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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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( ५१ )
२२. कविकर्णिका, २३. रामायणमञ्जरी, २४. ललितरत्नमाला, २५. लावण्यवतो,
२६. वात्स्यायनसूत्रसारः, २७. विनयवल्ली, २८. व्यासाष्टकम्, २६. शशिवंश-
महाकाव्यम्, ३०. समयमातृका, ३१. सुवृत्ततिलकम् तथा ३२. सेव्य-
सेवकोपदेशः ।
इन ग्रन्थों में अधिकतर उपलब्ध हैं पर कतिपय ग्रन्थ ऐसे भी हैं जिनकी
उपलब्धि अब तक नहीं हो सकी है ।
प्रस्तुत व्याख्या
प्रस्तुत ग्रन्थ पर संस्कृत-हिन्दी व्याख्या लिखने की प्रवृत्ति मेरे अनुज के
मन में उदित हुई और मुझ से उत्साहित होकर उन्होंने लिखना आरम्भ कर
दिया । कतिपय शब्दों ( लटभा आदि ) का अर्थ-निर्णय करने में उन्हें बड़ी
परेशानी उठानी पड़ी । अन्त में बड़े परिश्रम से उन्होंने संस्कृत तथा हिन्दी
टीका को तैयार कर मेरे समक्ष उपस्थित किया । मैंने दोनों ही टीकाओं के
कतिपय अंशों को पढ़ा । व्याख्याकार्य में प्रथम प्रवृत्ति के कारण व्याख्याकार
की शैली उतनी परिमार्जित नहीं है फिर भी इन व्याख्याओं के आधार पर
पाठक ग्रन्थ के गूढातिगूढ अभिप्राय को भी अनायास समझने में समर्थ होंगे--
ऐसा मुझे विश्वास है ।
कहीं-कहीं व्याख्याकार ने ग्रन्थकार के विचारों से अपनी असहमति व्यक्त
की है और मुझे भी उन स्थलों पर व्याख्याकार के विचार अच्छे प्रतीत हुये
हैं । मैं व्याख्याकार के प्रति अपनी शुभकामना प्रकट करता हूँ ।
दीपावली } विदुषां विधेयः
} पं० श्री मदनमोहन झा
सं० २०२१ } अध्यापक, राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, भागलपुर