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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 256 में से

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पृष्ठ 53

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बौद्धिक शिथिलता का पात्र था। तभी तो उसने १०६३ ई० में अपने ज्येष्ठ
पुत्र कलश को राज्य देकर भी थोड़े ही वर्षों के अनन्तर पुनः उसे ग्रहण
कर लिया। इसके अनन्तर वह १०७७ ई० में राज्य-कार्य से वस्तुतः विरत
हुआ और कुछ ही वर्षों के बाद, १०८१ ई० में, उसने आत्महत्या कर ली,
और उसकी विदुषी महारानी सूर्यवती भी अपने पति की चिता पर सती
बन गई।
इन्हीं पिता-पुत्र अनन्त ( १०२८ ई०--१०६३ ई० ) तथा कलश
( १०६३ ई०--१०८९ ई० ) के राज्यकाल, में क्षेमेन्द्र की जीवन-लीला
व्यतीत हुई।
इनके पूर्वपुरुष राजा के अमात्य-पद पर प्रतिष्ठित थे। क्षेमेन्द्र अपने युग के
अशान्त वातावरण से इतने असन्तुष्ट तथा मर्माहत थे कि उसे सुधारने में तथा
पवित्र और विशुद्ध बनाने के लिए और दुष्टता के स्थान पर शिष्टता की और
स्वार्थ के स्थान पर परार्थ की भावना को दृढ़ करने के लिये, अपनी द्रुतगामिनी
लेखनी को काव्य के नाना अङ्गों की रचना में लगाया। इसी का रुचिर परिणाम
है—क्षेमेन्द्र का विशाल-साहित्य '
महर्षि वेदव्यास के आदर्श पर रचना करने वाले ये महाकवि नाम्ना ही नहीं
प्रत्युत यथार्थतः 'व्यासदास' थे।
इनकी प्रतिभा बहुमुखी थी। इनकी लेखनी से जिस तरह अलंकारशास्त्र के
उत्तमोत्तम अनेक ग्रन्थ उत्पन्न हुए उसी तरह अनेक महाकाव्य और खण्डकाव्य
सम्पन्न हुए। इनके ग्रन्थों में सभी रसों के अनूठे पद्य प्राप्त होते हैं। इनकी
नीतिमय कविताओं का साम्राज्य देखते ही बनता है। हास्यरस के तो संस्कृत
साहित्य में एकमात्र प्रतिनिधि कवि क्षेमेन्द्र हैं। इन्होंने एक नवीन प्रकार के
आख्यानों का निर्माण किया है, जिसमें हास्य के व्याज से शोभन उपदेश प्रदान
किया गया है। 'देशोपदेश' तथा 'नर्ममाला' ऐसी कथाओं से परिपूर्ण हैं।
क्षेमेन्द्र का उदात्त उद्देश्य है—तत्कालीन राजनैतिक बुराइयों, सामाजिक
दोषों और कमजोरियों को दिखलाकर उनका निराकरण करना। कवि का
कथन है कि हास्य के द्वारा प्रदर्शित युक्ति श्रोताओं के हृदय पर गहरी चोट
करती है, श्रोताओं के मर्मस्थान को विद्धकर उन्हें दोषयुक्त होने की प्रेरणा
देती है।