त्य और वाच्यावचन १ ।
रस तथा औचित्य के विषय में महिमभट्ट आनन्दवर्धन के ही अनुयायी हैं ।
आनन्दवर्धन के समान महिमभट्ट ने भी अनौचित्य को प्रधान दोष स्वीकार किया
है । समग्र दोष रस के व्याघातक होते हैं । इसीलिये महिमभट्ट ने रसानौचित्य
अन्तर्गत समस्त दोष प्रकरण का समावेश कर दिया है२ । इन सभी विवेचनों
से वही एक बात पुष्ट होती है कि महिमभट्ट के भी विचारानुसार औचित्य
काव्य का सर्वातिशायी उपादान है ।
क्षेमेन्द्र
ऐतिहासिक क्रम से महिमभट्ट के बाद ही औचित्य के आधार पर एक
नवीन सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य क्षेमेन्द्र ने इस धराधाम में पदार्पण किया
और अमरभारती के भण्डार को विविध ग्रन्थरत्नों से परिपूर्ण करने में अपने
जीवनकाल का उपयोग किया । औचित्यविचारचर्चा इन्हीं की अमर कृति है
१. इह खलु द्विविधमनौचित्यमुक्तम्, अर्थविषयं शब्दविषयं चेति । त
विभावानुभावव्यभिचारिणाम् अयथायथं रसेषु यो विनियोगः तन्मात्रलक्षणमेव
मन्तरङ्गमाचार्यैरेवोक्तमिति नेह प्रतन्यते । अपरं पुनः बहिरङ्गं बहुप्रकारं संभवति
तद्यथा विधेयाविमर्शः, प्रक्रमभेदः, क्रमभेदः, पौनरुक्त्यं, वाच्यावचनञ्चेति ।
( व्य० वि०, उ० २ पृ० १४९-५१
२. कथञ्चिद्वा भिन्नक्रमतयापि अभिमतार्थसंबंधोपकल्पने प्रस्तुतार्थप्रतीतौ
विघ्नितत्वात् तन्निबन्धनो रसास्वादोऽपि विघ्नितः स्यात्, शब्ददोषाणा
अनौचित्योपगमात् तस्य च रसभङ्गहेतुत्वात् । यदाहुः--
अनौचित्यादृते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम् ।
प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत् परा ॥ (व्य० पृ० १३
( ३५ )
यद्यपि औचित्यतत्त्व की उद्भावना सर्वप्रथम इन्हीं के द्वारा इसी ग्रन्थ में नहीं
हुई, अपि तु चिरकाल से सभी आचार्य अपने-अपने ग्रन्थों में थोड़ी-बहुत चर्चा
इस तत्त्व की अवश्य कर गए थे तथापि इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि
मुख्यरूप से औचित्य का साङ्गोपाङ्ग वर्णन इसी ग्रन्थ में आकर हुआ और
औचित्य-सम्प्रदाय का उदय साहित्य-संसार में इस ग्रन्थरत्न के निर्माण हो चुकने
पर ही हुआ ।
अतः क्षेमेन्द्र विदग्ध मण्डली में औचित्य के व्यवस्थापक होने से चिरस्मर-
णीय रहेंगे । औचित्यतत्त्व को काव्य के सर्वातिशायी उपादान के रूप में प्रति-
ष्ठित करने का श्रेय विज्ञ आलोचकवर्ग सदा क्षेमेन्द्र को प्रदान करता रहेगा ।
क्षेमेन्द्र से पश्चाद्भावी आलङ्कारिक
यद्यपि साहित्यिक जगत् के लिये एक प्रकार से इसे दुर्भाग्य का ही विषय
समझा जा सकता है कि क्षेमेन्द्र के द्वारा प्रवर्तित औचित्य-सम्प्रदाय को किसी
अनन्तर्भावी आचार्य ने अग्रसर नहीं किया, तथापि औचित्यतत्त्व का अपलाप
किसी ने नहीं किया है ! मम्मट १ से लेकर पण्डितराज तक की आलंकारिक
परम्परा ने भी अपने-अपने ग्रन्थों में किसी न किसी रूप से इस तत्त्व के प्रति
आस्था अवश्य प्रकट की है। खासकर दोषविवेचन के अवसर पर सभी ने
औचित्य का, निषेधमुखेनैव सही, पर स्मरण अवश्य किया है । यद्यपि यह बात
कही जा सकती है कि औचित्यतत्त्व का स्मरण करते समय इन आचार्यों के
मानसपटल पर, क्षेमेन्द्र नहीं, अपितु आनन्दवर्धन ही उदित थे और उदित थी
आनन्दवर्धन की 'अनौचित्यादृते नान्यत् रसभङ्गस्य कारणम्' यह सुविख्यात
पङ्क्ति, तथापि क्षेमेन्द्र-स्थापित सिद्धान्त-पोषकता तो उन लोगों की सिद्ध होती
ही है। मेरे कथन का उद्देश्य भी उतना ही है।
पाश्चात्त्य आलोचक और औचित्य
अब यहाँ जिज्ञासु पाठकों के लाभ को दृष्टि में रखकर, संक्षेप में, औचित्य
में संबन्ध रखने वाले पाश्चात्य आलोचकों के मतों का दिग्दर्शन कराया जा रहा
रहा है ।
पाश्चात्य साहित्य-शास्त्रकारों में प्राचीन आलोचकों ने 'औचित्य' का
१. मम्मट-क्षेमेन्द्र समकालीन थे।
( ३६ )
विचार किया है, नवीन आलोचकों ने नहीं। प्राचीनों की भी औचित्यविषयक
आलोचना भारतीय आचार्यों की आलोचना के सामने नगण्य-सी है, क्योंकि
पाश्चात्यों की आलोचना के अनुसार 'औचित्य' काव्य का बहिरङ्ग साधन मात्र
है और भारतीयों की आलोचना के अनुसार वह काव्य का ही नहीं, अपितु सकल
ललित कलाओं का अन्तरङ्ग साधन है--प्राण है।
पाश्चात्यों ने प्रकृत्यौचित्य, घटनौचित्य, वर्णौचित्य—आदि औचित्य के
कतिपय प्रकारों का ही विवेचन किया है जो काव्य के बहिरङ्ग साधन हैं। उन
लोगों की पहुँच रस तक प्रायः नहीं हो सकी, अतः वे उक्त बहिरङ्ग तत्त्वों में
ही उलझे रहे। फलतः उनकी औचित्यसमीक्षा उतनी मौलिक अथच गूढ़ नहीं
हो सकी, जितनी रसवादी भारतीयों की।
औचित्य के ऊपर प्रकाश डालने वाले पाश्चात्य आलोचकों में अरस्तू
लाञ्जिनस, होरेस और पोप के नाम विशेषरूप से लिए जा सकते हैं।
अरस्तू के दो ग्रन्थ पाश्चात्य आलोचना-जगत् में परम प्रसिद्ध हैं--(१)
पोएटिक्स तथा (२) रेटारिक। दोनों ही ग्रन्थों में औचित्य-तत्त्व की समीक्षा की
गई है।
(१) नाटक का दृश्य वास्तविक होना चाहिए, काल्पनिक नहीं, जिससे द्रष्टा
को उन दृश्यों के देखते समय असत्यता का भान नहीं हो। इस प्रसङ्ग पर अरस्तू
का कथन है कि "नाटक में जो दृश्य दिखलाये जाँय उन्हें उचित होना चाहिए।
उचित घटनाओं के प्रदर्शन से ही नाटककार की अभीष्ट-सिद्धि होती है। वस्तु-
जगत् से असंबद्ध घटनाओं का प्रदर्शन नाटक में सर्वथा वर्जनीय होता है।१"
यह है अरस्तू का घटनौचित्य।
(२) पद्य को ललित बनाने के अनेक उपाय हैं, परन्तु गद्य को सुन्दर
बनाने का एकमात्र उपाय रूपक की योजना है, ऐसा अरस्तू मानते हैं। साथ-
साथ यह भी मानते हैं कि रूपक को औचित्य-युक्त होना चाहिए, क्योंकि
अनौचित्यपूर्ण रूपक गद्य का भूषण नहीं, दूषण हो जाता है। "वर्णनीय वस्तु
की उत्कृष्टता दिखलाने के लिये तज्जातीय उत्कृष्ट गुणयुक्त वस्तु के साथ और
निकृष्टता दिखलाने के लिये हीनगुणसम्पन्न वस्तु के साथ रूपक बाँधना
चाहिए।२" यह है अरस्तू का रूपकौचित्य।
१. देखिए—पोएटिक्स, पृ० ६१
२. देखिए—अरस्तू : रिटॉरिक, पृ० २३२
( ३७ )
(३) भाषणकला के कुछ नियम हैं भाषण की शैली भावद्योतक तथा
नीतिपूर्ण होनी चाहिए । साथ ही विषय के अनुरूप होनी चाहिए । अनुरूप-शैली
से अभिप्राय है कि¹--विषय के उदात्त होने पर रचनाप्रकार को क्षुद्र नहीं होना
चाहिए । विषय के साधारण होने पर रचनाप्रकार को क्षुद्र नहीं होना चाहिए ।
विषय के साधारण होने पर रचना-प्रकार को उदात्त कभी नहीं होना चाहिए ।
इसी प्रकार महत्त्वहीन शब्द के संबन्ध में अलंकृत तथा विचित्र विशेषणों का
प्रयोग सर्वथा अनुचित होता है । अतः भाषण करते समय अथवा लिखते समय
विषय की अनुरूपता का ध्यान अवश्य रखना चाहिए । यह है अरस्तू का
विषयौचित्य ।
(४) अरस्तू ने 'रेटारिक' के तृतीय खण्ड के सप्तम परिच्छेद में 'औचित्य'
( Propriety ) का विस्तृत वर्णन किया है । वक्ता को श्रोतृ-हृदय-वशीकरण-
रूप निजोद्देश्य को सिद्ध करने के लिये अपने मनोभावों का प्रभाव श्रोताओं के
ऊपर डालना पड़ता है । श्रोताओं के हृदय को वशीभूत करने का मुख्य उपाय
है रसानुकूल भाषा का प्रयोग² । अनादर-भावाभिव्यञ्जन के लिये क्रोधपूर्ण
भाषा का प्रयोग करना चाहिए । क्षुद्रता की अभिव्यक्ति के लिये वक्ता को उस
( क्षुद्र वस्तु ) का नाम ग्रहण भी नहीं करना चाहिए । प्रशंसनीय वस्तु के वर्णन
में भाषा भी तदनुरूप होनी चाहिए । हार्दिक भावों की अभिव्यक्ति भाषा के
द्वारा ही होती है । अतः भाव तथा भाषा में अनुरूपता नितान्त अपेक्षित है । इन
दोनों का सामञ्जस्य ही वक्ता तथा लेखकों की सफलता का रहस्य है ।
लाङ्गिनस ( २१३ ई०-२७३ ई० ) द्वारा रचित ग्रन्थ On the
Sublime पाश्चात्य आलोचनाशास्त्र का मौलिक ग्रन्थ माना जाता है । वे
कविता में ही नहीं, अपितु समग्र ललित कलाओं में चमत्कृतिजनक वस्तु—
'भव्यता' ( Sublimity ) को मानते हैं । इस भव्यता के विधान के विविध
प्रकारों के विवेचन-क्रम में ही उन्होंने औचित्य का भी विचार किया है ।
(१) लाङ्गिनस अलंकारों के द्वारा भी काव्य में भव्यता का उदय मानते
हैं । अलंकार शब्द तथा अर्थ को सुन्दर बनाते हुए काव्य में भव्यता के प्रधान
कारण होते हैं । अलंकार और भव्यता में परस्परोपकार्योपकारकभाव सा होता
१. देखिए--रिटॉरिक, खण्ड ३, परि० ७, पृ० २४५
२. देखिए--रिटॉरिक, खण्ड ३, परि० ७, पृ० २४५
है--अलंकार भव्यता का वर्धक होता है और भव्यता से अलंकार की चमत्कृति
चौगुनी हो उठती है ।
किन्तु समस्त अलंकारों में यह क्षमता नहीं रहती है । जिनको सत्ता पृथक्
रूप से पाठकों को भासित नहीं हो वे ही अलंकार काव्य में श्रेष्ठ समझे जा सकते
हैं । अलंकारों की अलंकारत्वभावना यदि पाठक के ध्यान में नहीं आवे तो
वही अलंकार सुन्दरतम प्रतीत होता है । लाङ्गिनस का यह अलंकारौचित्य बहुत
कुछ आनन्दवर्धन के 'अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यः सोऽलंकारो ध्वनौ मतः' से समानता
रखता है ।
(२) लाङ्गिनस ने शब्दौचित्य पर अधिक ध्यान दिया है । उचित शब्दों के
चुनाव पर कविता का प्रभाव विशेषरूप से अवलम्बित रहता है । उचित पद-
विन्यास से काव्य अथवा भाषण में जीवनीशक्ति की वृद्धि होती है । जिस
काव्य अथवा भाषण में जितनी अधिक सप्राणता होगी वह उतना ही अधिक
पाठकों अथवा श्रोताओं को चमत्कृत-प्रभावित कर सकेगा । शब्दौचित्य की महिमा
विलक्षण होती है । सुन्दर तथा उचित शब्द अर्थ का वास्तविक आलोक है ।
उचित अर्थ की अभिव्यक्ति करने की योग्यता उचित शब्द ही में रहती है ।
परन्तु कवि को इस विषय में सदा सावधान रहना चाहिए कि भव्य तथा
माहात्म्यमण्डित शब्दों का प्रयोग भव्य विषय के वर्णन में ही किया जाय । यदि
भव्य पद का प्रयोग तुच्छ--अभव्य पदार्थ के वर्णन में किया जायगा तो वह
उपहासास्पद होता है ।
इस प्रकार लाङ्गिनस काव्य में औचित्य के प्रबल पक्षपाती हैं । उनके
विचार से शब्दौचित्य का विधान काव्य में सौन्दर्य, शक्ति, प्रभाव, महत्त्व तथा
भव्यता का उत्पादक होता है तथा अन्य आवश्यक काव्यगुण का भी उदय स्वतः
हो जाता है ।
होरेस (६५ ई० पू०-८ ई० पू०)--लैटिन भाषा के अति लोकप्रिय कवि
हैं । आलोचना के विषय में इनकी प्रसिद्ध पुस्तक है--Art Poetica-Art of
Poetry--'काव्यकला' । यह अपूर्ण ग्रन्थ है । फिर भी काव्यविवेचना में यह
ग्रन्थ अप्रतिम समझा जाता है । होरेस 'औचित्य' के परम पुजारी हैं । इन्होंने
कवियों को लक्ष्य कर तीन उपदेश दिये हैं-- ( १ ) ग्रीक आदर्शों का अनुकरण
करो, ( २ ) पात्र के स्वरूप की रक्षा करो तथा ( ३ ) औचित्य के संरक्षण
( ३९ )
पर सर्वाधिक ध्यान दो। औचित्य के विषय में होरेस के सिद्धान्त भरत के
नाट्यशास्त्र में प्रतिपादित अनेक तथ्यों के साथ पूर्ण सादृश्य रखते हैं। होरेस
नाटक अथवा काव्य के कथानक के विषय में अपना मन्तव्य प्रकट करते हुए
लिखते हैं कि कविपरम्परागत अथवा नवकल्पित—दोनों प्रकार के कथानकों का
ग्रहण कर सकता है, पर परम्परागत कथानक के ग्रहण करने पर उस परम्परा
का विधिवत् पालन करना चाहिए और नवीन कथानक की कल्पना में इस बात
पर ध्यान रखना चाहिए कि जो पात्र प्रथमबार जिस रूप में अङ्कित किया जाय
उस पात्र के उस रूप का निर्वाह अन्त तक हो। उग्र रूप में अवतीर्ण पात्र का
स्वरूप-निर्वाह अन्त तक उसकी उग्रता की रक्षा करने में ही होता है। दया का
अवतार पात्र यदि दानवता का नग्न नर्तन करने लगे तो वह अपने स्वरूप से
अत्यन्त च्युत हो जाता है१। होरेस का यह नियम भरत के 'प्रकृत्यौचित्य' के
अन्तर्गत आता है।
होरेस ने अभिनय-कला के विषय में बड़ा ही मार्मिक विवेचन किया है।
उनका कथन है कि अभिनय एक विशिष्ट कला है और इसमें औचित्य का
आश्रय प्रधान है। दुःखद शब्दों के उच्चारण करते समय अभिनेता का चेहरा
उदास होना चाहिए, डाट-डपट करते समय उसकी मुखमुद्रा क्रुद्ध की-सी होनी
चाहिए, हँसी की वार्ता में चेहरा खिलता होना चाहिए और गम्भीर वार्ता
के लिये मुखमंडल को गंभीरता नितान्त आवश्यक है। होरेस का यह
अभिनयोचित्य है।
अभिनय रङ्गमञ्च पर वस्तु के प्रदर्शन से अथवा वस्तु के कथन से आरम्भ
होता है। परन्तु कौन वस्तु रङ्गमञ्च के ऊपर अभिनययोग्य है ? कौन-सी
नेपथ्यगृह से सूचनीय है ? इसके लिए कवि को सदा सावधान रहना चाहिए।
जो घटना दर्शकों के चित्त में घृणा अथवा अश्लीलता का भाव उत्पन्न कर
सकती है उसका प्रदर्शन किसी भी प्रकार से उचित नहीं माना जा सकता।
मीड़िया के द्वारा अपने पुत्रों का वध क्या कभी रङ्गमञ्च के ऊपर दर्शकों के
समक्ष अभिनीत किया जा सकता है ? कारण स्पष्ट है—अनौचित्य। होरेस का
यह नियम क्षेमेन्द्र का घटनौचित्य है। संस्कृत के आलोचकों में भरत से लेकर
विश्वनाथ तक—सभी नाट्यवस्तु के दो प्रकार मानते हैं—एक 'संसूच्य' तथा
१. देखिए--होरेस : आर्ट ऑफ पोयट्री।
( ४० )
दूसरा 'दृश्य'। पहली की केवल अर्थोपक्षेपक के द्वारा सूचना दी जाता है, परन्तु
दूसरी घटना रङ्गमञ्च के ऊपर अभिनीत होती १ है ।
इसके अतिरिक्त होरेस ने छन्दों के औचित्य की भी चर्चा की है । इस
प्रकार ग्रीक आलोचकों ने औचित्य ( Propriety ) की कमनीयता ललित
कलाओं में पर्याप्तरूप से स्वीकृत की है । सचमुच यूनानी आलोचनापद्धति
( Classical Criticism ) का सर्वस्व औचित्य रहा है ।
महाकवि पोप ने भी औचित्य के अनेक प्रकारों को अपने आलोचना-ग्रन्थ
में स्थान दिया है । पोप का ग्रंथ ( Essay of Criticism ) प्राचीन मान्य
सिद्धान्तों का पद्यबद्ध समुच्चय है । इनमें वर्णौचित्य के ऊपर उन्होंने बहुत
जोर दिया है । उनका कथन है कि कविता में केवल उद्वेगकारी कर्णकटुता
का अभाव ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता, अपितु वर्ण्य अर्थ की प्रतिध्वनि
अवश्य होनी चाहिए । मलयानिल के बहने के अवसर पर प्रयुक्त शब्दों में
सुकुमारता तथा कोमलता होनी चाहिए, मन्द लहरिका का प्रवाह कोमल पदों
में प्रवाहित होता है, परन्तु जब प्रचण्ड झंझावात से आन्दोलित भीषण तरङ्ग
तटों पर टकराता है; तब ओजस्वी पद्य भी तुमुल प्रवाह की तरह घोर गंभीर
गर्जन करता है । पोप का अभिप्राय है कि वर्णनीय वस्तु तथा तत्प्रतिपादक
शब्दों में मधुर सामञ्जस्य होना चाहिए । पोप का यह काव्यतत्त्व होगा-आनन्द-
वर्धन का वर्णध्वनि, कुन्तक का वर्णवक्रता तथा क्षेमेन्द्र का वर्णौचित्य । एक ही
तत्त्व भिन्न-भिन्न आलंकारिकों की कल्पना में भिन्न-भिन्न अभिधान से अभिव्यक्त
किया गया है ।
ऊपर के विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है कि औचित्य-तत्त्व की महत्ता जिस
तरह भारतीय आलोचकों ने स्वीकार की है उसी तरह पाश्चात्य आलोचकों
भी । अन्तर केवल यह है कि पाश्चात्य आलोचना-पद्धति में रस-सत्ता के प्रति-
पादन नहीं होने से औचित्य काव्य का एक बहिरङ्ग उपादान के रूप में अङ्गीकृत
१. द्वेधा विभागः कर्तव्यः सर्वस्यापीह वस्तुनः ।
सूच्यमेव भवेत् किञ्चिद् दृश्यश्रव्यमथापि वा ॥
नीरसोऽनुचितस्तत्र संसूच्यो वस्तुविस्तरः ।
दृश्यस्तु मधुरोदात्तरसभावनिरन्तरः ॥
( दशरूपक १।५६, ५७ )
हुआ है और भारतीय आलोचना-पद्धति में रस के साथ स्थिर सम्बद्ध होने के
कारण औचित्य अन्तरङ्गतम काव्यतत्त्व माना गया है ।
भारतीय आलोचना जगत् में भी इस तत्त्व का विकास क्रमशः हुआ है।
भरत ने केवल नाट्य में औचित्य सिद्धान्त को सूचित किया। आनन्दवर्धन ने
उसे नाट्य और काव्य (दृश्य और श्रव्य) उभय क्षेत्रों में परिवृंहित किया।
क्षेमेन्द्र ने इस तत्त्व को काव्य-मन्दिर में प्राण-प्रतिष्ठा की। औचित्य के विषय
में मौलिक कल्पना करने वाले ये ही तीन आचार्य हैं। अन्य अलंकार शास्त्रीय
निबन्ध-प्रणेता आचार्यों ने इस तत्त्व का उल्लेख तो प्रकट अथवा प्रच्छन्न रूप
से अवश्य किया, पर इसके सम्बन्ध में कोई कोई मौलिक बात किसी ने नहीं
कही। हाँ इतनी बात अवश्य कही जा सकती है कि औचित्य को व्यापक काव्य-
तत्त्व प्रायः सबों ने स्वीकार किया है। भारतीय आलोचना-जगत् का एक युग
ऐसा भी था जब औचित्य काव्यात्मा के रूप में, उद्घोषित हुआ था। स्वतन्त्र
औचित्य-संप्रदाय कायम हो चुका था, जिस पर प्रहार किया भरत तथा आनन्द-
वर्धन के प्रसिद्ध
( ४२ )
[चित्र :
रस
औचित्य | रीति
वक्रोक्ति
गुण अलंकार
ध्वनि | अनुमिति]
साहित्यशास्त्र के सिद्धान्तों का इतिहास औचित्य से आरम्भ कर 'अलंकार'
तक का विकास है। इस चित्र के बड़े वृत्त पर दृष्टिपात कीजिए। यह काव्य के
अन्तरङ्ग-अर्थात् प्राणभूत तत्त्व की समीक्षा करता है। इस पूरे वृत्त की परिधि
है—औचित्य, जिसे भारतीय आलंकारिकों ने व्यापकतम काव्यतत्त्व अङ्गीकृत
किया है। इस वृत्त के भीतर जो बड़ा त्रिकोण है उसका शीर्षस्थान है रस और
नीचे के कोण हैं ध्वनि और अनुमिति। रस का शीर्षस्थान सूचित करता है कि
भारत के किसी साहित्य-सम्प्रदाय में रसतत्त्व की अवहेलना नहीं है। ध्वनि और
अनुमिति मतभेद से उसके दो अभिव्यक्ति-प्रकार हैं। अनुमितिवादी भी रस का
अपलाप नहीं करते, अपितु उसके बोध के लिए व्यञ्जना की आवश्यकता नहीं
मानकर उसका स्थान अनुमिति को देते हैं। अनुमिति यहाँ ध्वनिविरोधी सभी
मतों का प्रतीक है।
भीतरी वृत्त में काव्य के बाह्य उपकरण तथा स्वरूप का विवेचन है। वृत्त
की परिधि 'वक्रोक्ति' है जो बृहत् वृत्त का स्पर्श कर रही है। वक्रोक्ति कवि
के कथन का एक विशिष्ट प्रकार है। इस वृत्त के भीतर एक त्रिकोण है जिसके
ऊपरी बिन्दु है--रीति, और निचले बिन्दु हैं गुण और अलंकार। रीति,
गुण और अलंकार ये तीनों तत्त्व काव्य के बहिरङ्ग साधन हैं और इनका वक्रोक्ति
का आश्रित होना नितान्त आवश्यक है। इस प्रकार इस ग्राफ में अलंकार-
शास्त्र के समस्त संप्रदायों का पारस्परिक संबन्ध व्यवस्थित रूप से दिखलाया
गया है¹।
१. भूमिका का यह अंश मुख्यतया आदरणीय पं० श्री बलदेव उपाध्यायजी
( ४३ )
औचित्यविचारचर्चा
'औचित्य विचारचर्चा' एक महत्त्वपूर्ण अलंकार-ग्रन्थ है । इसके रचयिता
आचार्य क्षेमेन्द्र हैं । क्षेमेन्द्र ने यद्यपि अनेक ग्रन्थों की रचना की है, परन्तु उनका
सबसे मुख्य ग्रन्थ यही है, उनकी अमर कीर्ति में 'चार चाँद' लगाने का श्रेय इसी
ग्रन्थ को है । इस ग्रन्थ में औचित्य का विशद विश्लेषण अति प्रांजल भाषा में
किया गया है । सर्वप्रथम मङ्गलवोधक पद्य के द्वारा औचित्य को भागवत गुण
सिद्ध किया गया है जिसका विवरण भूमिका के प्रारम्भ में ही आ चुका है ।
इसके बाद ग्रन्थकार ने ग्रन्थनिर्माणपरक प्रतिज्ञा-वाक्य लिखा है । तदनन्तर
औचित्य तत्त्व की महिमा का गान है । इसी प्रसंग पर भरत के--
अदेशजो निवेशस्तु न शोभां जनयिष्यति ।
मेखलोरसिबन्धे च हास्यायैवोपजायते ॥
इस कथन के आधार पर निम्नलिखित सूक्ति की सृष्टि की गई है ।
कण्ठे मेखलया नितम्बफलके तारेण हारेण वा,
पाणौ नूपुर-बन्धनेन चरणे केयूर-पाशेन वा ।
शौर्येण प्रणते रिपौ करुणया नायान्ति के हास्यताम्,
औचित्येन विना रुचिं प्रतनुते नालंकृतिर्नो गुणाः ॥
कण्ठ में मेखला ( डड़कस ) बाँधने से या नितम्ब पर लम्बे हार पहनने से
अथवा हाथ में नूपुर बाँधने से या पैर में केयूर रखने से कौन व्यक्ति लोक में
हँसी का पात्र नहीं बनता ? नतानन पर शूरता और शत्रु पर करुणा दिखलाने
वाला व्यक्ति क्या अपने को उपहासास्पद नहीं कर लेता है ? तथ्य बात यह है
कि औचित्य के बिना न तो अलंकार ही रुचिकर प्रतीत होते हैं और न गुण !
भूषणतत्त्व का प्रधान आश्रय औचित्य ही है ।
इसके बाद औचित्य का लक्षण किया गया है—
उचितं प्राहूराचार्याः सदृशं किल यस्य यत् ।
उचितस्य च यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते ॥
कृत 'भारतीय साहित्यशास्त्र' के आधार पर संकलित किया गया है, अतः
लेखक उनका आभारी है ।
( ४४ )
जो वस्तु जिसके अनुरूप होती है उसे हम 'उचित' कहते हैं और उचित
का भाव ही 'औचित्य' कहलाता है। यद्यपि यह लक्षण उतना अनुगत नहीं
है तथापि पाठकों के मानसपटल पर औचित्य की एक व्यावहारिक रूपरेखा इससे
अवश्य खिंच जाती है।
इसके अनन्तर औचित्य के प्रभेद किये गए हैं, जिनकी संख्या क्रमशः पद,
वाक्य, प्रबन्धार्थ, गुण, अलंकार, रस, क्रिया, कारक, लिङ्ग, वचन, विशेषण,
उपसर्ग, निपात, काल, देश, कुल, व्रत, तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह,
प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम, और आशीर्वाद के रूप में सत्ताईस ( २७ )
गिनाई गई है।
ये प्रभेद उपलक्षणमात्र हैं। वस्तुतः औचित्य के अनन्त भेद हो सकते हैं।
काव्य के प्रत्येक अङ्ग तथा उपांग पर इस तथ्य का व्यापक प्रभाव है। इस बात
को ग्रन्थकार ने स्वयं ग्रंथ-समाप्ति के अवसर पर स्पष्ट लिखा है। "अन्येषु
काव्याङ्गेषु अनयैव दिशा स्वयमौचित्यमुत्प्रेक्षणीयम् । तदुदाहरणानि आनन्त्यान्न
प्रदर्शितानि अलमतिप्रसङ्गेन।" यही औचित्यविचार-चर्चा की अन्तिम पङ्क्ति है।
इन गिनाए गए २७ प्रभेदों को हम पाँच वर्गों में विभक्त कर सकते हैं।
पद, वाक्य और प्रबन्ध ये तीन प्रथम वर्ग में रक्खे जा सकते हैं, जो मीमांसा-
दर्शन से संबद्ध विषय हैं। दूसरे वर्ग में गुण, अलंकार और रस का स्थान आता
है, जो काव्यशास्त्र अथवा अलङ्कारशास्त्र की वस्तुएँ हैं। तीसरे वर्ग में क्रिया,
कारक, लिंग वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात तथा काल का समावेश हो सकता
है, जो सबके सब व्याकरणशास्त्र के पदार्थ हैं। चतुर्थ वर्ग में देश, कुल एवम्
व्रत आ सकते हैं, जिनका संबन्ध लोकतन्त्र से है।
पञ्चमवर्ग में आते हैं—तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह, प्रतिभा
अवस्था, विचार, नाम और आशीर्वाद, इनका संबन्ध वक्ता—कवि से है
इनमें आदिम चार वर्ग प्रसिद्ध काव्याङ्ग हैं, इन पर प्राचीन काव्याचार्यों
द्वारा अनेक प्रकार के विचार किए जा चुके थे, पर क्षेमेन्द्र ने इन पर भी ए
नवीन दृष्टिकोण से, किन्तु पूर्वाभास के रूप में ही विचार किया है।
पंचमवर्ग आचार्य क्षेमेन्द्र की मौलिक देन है। भारतीय आलोचना-पद्ध
( ४५ )
में आचार्य ने एक नया दृष्टिकोण उपस्थित किया है। कारण, 'कला में सौन्दर्य
है अथवा नहीं' ? यह उतना आलोचना का विषय नहीं है, जितना 'कला में
सौन्दर्य आता कहाँ से है' यह—अर्थात् गुण, रीति, अलंकार अथवा रस का
ही समावेश काव्य में हुआ है, किंवा नहीं यही नहीं देखना है आलोचकों को,
अपितु मुख्यतः यह देखना है कि इन वस्तुओं का समावेश किस ढंग से हुआ है,
इन वस्तुओं के समावेशार्थ जो ढंग अपनाया गया है वह उचित है अथवा नहीं।
फलतः प्रतिपाद्य वस्तु की ओर से हटा कर अपना ध्यान आलोचकों को
प्रतिपादन करने वाले कवि की ओर ले जाना चाहिए। सारांश यह कि कला-
गत सौन्दर्य का रहस्य कवि-हृदय में छिपा रहता है, वस्तु में नहीं। पर भारतीय
आलोचकों का दृष्टिकोण वस्तुपरक ही अधिक रहा। आचार्य क्षेमेन्द्र ने उक्त
पंचम वर्ग का समावेश अपनी 'चर्चा' में करके जो अन्तर्वीक्षा प्रस्तुत की है,
वह निस्सन्देह नूतन और श्लाघ्य है। अस्तु।
ग्रन्थ का स्वरूप
पूर्वकथित प्रभेदों के क्रमशः पहले कारिका के द्वारा स्वरूप और लौकिक
दृष्टान्तमूलक साहित्यिक स्तर निर्णीत किये गए हैं । फिर उदाहरण तथा प्रत्यु-
दाहरण द्वारा उन प्रभेदों का स्पष्टीकरण किया गया है । उदाहरण तथा प्रत्यु-
दाहरण के पद्य कुछ तो अपने अन्य ग्रन्थों से और कुछ विभिन्न कवियों के
काव्यों से उद्धृत किये गए हैं ।
बीच बीच में गद्य के द्वारा कारिकाओं तथा उदाहरण-प्रत्युदाहरण पद्यों
की व्याख्या की गई है । सामान्यतः ग्रन्थ का यही स्वरूप है ।
आलोचना में सर्वत्र ईमानदारी बरती गई है । औचित्य के उदाहरणरूप में
ही नहीं, प्रत्युदाहरणरूप में भी अपने पद्यों को ग्रन्थकार ने उद्धृत किया है ।
तत्तत् औचित्य का स्तर निश्चित करते समय कारिकाओं के द्वारा अनूठे लौकिक
दृष्टान्तों का प्रयोग किया गया है । जैसे—
तिलकं बिभ्रती सूक्तिर्भात्येकमुचितं पदम् ।
चन्द्राननेव कस्तूरीकृतं श्यामेव चान्दनम् ॥
तिलक के समान औचित्यपूर्ण एक पद वाली सूक्ति ( काव्यवाक्य ) शोभित
होती है । कैसे ? जैसे गौरवर्णा कामिनी कस्तूरीकृत काली बिन्दी से और
श्यामाङ्गी चन्दनरचित धवल विशेषक ( बिन्दी ) से । कैसा मनोहर दृष्टान्त है !
गौराङ्गी के भाल पर काली बिन्दी का और श्यामांगी के ललाट पर धवल
बिन्दी का औचित्य और तज्जन्य शोभातिशय का अनुभव सभी सहृदयों को
अवश्य होगा ।
सम्पूर्ण ग्रन्थ में इसी तरह के रुचिर दृष्टान्तों का सन्निवेश किया गया है ।
आलोचना की मार्मिकता देखते ही बनती है । बानगी के तौर पर एक दो स्थलों
का प्रदर्शन ही पर्याप्त होगा—
मग्नानि द्विषतां कुलानि समरे त्वत्खड्गधाराकुले,
नाथास्मिन्निति बन्दिवाचि बहुशो देव ! श्रुतायां पुरा ।
मुग्धा गुर्ज्जरभूमिपालमहिषी प्रत्याशया पाथसः,
कान्तारे चकिता विमुञ्चति मुहुः पत्युः कृपाणे दृशौ ॥
( ४७ )
कवि किसी राजा की स्तुति में कहता है कि हे राजन् ! गुर्जर देश के
अधिपति, जो आपके आक्रमण से भयभीत होकर सपत्नीक वन में भटकते फिरते
हैं की मुख्य रानी पहले बन्दिजनों के द्वारा बार-बार सुन चुकी थी कि युद्ध में
शत्रुओं का समूह तेरो तलवार की तीक्ष्ण धारा में डूब मरा, अब वह मुग्धा रानी
आज इस वनवास-काल में चकित होकर जल की आशा से बार-बार पति की
तलवार पर अपनी दृष्टि डाल रही है ।
इस पद्य में 'मुग्धा' यह एक पद ऐसा है जिसके चलते सम्पूर्ण पद्य सार्थक,
सुसंगत अर्थ च सुन्दर हो जाता है—सहृदय-हृदयहारी सिद्ध होता है। यदि वह
नहीं रहता तो सम्पूर्ण पद्य असंगतार्थक होकर सहृदयों के उद्वेग का कारण बन
जाता, क्योंकि तलवार की धार में जल की आशा करना उपहासास्पद है । पर
मुग्धा के लिये ऐसा करना नितान्त-उचित है, पदौचित्य के उदाहरण में यह पद्य
उद्धृत हुआ है । जरा पद के अनौचित्य की भी बानगी देखिए—
लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः क्लेशो महान् स्वीकृतः
स्वच्छन्दस्य सुखं जनस्य वसतश्चिन्ता ज्वरो निर्मितः ।
एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद् वराकी हता
कोऽप्यर्थश्चेतसि वेधसा विनिहितस्तन्व्यास्तनुं तन्वता ॥
विधाता ने एक सुन्दरी की सृष्टि की । उसकी सृष्टि करने में सौन्दर्यरूप
धन का व्यय तो करना ही पड़ा साथ-साथ कष्ट भी विधाता को कम नहीं
हुआ । पर फल क्या हुआ ? कुछ नहीं । स्वच्छन्द तथा सुखपूर्वक संसार में
बसने वाले युवकजन के हृदय में चिन्ताज्वर उत्पन्न हो गया —अर्थात् इस
सुन्दरी की प्राप्त्याशा में सब चिन्तित रहने लगे । और वह बेचारी—जिसकी
सृष्टि विधाता ने महान् व्यय तथा श्रम स्वीकार करके की--भी अपने अनुरूप
पति के नहीं मिलने से बेमौत मारी गई । ऐसी स्थिति में इस तन्वी के तनु
की सृष्टि करते हुए विधाता ने अपने मन में कौन-सा प्रयोजन रक्खा था ?
पता नहीं ।
श्लोक के शब्द तथा अर्थ--दोनों ही सुन्दर हैं, पर इस पद्य में एक पद
ऐसा अनुचित कह दिया गया है जिसके चलते 'सब गुड़ गोबर' हो जाता है ।
और वह अनुचित पद है 'तन्वी' । यह पद दुर्बलता का द्योतक है, अतः इसका
प्रयोग किसी विरहिणी के प्रसङ्ग में उचित हो सकता है । यहाँ तो विरह का
कोई प्रसङ्ग है नहीं । यहाँ तों सौन्दर्य 'सुन्दरी' आदि पद का प्रयोग उचित
( ४८ )
होता । कितनी सूक्ष्म तथा मार्मिक आलोचना है । सर्वत्र इसी तरह की मार्मिक
आलोचना प्राप्त होती है । यहाँ सब का उल्लेख संभव नहीं, और अवतारणा
का कलेवर विपुल हो जाने का भी भय है । अतः पाठकों को उन मार्मिक
आलोचनाओं से आनन्द का अनुभव करने के लिये ग्रन्थ का अध्ययन करना
चाहिए । इस ग्रन्थ में कारिकाओं की संख्या उनचालिस है और उदाहरण-
प्रत्युदाहरण के रूप में एक सौ पाँच श्लोक तैंतिस विभिन्न ग्रन्थों से उद्धृत
किये गये हैं । इनमें क्षेमेन्द्र के ग्यारह काव्यग्रन्थों के पैंतिस श्लोक हैं जो कि
औचित्य तथा अनौचित्य दोनों के उदाहरण में आए हैं । एक श्लोक
प्रस्तुत ग्रन्थ की दृष्टि से ही लिखा गया है । इस तरह छत्तिस श्लोक इनके
अपने हुए ।
इसके अतिरिक्त राजशेखर के दश, कालिदास के विभिन्न चार ग्रन्थों से
आठ, भवभूति के एक ग्रन्थ से तीन, श्रीहर्ष के पाँच, बाणभट्ट के दो ग्रन्थों से
तीन, व्यास का एक, चन्द्रक के चार, वराहमिहिर का एक, परिमल के चार,
अमरुक के दो, माघ का एक, दीपक के तीन, धर्मकीर्ति का एक, नारायणभट्ट के
दो, मालवरुद्र के दो, कर्पटक का एक, श्यामलक का एक, प्रवरसेन के दो,
राजपुत्र मुक्तापीड का एक, गौड़ कुम्भकार का एक प्रभाकरभट्ट का एक,
उत्पलराज का एक, महेन्दुराज के दो, मातृगुप्त का एक, भट्ट लट्टन का एक,
कुमारदास का एक, श्रीचन्द्र का एक, मालवकुवलय का एक, भट्ट भल्लट का
एक, परिव्राजक का एक, उपाध्याय गङ्कक का एक और यशोवर्मदेव का एक
श्लोक उदाहरण-प्रत्युदाहरण के रूप में उद्धृत हुए हैं । इस तरह इस ग्रन्थ के
अध्ययन से बहुतेरे ऐसे कवियों का पता हमें मिलता है जिनकी कृतियों से
विद्वन्मण्डली अपरिचित है ।
महाकवि क्षेमेन्द्र
प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रणेता महाकवि क्षेमेन्द्र, संस्कृत भाषा के महाकवियों में
भी अलौकिक प्रतिभाशाली महाकवि थे जिनकी प्रतिभा ने साहित्य के विभिन्न
क्षेत्रों में अपना चमत्कार दिखलाया । सरस्वती के ये वरदपुत्र शारदा देश
अर्थात् काश्मीर के निवासी थे, परन्तु जब ये उत्पन्न हुए थे तब काश्मीर का
वातावरण कविता जैसी कोमल कला के अनुशीलन के लिये नितान्त अनुपयुक्त
था । काश्मीर के इतिहास में वह युग असन्तोष, षड्यन्त्र, नैराश्य तथा रक्तपात
का काल था । तत्कालीन राजा अनन्त स्वयं मानसिक दुर्बलता का तथा
( ४६ )
बौद्धिक शिथिलता का पात्र था। तभी तो उसने १०६३ ई० में अपने ज्येष्ठ
पुत्र कलश को राज्य देकर भी थोड़े ही वर्षों के अनन्तर पुनः उसे ग्रहण
कर लिया। इसके अनन्तर वह १०७७ ई० में राज्य-कार्य से वस्तुतः विरत
हुआ और कुछ ही वर्षों के बाद, १०८१ ई० में, उसने आत्महत्या कर ली,
और उसकी विदुषी महारानी सूर्यवती भी अपने पति की चिता पर सती
बन गई।
इन्हीं पिता-पुत्र अनन्त ( १०२८ ई०--१०६३ ई० ) तथा कलश
( १०६३ ई०--१०८९ ई० ) के राज्यकाल, में क्षेमेन्द्र की जीवन-लीला
व्यतीत हुई।
इनके पूर्वपुरुष राजा के अमात्य-पद पर प्रतिष्ठित थे। क्षेमेन्द्र अपने युग के
अशान्त वातावरण से इतने असन्तुष्ट तथा मर्माहत थे कि उसे सुधारने में तथा
पवित्र और विशुद्ध बनाने के लिए और दुष्टता के स्थान पर शिष्टता की और
स्वार्थ के स्थान पर परार्थ की भावना को दृढ़ करने के लिये, अपनी द्रुतगामिनी
लेखनी को काव्य के नाना अङ्गों की रचना में लगाया। इसी का रुचिर परिणाम
है—क्षेमेन्द्र का विशाल-साहित्य '
महर्षि वेदव्यास के आदर्श पर रचना करने वाले ये महाकवि नाम्ना ही नहीं
प्रत्युत यथार्थतः 'व्यासदास' थे।
इनकी प्रतिभा बहुमुखी थी। इनकी लेखनी से जिस तरह अलंकारशास्त्र के
उत्तमोत्तम अनेक ग्रन्थ उत्पन्न हुए उसी तरह अनेक महाकाव्य और खण्डकाव्य
सम्पन्न हुए। इनके ग्रन्थों में सभी रसों के अनूठे पद्य प्राप्त होते हैं। इनकी
नीतिमय कविताओं का साम्राज्य देखते ही बनता है। हास्यरस के तो संस्कृत
साहित्य में एकमात्र प्रतिनिधि कवि क्षेमेन्द्र हैं। इन्होंने एक नवीन प्रकार के
आख्यानों का निर्माण किया है, जिसमें हास्य के व्याज से शोभन उपदेश प्रदान
किया गया है। 'देशोपदेश' तथा 'नर्ममाला' ऐसी कथाओं से परिपूर्ण हैं।
क्षेमेन्द्र का उदात्त उद्देश्य है—तत्कालीन राजनैतिक बुराइयों, सामाजिक
दोषों और कमजोरियों को दिखलाकर उनका निराकरण करना। कवि का
कथन है कि हास्य के द्वारा प्रदर्शित युक्ति श्रोताओं के हृदय पर गहरी चोट
करती है, श्रोताओं के मर्मस्थान को विद्धकर उन्हें दोषयुक्त होने की प्रेरणा
देती है।
( ५० )
इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये 'देशोपदेश' में गौड़ छात्र पर तथा 'नर्ममाला'
में राज्य के अधिकारियों, जैसे कायस्थ, नियोगी, चाक्रिक आदि पर बड़ी मीठी
चुटकियाँ ली गई हैं ।
जनता के चरित्र के सुधार तथा मनोरञ्जन की भावना से प्रेरित होकर
ही क्षेमेन्द्र ने रामायण तथा महाभारत की प्रख्यात कथाओं का संक्षिप्त वर्णन
रामायणमञ्जरी तथा भारतमञ्जरी ( रचनाकाल १०३७ ई० ) के नाम से
प्रस्तुत किया ।
इसके बाद क्षेमेन्द्र ने शालिवाहन ( हाल ) के सभाकवि गुणाढ्य द्वारा
पैशाची भाषा में रचित वृहत्कथा ( इसका मूलरूप आज अप्राप्त है ) का सरस
पद्यानुवाद प्रस्तुत कर प्राचीन कहानियों का खजाना पाठकों के लिये
खोल दिया ।
क्षेमेन्द्र की दूसरी विशाल कथात्मक कृति है 'बोधिसत्त्वावदान-कल्पलता'
जिसमें भगवान् बुद्ध के प्राचीन जन्मों से संबद्ध पारमितासूचक आख्यानों का
पद्यबद्ध वर्णन है। 'अवदान' का अर्थ है--शुभ्रचरित्र ।
क्षेमेन्द्र रचित 'सुवृत्ततिलक' छन्दःशास्त्र का अमूल्य ग्रन्थ है। इस तरह
वस्तुतः क्षेमेन्द्र अपने युग के महान् लेखक थे इसमें किसी को विप्रतिपत्ति नहीं
हो सकती ।
क्षेमेन्द्र वैष्णवधर्मावलम्बी थे, पर आज-कल के कतिपय वैष्णवों के समान
दुराग्रही नहीं थे। इनकी धार्मिक भावना अत्यन्त उदार थी । ये ब्राह्मणजातीय
थे यह बात उनके पूर्वजों के राजामात्य होने से भी सिद्ध होती है, क्योंकि
अमात्यपद पर प्राचीनकाल में ब्राह्मणों की ही नियुक्ति होती थी ।
क्षेमेन्द्र के ग्रन्थ
१. अमृततरङ्गकाव्यम्, २. अवसरसारः, ३. कनकजानकी, ४. औचि[त्य-]
विचारचर्चा, ५. कविविलासः, ६. कविकण्ठाभरणम्, ७. चतुर्वर्गसंग्र[हः,]
८. चारुचर्या, ९. चित्रभारतनाटकम्, १०. दर्पदलनम्, ११. दशावत[ार-]
चरितम्, १२. देशोपदेशः, १३. नीतिकल्पतरुः, १४. नीतिलता, १५. प[द्य-]
कादम्बरी, १६. पवनपञ्चाशिका, १७. बृहत्कथामञ्जरी, १८. बोधिसत्त्वावदा[न-]
कल्पलता, १९. भारतमञ्जरी, २०. मुक्तावली, २१. मुनिमतमीमां[सा]
( ५१ )
२२. कविकर्णिका, २३. रामायणमञ्जरी, २४. ललितरत्नमाला, २५. लावण्यवतो,
२६. वात्स्यायनसूत्रसारः, २७. विनयवल्ली, २८. व्यासाष्टकम्, २६. शशिवंश-
महाकाव्यम्, ३०. समयमातृका, ३१. सुवृत्ततिलकम् तथा ३२. सेव्य-
सेवकोपदेशः ।
इन ग्रन्थों में अधिकतर उपलब्ध हैं पर कतिपय ग्रन्थ ऐसे भी हैं जिनकी
उपलब्धि अब तक नहीं हो सकी है ।
प्रस्तुत व्याख्या
प्रस्तुत ग्रन्थ पर संस्कृत-हिन्दी व्याख्या लिखने की प्रवृत्ति मेरे अनुज के
मन में उदित हुई और मुझ से उत्साहित होकर उन्होंने लिखना आरम्भ कर
दिया । कतिपय शब्दों ( लटभा आदि ) का अर्थ-निर्णय करने में उन्हें बड़ी
परेशानी उठानी पड़ी । अन्त में बड़े परिश्रम से उन्होंने संस्कृत तथा हिन्दी
टीका को तैयार कर मेरे समक्ष उपस्थित किया । मैंने दोनों ही टीकाओं के
कतिपय अंशों को पढ़ा । व्याख्याकार्य में प्रथम प्रवृत्ति के कारण व्याख्याकार
की शैली उतनी परिमार्जित नहीं है फिर भी इन व्याख्याओं के आधार पर
पाठक ग्रन्थ के गूढातिगूढ अभिप्राय को भी अनायास समझने में समर्थ होंगे--
ऐसा मुझे विश्वास है ।
कहीं-कहीं व्याख्याकार ने ग्रन्थकार के विचारों से अपनी असहमति व्यक्त
की है और मुझे भी उन स्थलों पर व्याख्याकार के विचार अच्छे प्रतीत हुये
हैं । मैं व्याख्याकार के प्रति अपनी शुभकामना प्रकट करता हूँ ।
दीपावली } विदुषां विधेयः
} पं० श्री मदनमोहन झा
सं० २०२१ } अध्यापक, राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, भागलपुर
औचित्यविचारचर्चायाः
मूलस्थकारिकानुक्रमणिका
पृष्ठाङ्क | पृष्ठा
अकदर्थनया १५७ | कृत्वापि
अन्येषु काव्या १९१ | चमत्कारम् ११
अथौचित्यवता ३८ | तस्यात्मजः १९
अलङ्कारा ८ | तिलकम् १
अवस्थौचित्य १०२ | तेषां परस्परा ८
आसीत् प्रकाशेन्द्र १९३ | देशौचित्येन १४
उचित १० | नाम्ना कर्मानुरूपेण १८
उचितम् ११ | पदे वाक्ये १
उचितस्थान १३१ | पूर्णार्थधातुः १८
उचितार्थं २४ | प्रतिभाभरणम् १६
उचितेन १७७ | प्रतिभाया
उचितेनैव ११६ | प्रस्तुतार्थौचितः ३
उचितैरेव १२० | यः श्रीस्वयं ९१
उपसर्गे १२ | यस्यासिः १९
औचित्यरचितम् १९ | यथा मधुर
औचित्यस्य ६ | योग्योप १२
कालौचित्येन १३४ | विशेषणैः १२
काव्यम् १५१ | श्रीरत्नसिंहे १०
काव्यस्या ७ | सगुणत्वम्
काव्यार्थः १४७ | सान्वयम् ९
कुर्वन्सर्वाशये ४५ | सारसङ्ग्रह १६
कुलोपचित १४४ | स्वभावौचित्यम् १६
कृतारिवञ्चने ५ |