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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 256 में से

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पृष्ठ 42

है--अलंकार भव्यता का वर्धक होता है और भव्यता से अलंकार की चमत्कृति
चौगुनी हो उठती है ।
किन्तु समस्त अलंकारों में यह क्षमता नहीं रहती है । जिनको सत्ता पृथक्
रूप से पाठकों को भासित नहीं हो वे ही अलंकार काव्य में श्रेष्ठ समझे जा सकते
हैं । अलंकारों की अलंकारत्वभावना यदि पाठक के ध्यान में नहीं आवे तो
वही अलंकार सुन्दरतम प्रतीत होता है । लाङ्गिनस का यह अलंकारौचित्य बहुत
कुछ आनन्दवर्धन के 'अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यः सोऽलंकारो ध्वनौ मतः' से समानता
रखता है ।
(२) लाङ्गिनस ने शब्दौचित्य पर अधिक ध्यान दिया है । उचित शब्दों के
चुनाव पर कविता का प्रभाव विशेषरूप से अवलम्बित रहता है । उचित पद-
विन्यास से काव्य अथवा भाषण में जीवनीशक्ति की वृद्धि होती है । जिस
काव्य अथवा भाषण में जितनी अधिक सप्राणता होगी वह उतना ही अधिक
पाठकों अथवा श्रोताओं को चमत्कृत-प्रभावित कर सकेगा । शब्दौचित्य की महिमा
विलक्षण होती है । सुन्दर तथा उचित शब्द अर्थ का वास्तविक आलोक है ।
उचित अर्थ की अभिव्यक्ति करने की योग्यता उचित शब्द ही में रहती है ।
परन्तु कवि को इस विषय में सदा सावधान रहना चाहिए कि भव्य तथा
माहात्म्यमण्डित शब्दों का प्रयोग भव्य विषय के वर्णन में ही किया जाय । यदि
भव्य पद का प्रयोग तुच्छ--अभव्य पदार्थ के वर्णन में किया जायगा तो वह
उपहासास्पद होता है ।
इस प्रकार लाङ्गिनस काव्य में औचित्य के प्रबल पक्षपाती हैं । उनके
विचार से शब्दौचित्य का विधान काव्य में सौन्दर्य, शक्ति, प्रभाव, महत्त्व तथा
भव्यता का उत्पादक होता है तथा अन्य आवश्यक काव्यगुण का भी उदय स्वतः
हो जाता है ।
होरेस (६५ ई० पू०-८ ई० पू०)--लैटिन भाषा के अति लोकप्रिय कवि
हैं । आलोचना के विषय में इनकी प्रसिद्ध पुस्तक है--Art Poetica-Art of
Poetry--'काव्यकला' । यह अपूर्ण ग्रन्थ है । फिर भी काव्यविवेचना में यह
ग्रन्थ अप्रतिम समझा जाता है । होरेस 'औचित्य' के परम पुजारी हैं । इन्होंने
कवियों को लक्ष्य कर तीन उपदेश दिये हैं-- ( १ ) ग्रीक आदर्शों का अनुकरण
करो, ( २ ) पात्र के स्वरूप की रक्षा करो तथा ( ३ ) औचित्य के संरक्षण