औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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(३) भाषणकला के कुछ नियम हैं भाषण की शैली भावद्योतक तथा
नीतिपूर्ण होनी चाहिए । साथ ही विषय के अनुरूप होनी चाहिए । अनुरूप-शैली
से अभिप्राय है कि¹--विषय के उदात्त होने पर रचनाप्रकार को क्षुद्र नहीं होना
चाहिए । विषय के साधारण होने पर रचनाप्रकार को क्षुद्र नहीं होना चाहिए ।
विषय के साधारण होने पर रचना-प्रकार को उदात्त कभी नहीं होना चाहिए ।
इसी प्रकार महत्त्वहीन शब्द के संबन्ध में अलंकृत तथा विचित्र विशेषणों का
प्रयोग सर्वथा अनुचित होता है । अतः भाषण करते समय अथवा लिखते समय
विषय की अनुरूपता का ध्यान अवश्य रखना चाहिए । यह है अरस्तू का
विषयौचित्य ।
(४) अरस्तू ने 'रेटारिक' के तृतीय खण्ड के सप्तम परिच्छेद में 'औचित्य'
( Propriety ) का विस्तृत वर्णन किया है । वक्ता को श्रोतृ-हृदय-वशीकरण-
रूप निजोद्देश्य को सिद्ध करने के लिये अपने मनोभावों का प्रभाव श्रोताओं के
ऊपर डालना पड़ता है । श्रोताओं के हृदय को वशीभूत करने का मुख्य उपाय
है रसानुकूल भाषा का प्रयोग² । अनादर-भावाभिव्यञ्जन के लिये क्रोधपूर्ण
भाषा का प्रयोग करना चाहिए । क्षुद्रता की अभिव्यक्ति के लिये वक्ता को उस
( क्षुद्र वस्तु ) का नाम ग्रहण भी नहीं करना चाहिए । प्रशंसनीय वस्तु के वर्णन
में भाषा भी तदनुरूप होनी चाहिए । हार्दिक भावों की अभिव्यक्ति भाषा के
द्वारा ही होती है । अतः भाव तथा भाषा में अनुरूपता नितान्त अपेक्षित है । इन
दोनों का सामञ्जस्य ही वक्ता तथा लेखकों की सफलता का रहस्य है ।
लाङ्गिनस ( २१३ ई०-२७३ ई० ) द्वारा रचित ग्रन्थ On the
Sublime पाश्चात्य आलोचनाशास्त्र का मौलिक ग्रन्थ माना जाता है । वे
कविता में ही नहीं, अपितु समग्र ललित कलाओं में चमत्कृतिजनक वस्तु—
'भव्यता' ( Sublimity ) को मानते हैं । इस भव्यता के विधान के विविध
प्रकारों के विवेचन-क्रम में ही उन्होंने औचित्य का भी विचार किया है ।
(१) लाङ्गिनस अलंकारों के द्वारा भी काव्य में भव्यता का उदय मानते
हैं । अलंकार शब्द तथा अर्थ को सुन्दर बनाते हुए काव्य में भव्यता के प्रधान
कारण होते हैं । अलंकार और भव्यता में परस्परोपकार्योपकारकभाव सा होता
१. देखिए--रिटॉरिक, खण्ड ३, परि० ७, पृ० २४५
२. देखिए--रिटॉरिक, खण्ड ३, परि० ७, पृ० २४५