औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 50, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रन्थ का स्वरूप
पूर्वकथित प्रभेदों के क्रमशः पहले कारिका के द्वारा स्वरूप और लौकिक
दृष्टान्तमूलक साहित्यिक स्तर निर्णीत किये गए हैं । फिर उदाहरण तथा प्रत्यु-
दाहरण द्वारा उन प्रभेदों का स्पष्टीकरण किया गया है । उदाहरण तथा प्रत्यु-
दाहरण के पद्य कुछ तो अपने अन्य ग्रन्थों से और कुछ विभिन्न कवियों के
काव्यों से उद्धृत किये गए हैं ।
बीच बीच में गद्य के द्वारा कारिकाओं तथा उदाहरण-प्रत्युदाहरण पद्यों
की व्याख्या की गई है । सामान्यतः ग्रन्थ का यही स्वरूप है ।
आलोचना में सर्वत्र ईमानदारी बरती गई है । औचित्य के उदाहरणरूप में
ही नहीं, प्रत्युदाहरणरूप में भी अपने पद्यों को ग्रन्थकार ने उद्धृत किया है ।
तत्तत् औचित्य का स्तर निश्चित करते समय कारिकाओं के द्वारा अनूठे लौकिक
दृष्टान्तों का प्रयोग किया गया है । जैसे—
तिलकं बिभ्रती सूक्तिर्भात्येकमुचितं पदम् ।
चन्द्राननेव कस्तूरीकृतं श्यामेव चान्दनम् ॥
तिलक के समान औचित्यपूर्ण एक पद वाली सूक्ति ( काव्यवाक्य ) शोभित
होती है । कैसे ? जैसे गौरवर्णा कामिनी कस्तूरीकृत काली बिन्दी से और
श्यामाङ्गी चन्दनरचित धवल विशेषक ( बिन्दी ) से । कैसा मनोहर दृष्टान्त है !
गौराङ्गी के भाल पर काली बिन्दी का और श्यामांगी के ललाट पर धवल
बिन्दी का औचित्य और तज्जन्य शोभातिशय का अनुभव सभी सहृदयों को
अवश्य होगा ।
सम्पूर्ण ग्रन्थ में इसी तरह के रुचिर दृष्टान्तों का सन्निवेश किया गया है ।
आलोचना की मार्मिकता देखते ही बनती है । बानगी के तौर पर एक दो स्थलों
का प्रदर्शन ही पर्याप्त होगा—
मग्नानि द्विषतां कुलानि समरे त्वत्खड्गधाराकुले,
नाथास्मिन्निति बन्दिवाचि बहुशो देव ! श्रुतायां पुरा ।
मुग्धा गुर्ज्जरभूमिपालमहिषी प्रत्याशया पाथसः,
कान्तारे चकिता विमुञ्चति मुहुः पत्युः कृपाणे दृशौ ॥