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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

( ३३ )
महिमभट्ट
यद्यपि महिमभट्ट ने आनन्दवर्धन के द्वारा स्थापित ध्वनि-पदार्थ का खण्डन
कर रस आदि व्यङ्ग्य अर्थों को अनुमेय सिद्ध करने के उद्देश्य से अपने प्रसिद्ध
ग्रन्थ व्यक्तिविवेक का निर्माण किया है, तथापि इस मुख्य विषय के उपपादन-
क्रम में अनेक काव्य-सिद्धान्तों का उल्लेख उन्होंने किया है। ऐसी स्थिति में यदि
हम काव्यसम्बन्धी व्यापक तत्त्व औचित्य का भी विश्लेषण व्यक्तिविवेक में
पाते हैं तो यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। व्यक्तिविवेककार ने प्रसङ्गवश
एक जगह लिखा है कि—"औचित्य एक ऐसा काव्यतत्त्व है को काव्य-स्वरूप के
निरूपण की महिमा से स्वतःसिद्ध है, अतः पृथक् उसकी चर्चा व्यर्थ है।
विभाव, अनुभाव और संचारीभाव का वर्णन करना ही कवि का कर्तव्य है,
दूसरा नहीं। वे ही विभावादि शास्त्रानुगार कवि के द्वारा उपनिबद्ध होने पर
रसाभिव्यक्ति के हेतु होते हैं, अन्यथा नहीं। काव्य की आत्मा है रस,
फिर उसमें अनौचित्य के स्पर्श की संभावना भी कैसे हो सकती है? जब
अनौचित्य की काव्य में संभावना ही नहीं तब उसको हटाने के लिये जो
पण्डितगण भिन्न-भिन्न तरह के काव्यलक्षणों की सृष्टि करते हैं वह सर्वथा
व्यर्थ है१। इस प्रतिपादन से सिद्ध होता है कि महिमभट्ट काव्य में औचित्य के
समर्थक थे। प्रसङ्गान्तर्गत उनकी उक्तियों से भी इस बात की पुष्टि होती है।
महिमभट्ट का दोषविवेचन बड़ा प्राञ्जल है। इस प्रसङ्ग पर उन्होंने कहा है कि
“अनौचित्य ही काव्य का एकमात्र सर्वातिशायी दोष है जिसके अन्तर्गत समस्त
दोषों का अन्तर्भाव किया जा सकता है। अनौचित्य का सामान्य लक्षण है कवि
के द्वारा वाञ्छित रस आदि की प्रतीति में विघ्नकारी होना२।” आगे चलकर
आहृतम्, क्वचिदौचित्यत्यक्तं सदप्यन्यथासम्पाद्यम् सहृदयहृदयाह्लादनाय। (४।४
वी कारिका की वृत्ति।)
१. तस्य (अनौचित्यस्य) काव्यस्वरूपनिरूपणसामर्थ्यसिद्धस्य पृथगुपादान-
वैयर्थ्यात्। विभावाद्युपनिबन्ध एव हि कविब्यापारो नापरः। ते च यथाशास्त्र-
मुपनिबध्यमानारसाभिव्यक्तेर्निबन्धनभावं भजन्ते, नान्यथा। रसात्मकं च काव्य-
मिति कुतस्तत्रानौचित्यस्पर्शः संभाव्यते, यन्निरासार्थमित्थं काव्यलक्षणमाचक्षीरन्
विचक्षणम्मन्याः। (व्य० वि० पृ० १२६)
२. एतस्य (अनौचित्यस्य) विवक्षितरसादिप्रतीतिविघ्नविधायित्वं नाम
सामान्यलक्षणम्। (व्य. वि., उन्मेष २, पृ. १५२)