सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 38

पुनः उन्होंने कहा है कि—"दो प्रकार के अनौचित्य काव्य में हो सकते हैं—
( १ ) अर्थविषयक और ( २ ) शब्दविषयक । उन दोनों में प्रथम—अर्थात्
अर्थविषयक अनौचित्य का लक्षण है विभावादिकों का रसों में अयथायथ
( प्रतिकूलतापूर्ण ) निवेश । यही अनौचित्य अन्तरङ्ग है और इसका विवेचन
प्राचीन आचार्यों ने ही कर दिया है, अतः मैं अपने ग्रन्थ में उसका विस्तार नहीं
करना चाहता ।
दूसरा—अर्थात् शब्दविषयक अनौचित्य के बहुत प्रकार हो सकते हैं, जैसे—
विधेयाविमर्श, प्रक्रममेद, क्रमभेद, पौनरुक्त्य और वाच्यावचन १ ।
रस तथा औचित्य के विषय में महिमभट्ट आनन्दवर्धन के ही अनुयायी हैं ।
आनन्दवर्धन के समान महिमभट्ट ने भी अनौचित्य को प्रधान दोष स्वीकार किया
है । समग्र दोष रस के व्याघातक होते हैं । इसीलिये महिमभट्ट ने रसानौचित्य
अन्तर्गत समस्त दोष प्रकरण का समावेश कर दिया है२ । इन सभी विवेचनों
से वही एक बात पुष्ट होती है कि महिमभट्ट के भी विचारानुसार औचित्य
काव्य का सर्वातिशायी उपादान है ।
क्षेमेन्द्र
ऐतिहासिक क्रम से महिमभट्ट के बाद ही औचित्य के आधार पर एक
नवीन सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य क्षेमेन्द्र ने इस धराधाम में पदार्पण किया
और अमरभारती के भण्डार को विविध ग्रन्थरत्नों से परिपूर्ण करने में अपने
जीवनकाल का उपयोग किया । औचित्यविचारचर्चा इन्हीं की अमर कृति है
१. इह खलु द्विविधमनौचित्यमुक्तम्, अर्थविषयं शब्दविषयं चेति । त
विभावानुभावव्यभिचारिणाम् अयथायथं रसेषु यो विनियोगः तन्मात्रलक्षणमेव
मन्तरङ्गमाचार्यैरेवोक्तमिति नेह प्रतन्यते । अपरं पुनः बहिरङ्गं बहुप्रकारं संभवति
तद्यथा विधेयाविमर्शः, प्रक्रमभेदः, क्रमभेदः, पौनरुक्त्यं, वाच्यावचनञ्चेति ।
( व्य० वि०, उ० २ पृ० १४९-५१
२. कथञ्चिद्वा भिन्नक्रमतयापि अभिमतार्थसंबंधोपकल्पने प्रस्तुतार्थप्रतीतौ
विघ्नितत्वात् तन्निबन्धनो रसास्वादोऽपि विघ्नितः स्यात्, शब्ददोषाणा
अनौचित्योपगमात् तस्य च रसभङ्गहेतुत्वात् । यदाहुः--
अनौचित्यादृते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम् ।
प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत् परा ॥ (व्य० पृ० १३