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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 256 में से

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पृष्ठ 51

( ४७ )
कवि किसी राजा की स्तुति में कहता है कि हे राजन् ! गुर्जर देश के
अधिपति, जो आपके आक्रमण से भयभीत होकर सपत्नीक वन में भटकते फिरते
हैं की मुख्य रानी पहले बन्दिजनों के द्वारा बार-बार सुन चुकी थी कि युद्ध में
शत्रुओं का समूह तेरो तलवार की तीक्ष्ण धारा में डूब मरा, अब वह मुग्धा रानी
आज इस वनवास-काल में चकित होकर जल की आशा से बार-बार पति की
तलवार पर अपनी दृष्टि डाल रही है ।
इस पद्य में 'मुग्धा' यह एक पद ऐसा है जिसके चलते सम्पूर्ण पद्य सार्थक,
सुसंगत अर्थ च सुन्दर हो जाता है—सहृदय-हृदयहारी सिद्ध होता है। यदि वह
नहीं रहता तो सम्पूर्ण पद्य असंगतार्थक होकर सहृदयों के उद्वेग का कारण बन
जाता, क्योंकि तलवार की धार में जल की आशा करना उपहासास्पद है । पर
मुग्धा के लिये ऐसा करना नितान्त-उचित है, पदौचित्य के उदाहरण में यह पद्य
उद्धृत हुआ है । जरा पद के अनौचित्य की भी बानगी देखिए—
लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः क्लेशो महान् स्वीकृतः
स्वच्छन्दस्य सुखं जनस्य वसतश्चिन्ता ज्वरो निर्मितः ।
एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद् वराकी हता
कोऽप्यर्थश्चेतसि वेधसा विनिहितस्तन्व्यास्तनुं तन्वता ॥
विधाता ने एक सुन्दरी की सृष्टि की । उसकी सृष्टि करने में सौन्दर्यरूप
धन का व्यय तो करना ही पड़ा साथ-साथ कष्ट भी विधाता को कम नहीं
हुआ । पर फल क्या हुआ ? कुछ नहीं । स्वच्छन्द तथा सुखपूर्वक संसार में
बसने वाले युवकजन के हृदय में चिन्ताज्वर उत्पन्न हो गया —अर्थात् इस
सुन्दरी की प्राप्त्याशा में सब चिन्तित रहने लगे । और वह बेचारी—जिसकी
सृष्टि विधाता ने महान् व्यय तथा श्रम स्वीकार करके की--भी अपने अनुरूप
पति के नहीं मिलने से बेमौत मारी गई । ऐसी स्थिति में इस तन्वी के तनु
की सृष्टि करते हुए विधाता ने अपने मन में कौन-सा प्रयोजन रक्खा था ?
पता नहीं ।
श्लोक के शब्द तथा अर्थ--दोनों ही सुन्दर हैं, पर इस पद्य में एक पद
ऐसा अनुचित कह दिया गया है जिसके चलते 'सब गुड़ गोबर' हो जाता है ।
और वह अनुचित पद है 'तन्वी' । यह पद दुर्बलता का द्योतक है, अतः इसका
प्रयोग किसी विरहिणी के प्रसङ्ग में उचित हो सकता है । यहाँ तो विरह का
कोई प्रसङ्ग है नहीं । यहाँ तों सौन्दर्य 'सुन्दरी' आदि पद का प्रयोग उचित