औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
DevanagariHindipublished256 पृष्ठ
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औचित्यविचारचर्चा
'औचित्य विचारचर्चा' एक महत्त्वपूर्ण अलंकार-ग्रन्थ है । इसके रचयिता
आचार्य क्षेमेन्द्र हैं । क्षेमेन्द्र ने यद्यपि अनेक ग्रन्थों की रचना की है, परन्तु उनका
सबसे मुख्य ग्रन्थ यही है, उनकी अमर कीर्ति में 'चार चाँद' लगाने का श्रेय इसी
ग्रन्थ को है । इस ग्रन्थ में औचित्य का विशद विश्लेषण अति प्रांजल भाषा में
किया गया है । सर्वप्रथम मङ्गलवोधक पद्य के द्वारा औचित्य को भागवत गुण
सिद्ध किया गया है जिसका विवरण भूमिका के प्रारम्भ में ही आ चुका है ।
इसके बाद ग्रन्थकार ने ग्रन्थनिर्माणपरक प्रतिज्ञा-वाक्य लिखा है । तदनन्तर
औचित्य तत्त्व की महिमा का गान है । इसी प्रसंग पर भरत के--
अदेशजो निवेशस्तु न शोभां जनयिष्यति ।
मेखलोरसिबन्धे च हास्यायैवोपजायते ॥
इस कथन के आधार पर निम्नलिखित सूक्ति की सृष्टि की गई है ।
कण्ठे मेखलया नितम्बफलके तारेण हारेण वा,
पाणौ नूपुर-बन्धनेन चरणे केयूर-पाशेन वा ।
शौर्येण प्रणते रिपौ करुणया नायान्ति के हास्यताम्,
औचित्येन विना रुचिं प्रतनुते नालंकृतिर्नो गुणाः ॥
कण्ठ में मेखला ( डड़कस ) बाँधने से या नितम्ब पर लम्बे हार पहनने से
अथवा हाथ में नूपुर बाँधने से या पैर में केयूर रखने से कौन व्यक्ति लोक में
हँसी का पात्र नहीं बनता ? नतानन पर शूरता और शत्रु पर करुणा दिखलाने
वाला व्यक्ति क्या अपने को उपहासास्पद नहीं कर लेता है ? तथ्य बात यह है
कि औचित्य के बिना न तो अलंकार ही रुचिकर प्रतीत होते हैं और न गुण !
भूषणतत्त्व का प्रधान आश्रय औचित्य ही है ।
इसके बाद औचित्य का लक्षण किया गया है—
उचितं प्राहूराचार्याः सदृशं किल यस्य यत् ।
उचितस्य च यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते ॥
कृत 'भारतीय साहित्यशास्त्र' के आधार पर संकलित किया गया है, अतः
लेखक उनका आभारी है ।