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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 256 में से

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पृष्ठ 46

( ४२ )
[चित्र :
रस
औचित्य | रीति
वक्रोक्ति
गुण अलंकार
ध्वनि | अनुमिति]
साहित्यशास्त्र के सिद्धान्तों का इतिहास औचित्य से आरम्भ कर 'अलंकार'
तक का विकास है। इस चित्र के बड़े वृत्त पर दृष्टिपात कीजिए। यह काव्य के
अन्तरङ्ग-अर्थात् प्राणभूत तत्त्व की समीक्षा करता है। इस पूरे वृत्त की परिधि
है—औचित्य, जिसे भारतीय आलंकारिकों ने व्यापकतम काव्यतत्त्व अङ्गीकृत
किया है। इस वृत्त के भीतर जो बड़ा त्रिकोण है उसका शीर्षस्थान है रस और
नीचे के कोण हैं ध्वनि और अनुमिति। रस का शीर्षस्थान सूचित करता है कि
भारत के किसी साहित्य-सम्प्रदाय में रसतत्त्व की अवहेलना नहीं है। ध्वनि और
अनुमिति मतभेद से उसके दो अभिव्यक्ति-प्रकार हैं। अनुमितिवादी भी रस का
अपलाप नहीं करते, अपितु उसके बोध के लिए व्यञ्जना की आवश्यकता नहीं
मानकर उसका स्थान अनुमिति को देते हैं। अनुमिति यहाँ ध्वनिविरोधी सभी
मतों का प्रतीक है।
भीतरी वृत्त में काव्य के बाह्य उपकरण तथा स्वरूप का विवेचन है। वृत्त
की परिधि 'वक्रोक्ति' है जो बृहत् वृत्त का स्पर्श कर रही है। वक्रोक्ति कवि
के कथन का एक विशिष्ट प्रकार है। इस वृत्त के भीतर एक त्रिकोण है जिसके
ऊपरी बिन्दु है--रीति, और निचले बिन्दु हैं गुण और अलंकार। रीति,
गुण और अलंकार ये तीनों तत्त्व काव्य के बहिरङ्ग साधन हैं और इनका वक्रोक्ति
का आश्रित होना नितान्त आवश्यक है। इस प्रकार इस ग्राफ में अलंकार-
शास्त्र के समस्त संप्रदायों का पारस्परिक संबन्ध व्यवस्थित रूप से दिखलाया
गया है¹।
१. भूमिका का यह अंश मुख्यतया आदरणीय पं० श्री बलदेव उपाध्यायजी