सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 40

( ३६ )
विचार किया है, नवीन आलोचकों ने नहीं। प्राचीनों की भी औचित्यविषयक
आलोचना भारतीय आचार्यों की आलोचना के सामने नगण्य-सी है, क्योंकि
पाश्चात्यों की आलोचना के अनुसार 'औचित्य' काव्य का बहिरङ्ग साधन मात्र
है और भारतीयों की आलोचना के अनुसार वह काव्य का ही नहीं, अपितु सकल
ललित कलाओं का अन्तरङ्ग साधन है--प्राण है।
पाश्चात्यों ने प्रकृत्यौचित्य, घटनौचित्य, वर्णौचित्य—आदि औचित्य के
कतिपय प्रकारों का ही विवेचन किया है जो काव्य के बहिरङ्ग साधन हैं। उन
लोगों की पहुँच रस तक प्रायः नहीं हो सकी, अतः वे उक्त बहिरङ्ग तत्त्वों में
ही उलझे रहे। फलतः उनकी औचित्यसमीक्षा उतनी मौलिक अथच गूढ़ नहीं
हो सकी, जितनी रसवादी भारतीयों की।
औचित्य के ऊपर प्रकाश डालने वाले पाश्चात्य आलोचकों में अरस्तू
लाञ्जिनस, होरेस और पोप के नाम विशेषरूप से लिए जा सकते हैं।
अरस्तू के दो ग्रन्थ पाश्चात्य आलोचना-जगत् में परम प्रसिद्ध हैं--(१)
पोएटिक्स तथा (२) रेटारिक। दोनों ही ग्रन्थों में औचित्य-तत्त्व की समीक्षा की
गई है।
(१) नाटक का दृश्य वास्तविक होना चाहिए, काल्पनिक नहीं, जिससे द्रष्टा
को उन दृश्यों के देखते समय असत्यता का भान नहीं हो। इस प्रसङ्ग पर अरस्तू
का कथन है कि "नाटक में जो दृश्य दिखलाये जाँय उन्हें उचित होना चाहिए।
उचित घटनाओं के प्रदर्शन से ही नाटककार की अभीष्ट-सिद्धि होती है। वस्तु-
जगत् से असंबद्ध घटनाओं का प्रदर्शन नाटक में सर्वथा वर्जनीय होता है।१"
यह है अरस्तू का घटनौचित्य।
(२) पद्य को ललित बनाने के अनेक उपाय हैं, परन्तु गद्य को सुन्दर
बनाने का एकमात्र उपाय रूपक की योजना है, ऐसा अरस्तू मानते हैं। साथ-
साथ यह भी मानते हैं कि रूपक को औचित्य-युक्त होना चाहिए, क्योंकि
अनौचित्यपूर्ण रूपक गद्य का भूषण नहीं, दूषण हो जाता है। "वर्णनीय वस्तु
की उत्कृष्टता दिखलाने के लिये तज्जातीय उत्कृष्ट गुणयुक्त वस्तु के साथ और
निकृष्टता दिखलाने के लिये हीनगुणसम्पन्न वस्तु के साथ रूपक बाँधना
चाहिए।२" यह है अरस्तू का रूपकौचित्य।
१. देखिए—पोएटिक्स, पृ० ६१
२. देखिए—अरस्तू : रिटॉरिक, पृ० २३२