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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

( २७ )
काव्य-तत्त्व के रूप में प्रायः बहुत पहले ही आविर्भूत हो चुका था। अलंकार के
परिशीलन से वक्रोक्ति की उत्पत्ति हुई और रसध्वनि के अध्ययन से औचित्य
का उदय हुआ। ध्वन्यालोक में औचित्य-तत्त्व के साङ्गोपाङ्ग निरूपण से अनेक
आलोचकों की दृष्टि रस से हट कर औचित्य पर जा जमी। वे लोग काव्य में
रस के महत्त्व को न मानकर औचित्य को ही काव्य की आत्मा कहने लगे।
अभिनवगुप्त का ज्ञान किये बिना औचित्य पद का प्रयोग अत्यन्त असंगत है।
औचित्य का तात्पर्य तभी बोधगम्य हो सकता है, जब जिसके प्रति इसे
उचित बतलाया जाय वह वस्तु भी वर्तमान हो। औचित्य तो एक संबन्ध-विशेष
ठहरा और उस वस्तु का ज्ञान हमें प्रथमतः अपेक्षित है जिसके साथ यह संबन्ध
स्थापित किया जा सके। यह आवश्यक वस्तु रस आदि ही है। रस आदि के
बिना औचित्य की सत्ता का प्रतिपादन कोई मूल्य नहीं रखता। रस तथा ध्वनि
के साथ औचित्य का प्रगाढ संबन्ध है। इसका निर्देश अभिनवगुप्त ने स्पष्ट
शब्दों में किया है।१
इस प्रकार रस और ध्वनि के साथ औचित्य के संबन्ध को स्थिर करने के
कारण अभिवगुप्त सदा साहित्य-जगत् में अमर रहेंगे इसमें संदेह नहीं।
भोजराज
‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ तथा ‘शृङ्गारप्रकाश’ ये दो भोजकृत अलंकारशास्त्रीय
विशाल निबन्ध परमप्रसिद्ध हैं। यद्यपि इन दोनों निबन्धों में कहीं भी स्वतन्त्र
काव्यतत्त्व के रूप में औचित्य का उल्लेख भोजराज ने नहीं किया है, तथापि
गौणरूप से औचित्य-सिद्धान्त उनके ग्रन्थों में वर्तमान है यह कथा निस्सन्दिग्ध
रूप में कही जा सकती है। कारण, उनके ग्रन्थों में दोष, गुण तथा अलंकार
के निरूपणप्रसङ्ग में ऐसे अनेक भेद बतलाये गए हैं जिनका मूल आधार यह
‘औचित्य’ ही है।
१—‘अपद’ नामक एक स्वतन्त्र दोष भोज ने माना है।२ इनके मत में पद
छह प्रकार के होते हैं—प्रकृतिस्थ, कोमल, कठोर, ग्राम्य, नागर तथा उपनागर।
१. औचित्यवती ( अतिशयोक्तिः ) जीवितमितिचेद् औचित्यनिबन्धनं
रसभावादि मुक्त्वा नान्यत् किञ्चिदस्ति इति । तदेवान्तर्भासि मुख्यं जीवितम्
इत्यभ्युपगन्तव्यम्, न तु सा । ( लोचन )
२. विभिन्नप्रकृतिस्थादिपदयुक्त्यपदं विदुः । ( स. कण्ठा. ५।२४ )

( २८ )
काव्य अथवा नाटक में वक्ता के अनुरूप ही पद होना चाहिए। ग्रामीण वक्ता
के द्वारा प्रयोग करने योग्य पदों का प्रयोग नागर वक्ता के द्वारा किया जाना
अत्यन्त अरुचिकर है। ऐसा दोष 'अपद' कहलाता है।
२--वाक्यार्थ-दोषों में जिस 'विरस' नामक दोष की चर्चा भोज ने की है
वह रसानौचित्य का एक प्रकार है। स्वयं भी वे उस दोष को अप्रस्तुत रस की
संज्ञा देते हैं। रत्नेश्वर ने ( भोज के टीकाकार ) इस स्थल पर आनन्दवर्धन के
प्रसिद्ध पद्य "अनौचित्यादृते नान्यत्" को अपनी टीका में उद्धृत किया है।
३--देश-विरोध, काल-विरोध, लोक-विरोध, अनुमान-विरोध आदि अनेक
भेदों वाला उनका 'विरुद्ध' नामक दोष अनौचित्य के ऊपर ही अवलंबित है।
अनुमान-विरोध के अन्तर्गत औचित्यविरुद्ध नामक एक नवीन दोष की उन्होंने
कल्पना की है। १
४--भोज के ग्रन्थ में वर्णित 'भाविक' नामक शब्दगुण का भी आधार यह
औचित्य ही ज्ञात होता है। कारण “हे पूर्णचन्द्रस्वरूप, वत्स, रघुनन्दन, आ-
[L15

( २९ )
दोष है, पर मत्त तथा बालक आदि की उक्ति में यह दोष नहीं माना जा
सकता १. क्योंकि यहाँ औचित्य की हानि नहीं होती ।
६--औचित्यतत्त्व पर आश्रित अनेक अलंकारों का भी वर्णन भोजराज ने
अलंकार प्रकरण में किया है। शब्दालंकार के मध्य में 'जाति' नामक
एक अलंकार का निर्देश उन्होंने किया है। शब्दालंकाररूप यह 'जाति' संस्कृत,
प्राकृत, अपभ्रंश आदि विभिन्न भाषाओं का विशिष्ट प्रकार है, जिसका उचित
अवसरों पर उचित प्रयोग कविकौशल का मुख्य प्रमाण है। अवसरविशेष पर
तथा वस्तुविशेष के लिये तदनुरूप भाषा का प्रयोग करना चाहिए। विषय,
वक्ता, देश और काल के औचित्य पर दृष्टि रख कर ही भाषा का प्रयोग कवि के
लिये सर्वथा समीचीन होता है। अवसरविशेष पर ही विभिन्न भाषाओं का
चमत्कार सहृदयों के हृदय में आनन्द का उन्मेष करता है। यज्ञ के समान
पवित्र अवसरों पर संस्कृत भाषा का ही प्रयोग उचित है। स्त्रियों के मुख से
प्राकृत भाषा का ही प्रयोग न्याय्य है। कुलीन जनों के लिये संकीर्ण भाषा का
प्रयोग गौरवाधायक नहीं होता। मूर्ख जनों को समझाने के लिये संस्कृत में
भाषण उपहासास्पद होता है। २ भाषा के प्रयोग में प्रतिपाद्य विषय के औचित्य
पर भी ध्यान देना चाहिए। अतएव भोज ने कहा है कि कोई अर्थ संस्कृत के ही
द्वारा प्रतिपाद्य हो सकता है तो कोई प्राकृत के द्वारा और कोई अपभ्रंश के द्वारा। ३
कितना गिनाया जाय ? और भी बहुत ऐसी मान्यतायें भोजराज की हैं
जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि भोजराज की दृष्टि में भी औचित्य एक
आवश्यक काव्योपादान है।
कुन्तक
कुन्तक का "वक्रोक्तिजीवित" मौलिकता तथा प्रौढ़ता के कारण संस्कृत के
१. विरोधः सकलेष्वेव कदाचित् कविकौशलात् ।
उत्क्रम्य दोषगणनां गुणवीथीं विगाहते ॥ ( १।१५६ )
समुदायार्थशून्यं यत्तदपार्थं प्रचक्षते ।
तन्मत्तोन्मत्तबालानामुक्तेरन्यत्र दुष्यति ॥ ( १।११६ )
२. न म्लेच्छितव्यं यज्ञादौ, स्त्रीषु नाप्राकृतं वदेत् ।
संकीर्णं नाभिजातेषु, नाप्रबुद्धेषु संस्कृतम् ॥ ( २।८ )
३. संस्कृतेनैव कोऽप्यर्थः, प्राकृतेनैव वा परः ।
शक्यो रचयितुं कश्चिदपभ्रंशेन जायते ॥ ( २।१० )

( ३० )

अलंकार ग्रंथों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इसके अनुसार वक्रोक्ति हो—
लोक तथा शास्त्र में प्रसिद्ध शैली से भिन्न शैली द्वारा शब्दार्थों का वैचित्र्यपूर्ण
कथन—काव्य में सबसे सारभूत पदार्थ है। इस वक्रोक्ति को काव्य का जीवित
मानने के कारण ही इनका ग्रन्थ 'वक्रोक्तिजीवित' नाम से प्रसिद्ध है।
कुन्तक के मत से काव्य का प्राण तो निश्चय ही वक्रता है, किन्तु वक्रता का
मूल आधार औचित्य ही है, क्योंकि उन्होंने स्वयं कहा है कि "पादवक्रता का
रहस्य है पद का औचित्य। कारण, उचित (यथानुरूप) कथन ही (वक्रता
का) जीवन है। वक्तव्य अर्थ के एक अंश में भी औचित्य के अभाव से काव्य-
मर्मज्ञों को आह्लादित करना संभव नहीं है।"१ कुन्तक ने अपने काव्य-लक्षण में
भी औचित्य को आधारभूत तत्त्व माना है।
शब्दार्थौ सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनि ।
बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्लादकारिणि ॥
यही उनका काव्य-लक्षण है। यहाँ काव्य के आधार रूप में शब्दार्थ का
'साहित्य' स्वीकृत किया गया है और 'साहित्य' से कुन्तक का अभिप्राय
निश्चित रूप से शब्द और अर्थ का पूर्ण सामञ्जस्य ही है, क्योंकि "समर्थ" शब्द
के अभाव में अर्थ स्वरूपतः स्फुरित होने पर भी निर्जीव-सा ही रहता है। इसी
प्रकार शब्द भी वाक्योपयोगी अर्थ के अभाव में अन्य अर्थ का वाचक होकर
वाक्य का भार-सा प्रतीत होता है"२ ऐसा उन्होंने स्वयं कहा है। इस कथन
से स्पष्ट है कि 'साहित्य' का अर्थ है शब्द और अर्थ का उचित सहभाव
अथवा संबन्ध।
कुन्तक के अनुसार मार्ग (रीति) तीन प्रकार के होते हैं—सुकुमार,
विचित्र तथा मध्यम। इन तीनों मार्गों में समान रूप से रहने३ वाले दो


१. तत्र पदस्य तावदौचित्यं वक्रतायाः परं रहस्यम्, उचिताभिधानजीवि-
त्वात्। वाच्यस्याप्येकदेशेऽप्यौचित्यविरहात् तद्विदाह्लादकारित्वहानिः।
(१ उन्मेष ५७वीं कारिका की वृत्ति)
२. तथा चार्थः समर्थवाचकाऽसद्भावे स्वात्मना स्फुरन्नपि मृतकल्प एवाव-
तिष्ठते। शब्दोऽपि वाक्योपयोगिवाच्यासंभवे वाच्यान्तरवाचकः सन् वाक्यस्य
व्याधिभूतः प्रतिभाति। (१।१७ वीं कारिका की वृत्ति)
३. एतत् त्रिष्वपि मार्गेषु गुणद्वितयमुज्ज्वलम् !
पदवाक्यप्रबन्धानां व्यापकत्वेन वर्तते ॥ (१।५७)

( ३१ )
सामान्य गुणों का उल्लेख कुन्तक ने किया है। इन दोनों गुणों के नाम क्रमशः
औचित्य और सौभाग्य रखे गए हैं। औचित्यगुण की परिभाषा करते हुए
उन्होंने कहा है कि—"जिस स्पष्ट वर्णन-प्रकार के द्वारा स्वभाव के महत्त्व का
पोषण होता है वही औचित्य नामक गुण है, इसका मूल है उचित आख्यान अर्थात्
यथानुरूप कथन¹ ।"
इस विवेचन से सिद्ध होता है कि कुन्तक औचित्य को सबसे व्यापक काव्य-
तत्त्व मानते हैं। इतना ही नहीं, वक्रोक्ति के अवान्तर भेदों में भी वे औचित्य
को आधार स्वीकार करते हैं।
वर्णविन्यास-वक्रता के विवेचन में कुन्तक ने स्पष्ट लिखा है कि वक्रतापूर्ण
वर्णयोजना अनिवार्यरूप से प्रस्तुतौचित्यशोभिनी होती है--अर्थात् काव्य में
वर्णों का विन्यास प्रस्तुत प्रसङ्ग के अनुरूप ही होना चाहिए, उससे स्वतन्त्र
नहीं² । इसी प्रकार पद-पूर्वार्ध-वक्रता तथा प्रत्ययवक्रता के अनेक प्रमुख भेद
भी औचित्यमूलक ही हैं :—( १ ) पर्यायवक्रता का आधार है उचित पर्याय का
चयन अथवा पर्यायौचित्य, ( २ ) विशेषणवक्रता का आधार है उचित विशेषण
का निर्वाचन, ( ३ ) वृत्तिवक्रता में समासरचना का औचित्य अपेक्षित होता है
और ( ४ ) लिङ्गवक्रता का आधारभूत सौन्दर्य लिङ्गप्रयोग के औचित्य पर
ही आश्रित है। इसी प्रकार प्रत्ययवक्रता के भी प्रमुख भेदों में कारक, पुरुष,
संख्या, काल, उपग्रह आदि के औचित्य का ही चमत्कार वर्तमान रहता है।
वक्रता का चतुर्थ भेद है वाक्यवक्रता जिसके दो रूप हैं :--( १ ) वस्तुवक्रता,
अर्थालंकार। इन दोनों में भी कुन्तक ने औचित्य को ही प्रमाण माना है।
वस्तुवक्रता के प्रसङ्ग में एक स्थान पर कुन्तक ने औचित्य को वस्तुवर्णन का
आधारभूत अनिवार्य सिद्धान्त घोषित किया है। स्वभावोक्ति का निराकरण
करते हुए उन्होंने लिखा है--:"स्वभाव के ( स्वरूप के ) कथन के बिना वस्तु
का वर्णक ही संभव नहीं हो सकता क्योंकि स्वभाव से रहित वस्तु निरूपाख्य
१. आञ्जसेन स्वभावस्य महत्त्वं येन पोष्यते ।
प्रकारेण तदौचित्यमुचिताख्यानजीवितम् ।। ( १।५३ )
२. वर्गान्तयोगिनः स्पर्शाद्विरुक्तास्तलनादयः ।
शिष्टाश्चरादिसंयुक्ताः प्रस्तुतौचित्यशोभिनः ।। ( २।२ )

( ३२ )

( असत्कल्प ) हो जाती है¹ ।" कहने की आवश्यकता नहीं कि यह स्वभावकथन
क्षेमेन्द्र के 'सदृशं किल यस्य यत्' अर्थात् यथानुरूप वर्णन से मूलतः अभिन्न है ।
ऐसे ही अर्थालंकार के प्रयोग में भो औचित्य ही प्रमाण है । कुन्तक के मत से
अलंकारों का वर्ण्य-विषय के अनुरूप उचित प्रयोग ही वांछनीय है, क्योंकि उनके
विचार से “वाच्य अलंकार उपमा आदि का अधिक उपयोग उचित नहीं हो
सकता । कारण यह है कि उससे स्वाभाविक सौन्दर्य के अतिशय में मलिनता
आने का भय रहता है² ।"
यह अनधिक प्रयोग वास्तव में अलंकारौचित्य का ही दूसरा नाम है । इसके
अतिरिक्त दोपक आदि कतिपय अलंकारों के प्रसङ्ग में कुन्तक ने औचित्य का
स्पष्ट उल्लेख भी किया है—"औचित्य के अनुरूप सुन्दर और सहृदयों के
आह्लादकारक ( प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत ) पदार्थों के अप्रकट अर्थात् प्रतीयमान
धर्म को प्रकाशित करने वाला अलंकार दीपक है³ ।" अन्त में प्रकरण तथा
प्रबन्धवक्रता के प्रसङ्ग में भी कुन्तक ने अनेक प्रकार से औचित्य की स्तुति
की है । उदाहरण के लिए प्रबन्धवक्रता का एक प्रमुख भेद है उत्पाद्यलावण्य,
जिसके दो रूप हैं :-- ( १ ) अविद्यमान की कल्पना ( २ ) विद्यमान का
संशोधन । इन दोनों वक्रताभेदों का आधार स्पष्ट रूप से औचित्य-कल्पना ही
है । कवि अपनी प्रसिद्ध कथा के अनौचित्य के परिहार और औचित्य के संरक्षण
के निमित्त ही उपर्युक्त चमत्कारपूर्ण पद्धतियों का प्रयोग करता है । कुन्तक ने
स्पष्ट शब्दों में इस तथ्य को स्वीकार किया है । "उत्पाद्यलावण्य के दो रूप
हैं—( १ ) अविद्यमान की कल्पना और ( २ ) सहृदय के आह्लाद के निमित्त
औचित्यरहित विद्यमान का अन्यथा प्रतिपादन ४ ।" उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है
कि वक्रोक्ति तथा औचित्य में घनिष्ठ संबन्ध है ।
१. स्वभावव्यतिरेकेण वक्तुमेव न युज्यते ।
वस्तु तद्रहितं यस्मान्निरुपाख्यं प्रसज्यते ॥ ( १।१२ )
२. तदिदमुक्तं भवति यदेवंविधे भावस्वभावसौकुमार्यवर्णनप्रस्तावे भूयसा
न वाच्यालंकाराणामुपमादीनामुपयोगयोग्यता संभवति, स्वभावसौकुमार्यातिशय-
म्लानताप्रसङ्गात् । ३।१ कारिका की वृत्ति ।
३. औचित्यावहमम्लानं तद्विदाह्लादकारणम् ।
अशक्तं धर्ममर्थानां दीपयद् वस्तु दीपकम् ॥ ( ३।१७ )
४. उत्पाद्यलावण्यमिति द्विधा व्याख्येयम् । क्वचिदसदेवोत्पाद्यम् अथवा

( ३३ )
महिमभट्ट
यद्यपि महिमभट्ट ने आनन्दवर्धन के द्वारा स्थापित ध्वनि-पदार्थ का खण्डन
कर रस आदि व्यङ्ग्य अर्थों को अनुमेय सिद्ध करने के उद्देश्य से अपने प्रसिद्ध
ग्रन्थ व्यक्तिविवेक का निर्माण किया है, तथापि इस मुख्य विषय के उपपादन-
क्रम में अनेक काव्य-सिद्धान्तों का उल्लेख उन्होंने किया है। ऐसी स्थिति में यदि
हम काव्यसम्बन्धी व्यापक तत्त्व औचित्य का भी विश्लेषण व्यक्तिविवेक में
पाते हैं तो यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। व्यक्तिविवेककार ने प्रसङ्गवश
एक जगह लिखा है कि—"औचित्य एक ऐसा काव्यतत्त्व है को काव्य-स्वरूप के
निरूपण की महिमा से स्वतःसिद्ध है, अतः पृथक् उसकी चर्चा व्यर्थ है।
विभाव, अनुभाव और संचारीभाव का वर्णन करना ही कवि का कर्तव्य है,
दूसरा नहीं। वे ही विभावादि शास्त्रानुगार कवि के द्वारा उपनिबद्ध होने पर
रसाभिव्यक्ति के हेतु होते हैं, अन्यथा नहीं। काव्य की आत्मा है रस,
फिर उसमें अनौचित्य के स्पर्श की संभावना भी कैसे हो सकती है? जब
अनौचित्य की काव्य में संभावना ही नहीं तब उसको हटाने के लिये जो
पण्डितगण भिन्न-भिन्न तरह के काव्यलक्षणों की सृष्टि करते हैं वह सर्वथा
व्यर्थ है१। इस प्रतिपादन से सिद्ध होता है कि महिमभट्ट काव्य में औचित्य के
समर्थक थे। प्रसङ्गान्तर्गत उनकी उक्तियों से भी इस बात की पुष्टि होती है।
महिमभट्ट का दोषविवेचन बड़ा प्राञ्जल है। इस प्रसङ्ग पर उन्होंने कहा है कि
“अनौचित्य ही काव्य का एकमात्र सर्वातिशायी दोष है जिसके अन्तर्गत समस्त
दोषों का अन्तर्भाव किया जा सकता है। अनौचित्य का सामान्य लक्षण है कवि
के द्वारा वाञ्छित रस आदि की प्रतीति में विघ्नकारी होना२।” आगे चलकर
आहृतम्, क्वचिदौचित्यत्यक्तं सदप्यन्यथासम्पाद्यम् सहृदयहृदयाह्लादनाय। (४।४
वी कारिका की वृत्ति।)
१. तस्य (अनौचित्यस्य) काव्यस्वरूपनिरूपणसामर्थ्यसिद्धस्य पृथगुपादान-
वैयर्थ्यात्। विभावाद्युपनिबन्ध एव हि कविब्यापारो नापरः। ते च यथाशास्त्र-
मुपनिबध्यमानारसाभिव्यक्तेर्निबन्धनभावं भजन्ते, नान्यथा। रसात्मकं च काव्य-
मिति कुतस्तत्रानौचित्यस्पर्शः संभाव्यते, यन्निरासार्थमित्थं काव्यलक्षणमाचक्षीरन्
विचक्षणम्मन्याः। (व्य० वि० पृ० १२६)
२. एतस्य (अनौचित्यस्य) विवक्षितरसादिप्रतीतिविघ्नविधायित्वं नाम
सामान्यलक्षणम्। (व्य. वि., उन्मेष २, पृ. १५२)

पुनः उन्होंने कहा है कि—"दो प्रकार के अनौचित्य काव्य में हो सकते हैं—
( १ ) अर्थविषयक और ( २ ) शब्दविषयक । उन दोनों में प्रथम—अर्थात्
अर्थविषयक अनौचित्य का लक्षण है विभावादिकों का रसों में अयथायथ
( प्रतिकूलतापूर्ण ) निवेश । यही अनौचित्य अन्तरङ्ग है और इसका विवेचन
प्राचीन आचार्यों ने ही कर दिया है, अतः मैं अपने ग्रन्थ में उसका विस्तार नहीं
करना चाहता ।
दूसरा—अर्थात् शब्दविषयक अनौचित्य के बहुत प्रकार हो सकते हैं, जैसे—
विधेयाविमर्श, प्रक्रममेद, क्रमभेद, पौनरुक्त्य और वाच्यावचन १ ।
रस तथा औचित्य के विषय में महिमभट्ट आनन्दवर्धन के ही अनुयायी हैं ।
आनन्दवर्धन के समान महिमभट्ट ने भी अनौचित्य को प्रधान दोष स्वीकार किया
है । समग्र दोष रस के व्याघातक होते हैं । इसीलिये महिमभट्ट ने रसानौचित्य
अन्तर्गत समस्त दोष प्रकरण का समावेश कर दिया है२ । इन सभी विवेचनों
से वही एक बात पुष्ट होती है कि महिमभट्ट के भी विचारानुसार औचित्य
काव्य का सर्वातिशायी उपादान है ।
क्षेमेन्द्र
ऐतिहासिक क्रम से महिमभट्ट के बाद ही औचित्य के आधार पर एक
नवीन सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य क्षेमेन्द्र ने इस धराधाम में पदार्पण किया
और अमरभारती के भण्डार को विविध ग्रन्थरत्नों से परिपूर्ण करने में अपने
जीवनकाल का उपयोग किया । औचित्यविचारचर्चा इन्हीं की अमर कृति है
१. इह खलु द्विविधमनौचित्यमुक्तम्, अर्थविषयं शब्दविषयं चेति । त
विभावानुभावव्यभिचारिणाम् अयथायथं रसेषु यो विनियोगः तन्मात्रलक्षणमेव
मन्तरङ्गमाचार्यैरेवोक्तमिति नेह प्रतन्यते । अपरं पुनः बहिरङ्गं बहुप्रकारं संभवति
तद्यथा विधेयाविमर्शः, प्रक्रमभेदः, क्रमभेदः, पौनरुक्त्यं, वाच्यावचनञ्चेति ।
( व्य० वि०, उ० २ पृ० १४९-५१
२. कथञ्चिद्वा भिन्नक्रमतयापि अभिमतार्थसंबंधोपकल्पने प्रस्तुतार्थप्रतीतौ
विघ्नितत्वात् तन्निबन्धनो रसास्वादोऽपि विघ्नितः स्यात्, शब्ददोषाणा
अनौचित्योपगमात् तस्य च रसभङ्गहेतुत्वात् । यदाहुः--
अनौचित्यादृते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम् ।
प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत् परा ॥ (व्य० पृ० १३

( ३५ )
यद्यपि औचित्यतत्त्व की उद्भावना सर्वप्रथम इन्हीं के द्वारा इसी ग्रन्थ में नहीं
हुई, अपि तु चिरकाल से सभी आचार्य अपने-अपने ग्रन्थों में थोड़ी-बहुत चर्चा
इस तत्त्व की अवश्य कर गए थे तथापि इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि
मुख्यरूप से औचित्य का साङ्गोपाङ्ग वर्णन इसी ग्रन्थ में आकर हुआ और
औचित्य-सम्प्रदाय का उदय साहित्य-संसार में इस ग्रन्थरत्न के निर्माण हो चुकने
पर ही हुआ ।
अतः क्षेमेन्द्र विदग्ध मण्डली में औचित्य के व्यवस्थापक होने से चिरस्मर-
णीय रहेंगे । औचित्यतत्त्व को काव्य के सर्वातिशायी उपादान के रूप में प्रति-
ष्ठित करने का श्रेय विज्ञ आलोचकवर्ग सदा क्षेमेन्द्र को प्रदान करता रहेगा ।
क्षेमेन्द्र से पश्चाद्भावी आलङ्कारिक
यद्यपि साहित्यिक जगत् के लिये एक प्रकार से इसे दुर्भाग्य का ही विषय
समझा जा सकता है कि क्षेमेन्द्र के द्वारा प्रवर्तित औचित्य-सम्प्रदाय को किसी
अनन्तर्भावी आचार्य ने अग्रसर नहीं किया, तथापि औचित्यतत्त्व का अपलाप
किसी ने नहीं किया है ! मम्मट १ से लेकर पण्डितराज तक की आलंकारिक
परम्परा ने भी अपने-अपने ग्रन्थों में किसी न किसी रूप से इस तत्त्व के प्रति
आस्था अवश्य प्रकट की है। खासकर दोषविवेचन के अवसर पर सभी ने
औचित्य का, निषेधमुखेनैव सही, पर स्मरण अवश्य किया है । यद्यपि यह बात
कही जा सकती है कि औचित्यतत्त्व का स्मरण करते समय इन आचार्यों के
मानसपटल पर, क्षेमेन्द्र नहीं, अपितु आनन्दवर्धन ही उदित थे और उदित थी
आनन्दवर्धन की 'अनौचित्यादृते नान्यत् रसभङ्गस्य कारणम्' यह सुविख्यात
पङ्क्ति, तथापि क्षेमेन्द्र-स्थापित सिद्धान्त-पोषकता तो उन लोगों की सिद्ध होती
ही है। मेरे कथन का उद्देश्य भी उतना ही है।
पाश्चात्त्य आलोचक और औचित्य
अब यहाँ जिज्ञासु पाठकों के लाभ को दृष्टि में रखकर, संक्षेप में, औचित्य
में संबन्ध रखने वाले पाश्चात्य आलोचकों के मतों का दिग्दर्शन कराया जा रहा
रहा है ।
पाश्चात्य साहित्य-शास्त्रकारों में प्राचीन आलोचकों ने 'औचित्य' का
१. मम्मट-क्षेमेन्द्र समकालीन थे।

( ३६ )
विचार किया है, नवीन आलोचकों ने नहीं। प्राचीनों की भी औचित्यविषयक
आलोचना भारतीय आचार्यों की आलोचना के सामने नगण्य-सी है, क्योंकि
पाश्चात्यों की आलोचना के अनुसार 'औचित्य' काव्य का बहिरङ्ग साधन मात्र
है और भारतीयों की आलोचना के अनुसार वह काव्य का ही नहीं, अपितु सकल
ललित कलाओं का अन्तरङ्ग साधन है--प्राण है।
पाश्चात्यों ने प्रकृत्यौचित्य, घटनौचित्य, वर्णौचित्य—आदि औचित्य के
कतिपय प्रकारों का ही विवेचन किया है जो काव्य के बहिरङ्ग साधन हैं। उन
लोगों की पहुँच रस तक प्रायः नहीं हो सकी, अतः वे उक्त बहिरङ्ग तत्त्वों में
ही उलझे रहे। फलतः उनकी औचित्यसमीक्षा उतनी मौलिक अथच गूढ़ नहीं
हो सकी, जितनी रसवादी भारतीयों की।
औचित्य के ऊपर प्रकाश डालने वाले पाश्चात्य आलोचकों में अरस्तू
लाञ्जिनस, होरेस और पोप के नाम विशेषरूप से लिए जा सकते हैं।
अरस्तू के दो ग्रन्थ पाश्चात्य आलोचना-जगत् में परम प्रसिद्ध हैं--(१)
पोएटिक्स तथा (२) रेटारिक। दोनों ही ग्रन्थों में औचित्य-तत्त्व की समीक्षा की
गई है।
(१) नाटक का दृश्य वास्तविक होना चाहिए, काल्पनिक नहीं, जिससे द्रष्टा
को उन दृश्यों के देखते समय असत्यता का भान नहीं हो। इस प्रसङ्ग पर अरस्तू
का कथन है कि "नाटक में जो दृश्य दिखलाये जाँय उन्हें उचित होना चाहिए।
उचित घटनाओं के प्रदर्शन से ही नाटककार की अभीष्ट-सिद्धि होती है। वस्तु-
जगत् से असंबद्ध घटनाओं का प्रदर्शन नाटक में सर्वथा वर्जनीय होता है।१"
यह है अरस्तू का घटनौचित्य।
(२) पद्य को ललित बनाने के अनेक उपाय हैं, परन्तु गद्य को सुन्दर
बनाने का एकमात्र उपाय रूपक की योजना है, ऐसा अरस्तू मानते हैं। साथ-
साथ यह भी मानते हैं कि रूपक को औचित्य-युक्त होना चाहिए, क्योंकि
अनौचित्यपूर्ण रूपक गद्य का भूषण नहीं, दूषण हो जाता है। "वर्णनीय वस्तु
की उत्कृष्टता दिखलाने के लिये तज्जातीय उत्कृष्ट गुणयुक्त वस्तु के साथ और
निकृष्टता दिखलाने के लिये हीनगुणसम्पन्न वस्तु के साथ रूपक बाँधना
चाहिए।२" यह है अरस्तू का रूपकौचित्य।
१. देखिए—पोएटिक्स, पृ० ६१
२. देखिए—अरस्तू : रिटॉरिक, पृ० २३२

( ३७ )
(३) भाषणकला के कुछ नियम हैं भाषण की शैली भावद्योतक तथा
नीतिपूर्ण होनी चाहिए । साथ ही विषय के अनुरूप होनी चाहिए । अनुरूप-शैली
से अभिप्राय है कि¹--विषय के उदात्त होने पर रचनाप्रकार को क्षुद्र नहीं होना
चाहिए । विषय के साधारण होने पर रचनाप्रकार को क्षुद्र नहीं होना चाहिए ।
विषय के साधारण होने पर रचना-प्रकार को उदात्त कभी नहीं होना चाहिए ।
इसी प्रकार महत्त्वहीन शब्द के संबन्ध में अलंकृत तथा विचित्र विशेषणों का
प्रयोग सर्वथा अनुचित होता है । अतः भाषण करते समय अथवा लिखते समय
विषय की अनुरूपता का ध्यान अवश्य रखना चाहिए । यह है अरस्तू का
विषयौचित्य ।
(४) अरस्तू ने 'रेटारिक' के तृतीय खण्ड के सप्तम परिच्छेद में 'औचित्य'
( Propriety ) का विस्तृत वर्णन किया है । वक्ता को श्रोतृ-हृदय-वशीकरण-
रूप निजोद्देश्य को सिद्ध करने के लिये अपने मनोभावों का प्रभाव श्रोताओं के
ऊपर डालना पड़ता है । श्रोताओं के हृदय को वशीभूत करने का मुख्य उपाय
है रसानुकूल भाषा का प्रयोग² । अनादर-भावाभिव्यञ्जन के लिये क्रोधपूर्ण
भाषा का प्रयोग करना चाहिए । क्षुद्रता की अभिव्यक्ति के लिये वक्ता को उस
( क्षुद्र वस्तु ) का नाम ग्रहण भी नहीं करना चाहिए । प्रशंसनीय वस्तु के वर्णन
में भाषा भी तदनुरूप होनी चाहिए । हार्दिक भावों की अभिव्यक्ति भाषा के
द्वारा ही होती है । अतः भाव तथा भाषा में अनुरूपता नितान्त अपेक्षित है । इन
दोनों का सामञ्जस्य ही वक्ता तथा लेखकों की सफलता का रहस्य है ।
लाङ्गिनस ( २१३ ई०-२७३ ई० ) द्वारा रचित ग्रन्थ On the
Sublime पाश्चात्य आलोचनाशास्त्र का मौलिक ग्रन्थ माना जाता है । वे
कविता में ही नहीं, अपितु समग्र ललित कलाओं में चमत्कृतिजनक वस्तु—
'भव्यता' ( Sublimity ) को मानते हैं । इस भव्यता के विधान के विविध
प्रकारों के विवेचन-क्रम में ही उन्होंने औचित्य का भी विचार किया है ।
(१) लाङ्गिनस अलंकारों के द्वारा भी काव्य में भव्यता का उदय मानते
हैं । अलंकार शब्द तथा अर्थ को सुन्दर बनाते हुए काव्य में भव्यता के प्रधान
कारण होते हैं । अलंकार और भव्यता में परस्परोपकार्योपकारकभाव सा होता
१. देखिए--रिटॉरिक, खण्ड ३, परि० ७, पृ० २४५
२. देखिए--रिटॉरिक, खण्ड ३, परि० ७, पृ० २४५

है--अलंकार भव्यता का वर्धक होता है और भव्यता से अलंकार की चमत्कृति
चौगुनी हो उठती है ।
किन्तु समस्त अलंकारों में यह क्षमता नहीं रहती है । जिनको सत्ता पृथक्
रूप से पाठकों को भासित नहीं हो वे ही अलंकार काव्य में श्रेष्ठ समझे जा सकते
हैं । अलंकारों की अलंकारत्वभावना यदि पाठक के ध्यान में नहीं आवे तो
वही अलंकार सुन्दरतम प्रतीत होता है । लाङ्गिनस का यह अलंकारौचित्य बहुत
कुछ आनन्दवर्धन के 'अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यः सोऽलंकारो ध्वनौ मतः' से समानता
रखता है ।
(२) लाङ्गिनस ने शब्दौचित्य पर अधिक ध्यान दिया है । उचित शब्दों के
चुनाव पर कविता का प्रभाव विशेषरूप से अवलम्बित रहता है । उचित पद-
विन्यास से काव्य अथवा भाषण में जीवनीशक्ति की वृद्धि होती है । जिस
काव्य अथवा भाषण में जितनी अधिक सप्राणता होगी वह उतना ही अधिक
पाठकों अथवा श्रोताओं को चमत्कृत-प्रभावित कर सकेगा । शब्दौचित्य की महिमा
विलक्षण होती है । सुन्दर तथा उचित शब्द अर्थ का वास्तविक आलोक है ।
उचित अर्थ की अभिव्यक्ति करने की योग्यता उचित शब्द ही में रहती है ।
परन्तु कवि को इस विषय में सदा सावधान रहना चाहिए कि भव्य तथा
माहात्म्यमण्डित शब्दों का प्रयोग भव्य विषय के वर्णन में ही किया जाय । यदि
भव्य पद का प्रयोग तुच्छ--अभव्य पदार्थ के वर्णन में किया जायगा तो वह
उपहासास्पद होता है ।
इस प्रकार लाङ्गिनस काव्य में औचित्य के प्रबल पक्षपाती हैं । उनके
विचार से शब्दौचित्य का विधान काव्य में सौन्दर्य, शक्ति, प्रभाव, महत्त्व तथा
भव्यता का उत्पादक होता है तथा अन्य आवश्यक काव्यगुण का भी उदय स्वतः
हो जाता है ।
होरेस (६५ ई० पू०-८ ई० पू०)--लैटिन भाषा के अति लोकप्रिय कवि
हैं । आलोचना के विषय में इनकी प्रसिद्ध पुस्तक है--Art Poetica-Art of
Poetry--'काव्यकला' । यह अपूर्ण ग्रन्थ है । फिर भी काव्यविवेचना में यह
ग्रन्थ अप्रतिम समझा जाता है । होरेस 'औचित्य' के परम पुजारी हैं । इन्होंने
कवियों को लक्ष्य कर तीन उपदेश दिये हैं-- ( १ ) ग्रीक आदर्शों का अनुकरण
करो, ( २ ) पात्र के स्वरूप की रक्षा करो तथा ( ३ ) औचित्य के संरक्षण

( ३९ )
पर सर्वाधिक ध्यान दो। औचित्य के विषय में होरेस के सिद्धान्त भरत के
नाट्यशास्त्र में प्रतिपादित अनेक तथ्यों के साथ पूर्ण सादृश्य रखते हैं। होरेस
नाटक अथवा काव्य के कथानक के विषय में अपना मन्तव्य प्रकट करते हुए
लिखते हैं कि कविपरम्परागत अथवा नवकल्पित—दोनों प्रकार के कथानकों का
ग्रहण कर सकता है, पर परम्परागत कथानक के ग्रहण करने पर उस परम्परा
का विधिवत् पालन करना चाहिए और नवीन कथानक की कल्पना में इस बात
पर ध्यान रखना चाहिए कि जो पात्र प्रथमबार जिस रूप में अङ्कित किया जाय
उस पात्र के उस रूप का निर्वाह अन्त तक हो। उग्र रूप में अवतीर्ण पात्र का
स्वरूप-निर्वाह अन्त तक उसकी उग्रता की रक्षा करने में ही होता है। दया का
अवतार पात्र यदि दानवता का नग्न नर्तन करने लगे तो वह अपने स्वरूप से
अत्यन्त च्युत हो जाता है१। होरेस का यह नियम भरत के 'प्रकृत्यौचित्य' के
अन्तर्गत आता है।
होरेस ने अभिनय-कला के विषय में बड़ा ही मार्मिक विवेचन किया है।
उनका कथन है कि अभिनय एक विशिष्ट कला है और इसमें औचित्य का
आश्रय प्रधान है। दुःखद शब्दों के उच्चारण करते समय अभिनेता का चेहरा
उदास होना चाहिए, डाट-डपट करते समय उसकी मुखमुद्रा क्रुद्ध की-सी होनी
चाहिए, हँसी की वार्ता में चेहरा खिलता होना चाहिए और गम्भीर वार्ता
के लिये मुखमंडल को गंभीरता नितान्त आवश्यक है। होरेस का यह
अभिनयोचित्य है।
अभिनय रङ्गमञ्च पर वस्तु के प्रदर्शन से अथवा वस्तु के कथन से आरम्भ
होता है। परन्तु कौन वस्तु रङ्गमञ्च के ऊपर अभिनययोग्य है ? कौन-सी
नेपथ्यगृह से सूचनीय है ? इसके लिए कवि को सदा सावधान रहना चाहिए।
जो घटना दर्शकों के चित्त में घृणा अथवा अश्लीलता का भाव उत्पन्न कर
सकती है उसका प्रदर्शन किसी भी प्रकार से उचित नहीं माना जा सकता।
मीड़िया के द्वारा अपने पुत्रों का वध क्या कभी रङ्गमञ्च के ऊपर दर्शकों के
समक्ष अभिनीत किया जा सकता है ? कारण स्पष्ट है—अनौचित्य। होरेस का
यह नियम क्षेमेन्द्र का घटनौचित्य है। संस्कृत के आलोचकों में भरत से लेकर
विश्वनाथ तक—सभी नाट्यवस्तु के दो प्रकार मानते हैं—एक 'संसूच्य' तथा
१. देखिए--होरेस : आर्ट ऑफ पोयट्री।

( ४० )
दूसरा 'दृश्य'। पहली की केवल अर्थोपक्षेपक के द्वारा सूचना दी जाता है, परन्तु
दूसरी घटना रङ्गमञ्च के ऊपर अभिनीत होती १ है ।
इसके अतिरिक्त होरेस ने छन्दों के औचित्य की भी चर्चा की है । इस
प्रकार ग्रीक आलोचकों ने औचित्य ( Propriety ) की कमनीयता ललित
कलाओं में पर्याप्तरूप से स्वीकृत की है । सचमुच यूनानी आलोचनापद्धति
( Classical Criticism ) का सर्वस्व औचित्य रहा है ।
महाकवि पोप ने भी औचित्य के अनेक प्रकारों को अपने आलोचना-ग्रन्थ
में स्थान दिया है । पोप का ग्रंथ ( Essay of Criticism ) प्राचीन मान्य
सिद्धान्तों का पद्यबद्ध समुच्चय है । इनमें वर्णौचित्य के ऊपर उन्होंने बहुत
जोर दिया है । उनका कथन है कि कविता में केवल उद्वेगकारी कर्णकटुता
का अभाव ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता, अपितु वर्ण्य अर्थ की प्रतिध्वनि
अवश्य होनी चाहिए । मलयानिल के बहने के अवसर पर प्रयुक्त शब्दों में
सुकुमारता तथा कोमलता होनी चाहिए, मन्द लहरिका का प्रवाह कोमल पदों
में प्रवाहित होता है, परन्तु जब प्रचण्ड झंझावात से आन्दोलित भीषण तरङ्ग
तटों पर टकराता है; तब ओजस्वी पद्य भी तुमुल प्रवाह की तरह घोर गंभीर
गर्जन करता है । पोप का अभिप्राय है कि वर्णनीय वस्तु तथा तत्प्रतिपादक
शब्दों में मधुर सामञ्जस्य होना चाहिए । पोप का यह काव्यतत्त्व होगा-आनन्द-
वर्धन का वर्णध्वनि, कुन्तक का वर्णवक्रता तथा क्षेमेन्द्र का वर्णौचित्य । एक ही
तत्त्व भिन्न-भिन्न आलंकारिकों की कल्पना में भिन्न-भिन्न अभिधान से अभिव्यक्त
किया गया है ।
ऊपर के विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है कि औचित्य-तत्त्व की महत्ता जिस
तरह भारतीय आलोचकों ने स्वीकार की है उसी तरह पाश्चात्य आलोचकों
भी । अन्तर केवल यह है कि पाश्चात्य आलोचना-पद्धति में रस-सत्ता के प्रति-
पादन नहीं होने से औचित्य काव्य का एक बहिरङ्ग उपादान के रूप में अङ्गीकृत
१. द्वेधा विभागः कर्तव्यः सर्वस्यापीह वस्तुनः ।
सूच्यमेव भवेत् किञ्चिद् दृश्यश्रव्यमथापि वा ॥
नीरसोऽनुचितस्तत्र संसूच्यो वस्तुविस्तरः ।
दृश्यस्तु मधुरोदात्तरसभावनिरन्तरः ॥
( दशरूपक १।५६, ५७ )

हुआ है और भारतीय आलोचना-पद्धति में रस के साथ स्थिर सम्बद्ध होने के
कारण औचित्य अन्तरङ्गतम काव्यतत्त्व माना गया है ।
भारतीय आलोचना जगत् में भी इस तत्त्व का विकास क्रमशः हुआ है।
भरत ने केवल नाट्य में औचित्य सिद्धान्त को सूचित किया। आनन्दवर्धन ने
उसे नाट्य और काव्य (दृश्य और श्रव्य) उभय क्षेत्रों में परिवृंहित किया।
क्षेमेन्द्र ने इस तत्त्व को काव्य-मन्दिर में प्राण-प्रतिष्ठा की। औचित्य के विषय
में मौलिक कल्पना करने वाले ये ही तीन आचार्य हैं। अन्य अलंकार शास्त्रीय
निबन्ध-प्रणेता आचार्यों ने इस तत्त्व का उल्लेख तो प्रकट अथवा प्रच्छन्न रूप
से अवश्य किया, पर इसके सम्बन्ध में कोई कोई मौलिक बात किसी ने नहीं
कही। हाँ इतनी बात अवश्य कही जा सकती है कि औचित्य को व्यापक काव्य-
तत्त्व प्रायः सबों ने स्वीकार किया है। भारतीय आलोचना-जगत् का एक युग
ऐसा भी था जब औचित्य काव्यात्मा के रूप में, उद्घोषित हुआ था। स्वतन्त्र
औचित्य-संप्रदाय कायम हो चुका था, जिस पर प्रहार किया भरत तथा आनन्द-
वर्धन के प्रसिद्ध

( ४२ )
[चित्र :
रस
औचित्य | रीति
वक्रोक्ति
गुण अलंकार
ध्वनि | अनुमिति]
साहित्यशास्त्र के सिद्धान्तों का इतिहास औचित्य से आरम्भ कर 'अलंकार'
तक का विकास है। इस चित्र के बड़े वृत्त पर दृष्टिपात कीजिए। यह काव्य के
अन्तरङ्ग-अर्थात् प्राणभूत तत्त्व की समीक्षा करता है। इस पूरे वृत्त की परिधि
है—औचित्य, जिसे भारतीय आलंकारिकों ने व्यापकतम काव्यतत्त्व अङ्गीकृत
किया है। इस वृत्त के भीतर जो बड़ा त्रिकोण है उसका शीर्षस्थान है रस और
नीचे के कोण हैं ध्वनि और अनुमिति। रस का शीर्षस्थान सूचित करता है कि
भारत के किसी साहित्य-सम्प्रदाय में रसतत्त्व की अवहेलना नहीं है। ध्वनि और
अनुमिति मतभेद से उसके दो अभिव्यक्ति-प्रकार हैं। अनुमितिवादी भी रस का
अपलाप नहीं करते, अपितु उसके बोध के लिए व्यञ्जना की आवश्यकता नहीं
मानकर उसका स्थान अनुमिति को देते हैं। अनुमिति यहाँ ध्वनिविरोधी सभी
मतों का प्रतीक है।
भीतरी वृत्त में काव्य के बाह्य उपकरण तथा स्वरूप का विवेचन है। वृत्त
की परिधि 'वक्रोक्ति' है जो बृहत् वृत्त का स्पर्श कर रही है। वक्रोक्ति कवि
के कथन का एक विशिष्ट प्रकार है। इस वृत्त के भीतर एक त्रिकोण है जिसके
ऊपरी बिन्दु है--रीति, और निचले बिन्दु हैं गुण और अलंकार। रीति,
गुण और अलंकार ये तीनों तत्त्व काव्य के बहिरङ्ग साधन हैं और इनका वक्रोक्ति
का आश्रित होना नितान्त आवश्यक है। इस प्रकार इस ग्राफ में अलंकार-
शास्त्र के समस्त संप्रदायों का पारस्परिक संबन्ध व्यवस्थित रूप से दिखलाया
गया है¹।
१. भूमिका का यह अंश मुख्यतया आदरणीय पं० श्री बलदेव उपाध्यायजी

( ४३ )
औचित्यविचारचर्चा
'औचित्य विचारचर्चा' एक महत्त्वपूर्ण अलंकार-ग्रन्थ है । इसके रचयिता
आचार्य क्षेमेन्द्र हैं । क्षेमेन्द्र ने यद्यपि अनेक ग्रन्थों की रचना की है, परन्तु उनका
सबसे मुख्य ग्रन्थ यही है, उनकी अमर कीर्ति में 'चार चाँद' लगाने का श्रेय इसी
ग्रन्थ को है । इस ग्रन्थ में औचित्य का विशद विश्लेषण अति प्रांजल भाषा में
किया गया है । सर्वप्रथम मङ्गलवोधक पद्य के द्वारा औचित्य को भागवत गुण
सिद्ध किया गया है जिसका विवरण भूमिका के प्रारम्भ में ही आ चुका है ।
इसके बाद ग्रन्थकार ने ग्रन्थनिर्माणपरक प्रतिज्ञा-वाक्य लिखा है । तदनन्तर
औचित्य तत्त्व की महिमा का गान है । इसी प्रसंग पर भरत के--
अदेशजो निवेशस्तु न शोभां जनयिष्यति ।
मेखलोरसिबन्धे च हास्यायैवोपजायते ॥
इस कथन के आधार पर निम्नलिखित सूक्ति की सृष्टि की गई है ।
कण्ठे मेखलया नितम्बफलके तारेण हारेण वा,
पाणौ नूपुर-बन्धनेन चरणे केयूर-पाशेन वा ।
शौर्येण प्रणते रिपौ करुणया नायान्ति के हास्यताम्,
औचित्येन विना रुचिं प्रतनुते नालंकृतिर्नो गुणाः ॥
कण्ठ में मेखला ( डड़कस ) बाँधने से या नितम्ब पर लम्बे हार पहनने से
अथवा हाथ में नूपुर बाँधने से या पैर में केयूर रखने से कौन व्यक्ति लोक में
हँसी का पात्र नहीं बनता ? नतानन पर शूरता और शत्रु पर करुणा दिखलाने
वाला व्यक्ति क्या अपने को उपहासास्पद नहीं कर लेता है ? तथ्य बात यह है
कि औचित्य के बिना न तो अलंकार ही रुचिकर प्रतीत होते हैं और न गुण !
भूषणतत्त्व का प्रधान आश्रय औचित्य ही है ।
इसके बाद औचित्य का लक्षण किया गया है—
उचितं प्राहूराचार्याः सदृशं किल यस्य यत् ।
उचितस्य च यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते ॥

कृत 'भारतीय साहित्यशास्त्र' के आधार पर संकलित किया गया है, अतः
लेखक उनका आभारी है ।

( ४४ )
जो वस्तु जिसके अनुरूप होती है उसे हम 'उचित' कहते हैं और उचित
का भाव ही 'औचित्य' कहलाता है। यद्यपि यह लक्षण उतना अनुगत नहीं
है तथापि पाठकों के मानसपटल पर औचित्य की एक व्यावहारिक रूपरेखा इससे
अवश्य खिंच जाती है।
इसके अनन्तर औचित्य के प्रभेद किये गए हैं, जिनकी संख्या क्रमशः पद,
वाक्य, प्रबन्धार्थ, गुण, अलंकार, रस, क्रिया, कारक, लिङ्ग, वचन, विशेषण,
उपसर्ग, निपात, काल, देश, कुल, व्रत, तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह,
प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम, और आशीर्वाद के रूप में सत्ताईस ( २७ )
गिनाई गई है।
ये प्रभेद उपलक्षणमात्र हैं। वस्तुतः औचित्य के अनन्त भेद हो सकते हैं।
काव्य के प्रत्येक अङ्ग तथा उपांग पर इस तथ्य का व्यापक प्रभाव है। इस बात
को ग्रन्थकार ने स्वयं ग्रंथ-समाप्ति के अवसर पर स्पष्ट लिखा है। "अन्येषु
काव्याङ्गेषु अनयैव दिशा स्वयमौचित्यमुत्प्रेक्षणीयम् । तदुदाहरणानि आनन्त्यान्न
प्रदर्शितानि अलमतिप्रसङ्गेन।" यही औचित्यविचार-चर्चा की अन्तिम पङ्क्ति है।
इन गिनाए गए २७ प्रभेदों को हम पाँच वर्गों में विभक्त कर सकते हैं।
पद, वाक्य और प्रबन्ध ये तीन प्रथम वर्ग में रक्खे जा सकते हैं, जो मीमांसा-
दर्शन से संबद्ध विषय हैं। दूसरे वर्ग में गुण, अलंकार और रस का स्थान आता
है, जो काव्यशास्त्र अथवा अलङ्कारशास्त्र की वस्तुएँ हैं। तीसरे वर्ग में क्रिया,
कारक, लिंग वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात तथा काल का समावेश हो सकता
है, जो सबके सब व्याकरणशास्त्र के पदार्थ हैं। चतुर्थ वर्ग में देश, कुल एवम्
व्रत आ सकते हैं, जिनका संबन्ध लोकतन्त्र से है।
पञ्चमवर्ग में आते हैं—तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह, प्रतिभा
अवस्था, विचार, नाम और आशीर्वाद, इनका संबन्ध वक्ता—कवि से है
इनमें आदिम चार वर्ग प्रसिद्ध काव्याङ्ग हैं, इन पर प्राचीन काव्याचार्यों
द्वारा अनेक प्रकार के विचार किए जा चुके थे, पर क्षेमेन्द्र ने इन पर भी ए
नवीन दृष्टिकोण से, किन्तु पूर्वाभास के रूप में ही विचार किया है।
पंचमवर्ग आचार्य क्षेमेन्द्र की मौलिक देन है। भारतीय आलोचना-पद्ध

( ४५ )

में आचार्य ने एक नया दृष्टिकोण उपस्थित किया है। कारण, 'कला में सौन्दर्य
है अथवा नहीं' ? यह उतना आलोचना का विषय नहीं है, जितना 'कला में
सौन्दर्य आता कहाँ से है' यह—अर्थात् गुण, रीति, अलंकार अथवा रस का
ही समावेश काव्य में हुआ है, किंवा नहीं यही नहीं देखना है आलोचकों को,
अपितु मुख्यतः यह देखना है कि इन वस्तुओं का समावेश किस ढंग से हुआ है,
इन वस्तुओं के समावेशार्थ जो ढंग अपनाया गया है वह उचित है अथवा नहीं।
फलतः प्रतिपाद्य वस्तु की ओर से हटा कर अपना ध्यान आलोचकों को
प्रतिपादन करने वाले कवि की ओर ले जाना चाहिए। सारांश यह कि कला-
गत सौन्दर्य का रहस्य कवि-हृदय में छिपा रहता है, वस्तु में नहीं। पर भारतीय
आलोचकों का दृष्टिकोण वस्तुपरक ही अधिक रहा। आचार्य क्षेमेन्द्र ने उक्त
पंचम वर्ग का समावेश अपनी 'चर्चा' में करके जो अन्तर्वीक्षा प्रस्तुत की है,
वह निस्सन्देह नूतन और श्लाघ्य है। अस्तु।

ग्रन्थ का स्वरूप
पूर्वकथित प्रभेदों के क्रमशः पहले कारिका के द्वारा स्वरूप और लौकिक
दृष्टान्तमूलक साहित्यिक स्तर निर्णीत किये गए हैं । फिर उदाहरण तथा प्रत्यु-
दाहरण द्वारा उन प्रभेदों का स्पष्टीकरण किया गया है । उदाहरण तथा प्रत्यु-
दाहरण के पद्य कुछ तो अपने अन्य ग्रन्थों से और कुछ विभिन्न कवियों के
काव्यों से उद्धृत किये गए हैं ।
बीच बीच में गद्य के द्वारा कारिकाओं तथा उदाहरण-प्रत्युदाहरण पद्यों
की व्याख्या की गई है । सामान्यतः ग्रन्थ का यही स्वरूप है ।
आलोचना में सर्वत्र ईमानदारी बरती गई है । औचित्य के उदाहरणरूप में
ही नहीं, प्रत्युदाहरणरूप में भी अपने पद्यों को ग्रन्थकार ने उद्धृत किया है ।
तत्तत् औचित्य का स्तर निश्चित करते समय कारिकाओं के द्वारा अनूठे लौकिक
दृष्टान्तों का प्रयोग किया गया है । जैसे—
तिलकं बिभ्रती सूक्तिर्भात्येकमुचितं पदम् ।
चन्द्राननेव कस्तूरीकृतं श्यामेव चान्दनम् ॥
तिलक के समान औचित्यपूर्ण एक पद वाली सूक्ति ( काव्यवाक्य ) शोभित
होती है । कैसे ? जैसे गौरवर्णा कामिनी कस्तूरीकृत काली बिन्दी से और
श्यामाङ्गी चन्दनरचित धवल विशेषक ( बिन्दी ) से । कैसा मनोहर दृष्टान्त है !
गौराङ्गी के भाल पर काली बिन्दी का और श्यामांगी के ललाट पर धवल
बिन्दी का औचित्य और तज्जन्य शोभातिशय का अनुभव सभी सहृदयों को
अवश्य होगा ।
सम्पूर्ण ग्रन्थ में इसी तरह के रुचिर दृष्टान्तों का सन्निवेश किया गया है ।
आलोचना की मार्मिकता देखते ही बनती है । बानगी के तौर पर एक दो स्थलों
का प्रदर्शन ही पर्याप्त होगा—
मग्नानि द्विषतां कुलानि समरे त्वत्खड्गधाराकुले,
नाथास्मिन्निति बन्दिवाचि बहुशो देव ! श्रुतायां पुरा ।
मुग्धा गुर्ज्जरभूमिपालमहिषी प्रत्याशया पाथसः,
कान्तारे चकिता विमुञ्चति मुहुः पत्युः कृपाणे दृशौ ॥