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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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दूसरा 'दृश्य'। पहली की केवल अर्थोपक्षेपक के द्वारा सूचना दी जाता है, परन्तु
दूसरी घटना रङ्गमञ्च के ऊपर अभिनीत होती १ है ।
इसके अतिरिक्त होरेस ने छन्दों के औचित्य की भी चर्चा की है । इस
प्रकार ग्रीक आलोचकों ने औचित्य ( Propriety ) की कमनीयता ललित
कलाओं में पर्याप्तरूप से स्वीकृत की है । सचमुच यूनानी आलोचनापद्धति
( Classical Criticism ) का सर्वस्व औचित्य रहा है ।
महाकवि पोप ने भी औचित्य के अनेक प्रकारों को अपने आलोचना-ग्रन्थ
में स्थान दिया है । पोप का ग्रंथ ( Essay of Criticism ) प्राचीन मान्य
सिद्धान्तों का पद्यबद्ध समुच्चय है । इनमें वर्णौचित्य के ऊपर उन्होंने बहुत
जोर दिया है । उनका कथन है कि कविता में केवल उद्वेगकारी कर्णकटुता
का अभाव ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता, अपितु वर्ण्य अर्थ की प्रतिध्वनि
अवश्य होनी चाहिए । मलयानिल के बहने के अवसर पर प्रयुक्त शब्दों में
सुकुमारता तथा कोमलता होनी चाहिए, मन्द लहरिका का प्रवाह कोमल पदों
में प्रवाहित होता है, परन्तु जब प्रचण्ड झंझावात से आन्दोलित भीषण तरङ्ग
तटों पर टकराता है; तब ओजस्वी पद्य भी तुमुल प्रवाह की तरह घोर गंभीर
गर्जन करता है । पोप का अभिप्राय है कि वर्णनीय वस्तु तथा तत्प्रतिपादक
शब्दों में मधुर सामञ्जस्य होना चाहिए । पोप का यह काव्यतत्त्व होगा-आनन्द-
वर्धन का वर्णध्वनि, कुन्तक का वर्णवक्रता तथा क्षेमेन्द्र का वर्णौचित्य । एक ही
तत्त्व भिन्न-भिन्न आलंकारिकों की कल्पना में भिन्न-भिन्न अभिधान से अभिव्यक्त
किया गया है ।
ऊपर के विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है कि औचित्य-तत्त्व की महत्ता जिस
तरह भारतीय आलोचकों ने स्वीकार की है उसी तरह पाश्चात्य आलोचकों
भी । अन्तर केवल यह है कि पाश्चात्य आलोचना-पद्धति में रस-सत्ता के प्रति-
पादन नहीं होने से औचित्य काव्य का एक बहिरङ्ग उपादान के रूप में अङ्गीकृत
१. द्वेधा विभागः कर्तव्यः सर्वस्यापीह वस्तुनः ।
सूच्यमेव भवेत् किञ्चिद् दृश्यश्रव्यमथापि वा ॥
नीरसोऽनुचितस्तत्र संसूच्यो वस्तुविस्तरः ।
दृश्यस्तु मधुरोदात्तरसभावनिरन्तरः ॥
( दशरूपक १।५६, ५७ )