औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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में आचार्य ने एक नया दृष्टिकोण उपस्थित किया है। कारण, 'कला में सौन्दर्य
है अथवा नहीं' ? यह उतना आलोचना का विषय नहीं है, जितना 'कला में
सौन्दर्य आता कहाँ से है' यह—अर्थात् गुण, रीति, अलंकार अथवा रस का
ही समावेश काव्य में हुआ है, किंवा नहीं यही नहीं देखना है आलोचकों को,
अपितु मुख्यतः यह देखना है कि इन वस्तुओं का समावेश किस ढंग से हुआ है,
इन वस्तुओं के समावेशार्थ जो ढंग अपनाया गया है वह उचित है अथवा नहीं।
फलतः प्रतिपाद्य वस्तु की ओर से हटा कर अपना ध्यान आलोचकों को
प्रतिपादन करने वाले कवि की ओर ले जाना चाहिए। सारांश यह कि कला-
गत सौन्दर्य का रहस्य कवि-हृदय में छिपा रहता है, वस्तु में नहीं। पर भारतीय
आलोचकों का दृष्टिकोण वस्तुपरक ही अधिक रहा। आचार्य क्षेमेन्द्र ने उक्त
पंचम वर्ग का समावेश अपनी 'चर्चा' में करके जो अन्तर्वीक्षा प्रस्तुत की है,
वह निस्सन्देह नूतन और श्लाघ्य है। अस्तु।