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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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जो वस्तु जिसके अनुरूप होती है उसे हम 'उचित' कहते हैं और उचित
का भाव ही 'औचित्य' कहलाता है। यद्यपि यह लक्षण उतना अनुगत नहीं
है तथापि पाठकों के मानसपटल पर औचित्य की एक व्यावहारिक रूपरेखा इससे
अवश्य खिंच जाती है।
इसके अनन्तर औचित्य के प्रभेद किये गए हैं, जिनकी संख्या क्रमशः पद,
वाक्य, प्रबन्धार्थ, गुण, अलंकार, रस, क्रिया, कारक, लिङ्ग, वचन, विशेषण,
उपसर्ग, निपात, काल, देश, कुल, व्रत, तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह,
प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम, और आशीर्वाद के रूप में सत्ताईस ( २७ )
गिनाई गई है।
ये प्रभेद उपलक्षणमात्र हैं। वस्तुतः औचित्य के अनन्त भेद हो सकते हैं।
काव्य के प्रत्येक अङ्ग तथा उपांग पर इस तथ्य का व्यापक प्रभाव है। इस बात
को ग्रन्थकार ने स्वयं ग्रंथ-समाप्ति के अवसर पर स्पष्ट लिखा है। "अन्येषु
काव्याङ्गेषु अनयैव दिशा स्वयमौचित्यमुत्प्रेक्षणीयम् । तदुदाहरणानि आनन्त्यान्न
प्रदर्शितानि अलमतिप्रसङ्गेन।" यही औचित्यविचार-चर्चा की अन्तिम पङ्क्ति है।
इन गिनाए गए २७ प्रभेदों को हम पाँच वर्गों में विभक्त कर सकते हैं।
पद, वाक्य और प्रबन्ध ये तीन प्रथम वर्ग में रक्खे जा सकते हैं, जो मीमांसा-
दर्शन से संबद्ध विषय हैं। दूसरे वर्ग में गुण, अलंकार और रस का स्थान आता
है, जो काव्यशास्त्र अथवा अलङ्कारशास्त्र की वस्तुएँ हैं। तीसरे वर्ग में क्रिया,
कारक, लिंग वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात तथा काल का समावेश हो सकता
है, जो सबके सब व्याकरणशास्त्र के पदार्थ हैं। चतुर्थ वर्ग में देश, कुल एवम्
व्रत आ सकते हैं, जिनका संबन्ध लोकतन्त्र से है।
पञ्चमवर्ग में आते हैं—तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह, प्रतिभा
अवस्था, विचार, नाम और आशीर्वाद, इनका संबन्ध वक्ता—कवि से है
इनमें आदिम चार वर्ग प्रसिद्ध काव्याङ्ग हैं, इन पर प्राचीन काव्याचार्यों
द्वारा अनेक प्रकार के विचार किए जा चुके थे, पर क्षेमेन्द्र ने इन पर भी ए
नवीन दृष्टिकोण से, किन्तु पूर्वाभास के रूप में ही विचार किया है।
पंचमवर्ग आचार्य क्षेमेन्द्र की मौलिक देन है। भारतीय आलोचना-पद्ध