औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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पर सर्वाधिक ध्यान दो। औचित्य के विषय में होरेस के सिद्धान्त भरत के
नाट्यशास्त्र में प्रतिपादित अनेक तथ्यों के साथ पूर्ण सादृश्य रखते हैं। होरेस
नाटक अथवा काव्य के कथानक के विषय में अपना मन्तव्य प्रकट करते हुए
लिखते हैं कि कविपरम्परागत अथवा नवकल्पित—दोनों प्रकार के कथानकों का
ग्रहण कर सकता है, पर परम्परागत कथानक के ग्रहण करने पर उस परम्परा
का विधिवत् पालन करना चाहिए और नवीन कथानक की कल्पना में इस बात
पर ध्यान रखना चाहिए कि जो पात्र प्रथमबार जिस रूप में अङ्कित किया जाय
उस पात्र के उस रूप का निर्वाह अन्त तक हो। उग्र रूप में अवतीर्ण पात्र का
स्वरूप-निर्वाह अन्त तक उसकी उग्रता की रक्षा करने में ही होता है। दया का
अवतार पात्र यदि दानवता का नग्न नर्तन करने लगे तो वह अपने स्वरूप से
अत्यन्त च्युत हो जाता है१। होरेस का यह नियम भरत के 'प्रकृत्यौचित्य' के
अन्तर्गत आता है।
होरेस ने अभिनय-कला के विषय में बड़ा ही मार्मिक विवेचन किया है।
उनका कथन है कि अभिनय एक विशिष्ट कला है और इसमें औचित्य का
आश्रय प्रधान है। दुःखद शब्दों के उच्चारण करते समय अभिनेता का चेहरा
उदास होना चाहिए, डाट-डपट करते समय उसकी मुखमुद्रा क्रुद्ध की-सी होनी
चाहिए, हँसी की वार्ता में चेहरा खिलता होना चाहिए और गम्भीर वार्ता
के लिये मुखमंडल को गंभीरता नितान्त आवश्यक है। होरेस का यह
अभिनयोचित्य है।
अभिनय रङ्गमञ्च पर वस्तु के प्रदर्शन से अथवा वस्तु के कथन से आरम्भ
होता है। परन्तु कौन वस्तु रङ्गमञ्च के ऊपर अभिनययोग्य है ? कौन-सी
नेपथ्यगृह से सूचनीय है ? इसके लिए कवि को सदा सावधान रहना चाहिए।
जो घटना दर्शकों के चित्त में घृणा अथवा अश्लीलता का भाव उत्पन्न कर
सकती है उसका प्रदर्शन किसी भी प्रकार से उचित नहीं माना जा सकता।
मीड़िया के द्वारा अपने पुत्रों का वध क्या कभी रङ्गमञ्च के ऊपर दर्शकों के
समक्ष अभिनीत किया जा सकता है ? कारण स्पष्ट है—अनौचित्य। होरेस का
यह नियम क्षेमेन्द्र का घटनौचित्य है। संस्कृत के आलोचकों में भरत से लेकर
विश्वनाथ तक—सभी नाट्यवस्तु के दो प्रकार मानते हैं—एक 'संसूच्य' तथा
१. देखिए--होरेस : आर्ट ऑफ पोयट्री।