औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 52, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४८ )
होता । कितनी सूक्ष्म तथा मार्मिक आलोचना है । सर्वत्र इसी तरह की मार्मिक
आलोचना प्राप्त होती है । यहाँ सब का उल्लेख संभव नहीं, और अवतारणा
का कलेवर विपुल हो जाने का भी भय है । अतः पाठकों को उन मार्मिक
आलोचनाओं से आनन्द का अनुभव करने के लिये ग्रन्थ का अध्ययन करना
चाहिए । इस ग्रन्थ में कारिकाओं की संख्या उनचालिस है और उदाहरण-
प्रत्युदाहरण के रूप में एक सौ पाँच श्लोक तैंतिस विभिन्न ग्रन्थों से उद्धृत
किये गये हैं । इनमें क्षेमेन्द्र के ग्यारह काव्यग्रन्थों के पैंतिस श्लोक हैं जो कि
औचित्य तथा अनौचित्य दोनों के उदाहरण में आए हैं । एक श्लोक
प्रस्तुत ग्रन्थ की दृष्टि से ही लिखा गया है । इस तरह छत्तिस श्लोक इनके
अपने हुए ।
इसके अतिरिक्त राजशेखर के दश, कालिदास के विभिन्न चार ग्रन्थों से
आठ, भवभूति के एक ग्रन्थ से तीन, श्रीहर्ष के पाँच, बाणभट्ट के दो ग्रन्थों से
तीन, व्यास का एक, चन्द्रक के चार, वराहमिहिर का एक, परिमल के चार,
अमरुक के दो, माघ का एक, दीपक के तीन, धर्मकीर्ति का एक, नारायणभट्ट के
दो, मालवरुद्र के दो, कर्पटक का एक, श्यामलक का एक, प्रवरसेन के दो,
राजपुत्र मुक्तापीड का एक, गौड़ कुम्भकार का एक प्रभाकरभट्ट का एक,
उत्पलराज का एक, महेन्दुराज के दो, मातृगुप्त का एक, भट्ट लट्टन का एक,
कुमारदास का एक, श्रीचन्द्र का एक, मालवकुवलय का एक, भट्ट भल्लट का
एक, परिव्राजक का एक, उपाध्याय गङ्कक का एक और यशोवर्मदेव का एक
श्लोक उदाहरण-प्रत्युदाहरण के रूप में उद्धृत हुए हैं । इस तरह इस ग्रन्थ के
अध्ययन से बहुतेरे ऐसे कवियों का पता हमें मिलता है जिनकी कृतियों से
विद्वन्मण्डली अपरिचित है ।
महाकवि क्षेमेन्द्र
प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रणेता महाकवि क्षेमेन्द्र, संस्कृत भाषा के महाकवियों में
भी अलौकिक प्रतिभाशाली महाकवि थे जिनकी प्रतिभा ने साहित्य के विभिन्न
क्षेत्रों में अपना चमत्कार दिखलाया । सरस्वती के ये वरदपुत्र शारदा देश
अर्थात् काश्मीर के निवासी थे, परन्तु जब ये उत्पन्न हुए थे तब काश्मीर का
वातावरण कविता जैसी कोमल कला के अनुशीलन के लिये नितान्त अनुपयुक्त
था । काश्मीर के इतिहास में वह युग असन्तोष, षड्यन्त्र, नैराश्य तथा रक्तपात
का काल था । तत्कालीन राजा अनन्त स्वयं मानसिक दुर्बलता का तथा