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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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हुआ है और भारतीय आलोचना-पद्धति में रस के साथ स्थिर सम्बद्ध होने के
कारण औचित्य अन्तरङ्गतम काव्यतत्त्व माना गया है ।
भारतीय आलोचना जगत् में भी इस तत्त्व का विकास क्रमशः हुआ है।
भरत ने केवल नाट्य में औचित्य सिद्धान्त को सूचित किया। आनन्दवर्धन ने
उसे नाट्य और काव्य (दृश्य और श्रव्य) उभय क्षेत्रों में परिवृंहित किया।
क्षेमेन्द्र ने इस तत्त्व को काव्य-मन्दिर में प्राण-प्रतिष्ठा की। औचित्य के विषय
में मौलिक कल्पना करने वाले ये ही तीन आचार्य हैं। अन्य अलंकार शास्त्रीय
निबन्ध-प्रणेता आचार्यों ने इस तत्त्व का उल्लेख तो प्रकट अथवा प्रच्छन्न रूप
से अवश्य किया, पर इसके सम्बन्ध में कोई कोई मौलिक बात किसी ने नहीं
कही। हाँ इतनी बात अवश्य कही जा सकती है कि औचित्य को व्यापक काव्य-
तत्त्व प्रायः सबों ने स्वीकार किया है। भारतीय आलोचना-जगत् का एक युग
ऐसा भी था जब औचित्य काव्यात्मा के रूप में, उद्घोषित हुआ था। स्वतन्त्र
औचित्य-संप्रदाय कायम हो चुका था, जिस पर प्रहार किया भरत तथा आनन्द-
वर्धन के प्रसिद्ध