औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 39, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३५ )
यद्यपि औचित्यतत्त्व की उद्भावना सर्वप्रथम इन्हीं के द्वारा इसी ग्रन्थ में नहीं
हुई, अपि तु चिरकाल से सभी आचार्य अपने-अपने ग्रन्थों में थोड़ी-बहुत चर्चा
इस तत्त्व की अवश्य कर गए थे तथापि इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि
मुख्यरूप से औचित्य का साङ्गोपाङ्ग वर्णन इसी ग्रन्थ में आकर हुआ और
औचित्य-सम्प्रदाय का उदय साहित्य-संसार में इस ग्रन्थरत्न के निर्माण हो चुकने
पर ही हुआ ।
अतः क्षेमेन्द्र विदग्ध मण्डली में औचित्य के व्यवस्थापक होने से चिरस्मर-
णीय रहेंगे । औचित्यतत्त्व को काव्य के सर्वातिशायी उपादान के रूप में प्रति-
ष्ठित करने का श्रेय विज्ञ आलोचकवर्ग सदा क्षेमेन्द्र को प्रदान करता रहेगा ।
क्षेमेन्द्र से पश्चाद्भावी आलङ्कारिक
यद्यपि साहित्यिक जगत् के लिये एक प्रकार से इसे दुर्भाग्य का ही विषय
समझा जा सकता है कि क्षेमेन्द्र के द्वारा प्रवर्तित औचित्य-सम्प्रदाय को किसी
अनन्तर्भावी आचार्य ने अग्रसर नहीं किया, तथापि औचित्यतत्त्व का अपलाप
किसी ने नहीं किया है ! मम्मट १ से लेकर पण्डितराज तक की आलंकारिक
परम्परा ने भी अपने-अपने ग्रन्थों में किसी न किसी रूप से इस तत्त्व के प्रति
आस्था अवश्य प्रकट की है। खासकर दोषविवेचन के अवसर पर सभी ने
औचित्य का, निषेधमुखेनैव सही, पर स्मरण अवश्य किया है । यद्यपि यह बात
कही जा सकती है कि औचित्यतत्त्व का स्मरण करते समय इन आचार्यों के
मानसपटल पर, क्षेमेन्द्र नहीं, अपितु आनन्दवर्धन ही उदित थे और उदित थी
आनन्दवर्धन की 'अनौचित्यादृते नान्यत् रसभङ्गस्य कारणम्' यह सुविख्यात
पङ्क्ति, तथापि क्षेमेन्द्र-स्थापित सिद्धान्त-पोषकता तो उन लोगों की सिद्ध होती
ही है। मेरे कथन का उद्देश्य भी उतना ही है।
पाश्चात्त्य आलोचक और औचित्य
अब यहाँ जिज्ञासु पाठकों के लाभ को दृष्टि में रखकर, संक्षेप में, औचित्य
में संबन्ध रखने वाले पाश्चात्य आलोचकों के मतों का दिग्दर्शन कराया जा रहा
रहा है ।
पाश्चात्य साहित्य-शास्त्रकारों में प्राचीन आलोचकों ने 'औचित्य' का
१. मम्मट-क्षेमेन्द्र समकालीन थे।