सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

( २७ )
काव्य-तत्त्व के रूप में प्रायः बहुत पहले ही आविर्भूत हो चुका था। अलंकार के
परिशीलन से वक्रोक्ति की उत्पत्ति हुई और रसध्वनि के अध्ययन से औचित्य
का उदय हुआ। ध्वन्यालोक में औचित्य-तत्त्व के साङ्गोपाङ्ग निरूपण से अनेक
आलोचकों की दृष्टि रस से हट कर औचित्य पर जा जमी। वे लोग काव्य में
रस के महत्त्व को न मानकर औचित्य को ही काव्य की आत्मा कहने लगे।
अभिनवगुप्त का ज्ञान किये बिना औचित्य पद का प्रयोग अत्यन्त असंगत है।
औचित्य का तात्पर्य तभी बोधगम्य हो सकता है, जब जिसके प्रति इसे
उचित बतलाया जाय वह वस्तु भी वर्तमान हो। औचित्य तो एक संबन्ध-विशेष
ठहरा और उस वस्तु का ज्ञान हमें प्रथमतः अपेक्षित है जिसके साथ यह संबन्ध
स्थापित किया जा सके। यह आवश्यक वस्तु रस आदि ही है। रस आदि के
बिना औचित्य की सत्ता का प्रतिपादन कोई मूल्य नहीं रखता। रस तथा ध्वनि
के साथ औचित्य का प्रगाढ संबन्ध है। इसका निर्देश अभिनवगुप्त ने स्पष्ट
शब्दों में किया है।१
इस प्रकार रस और ध्वनि के साथ औचित्य के संबन्ध को स्थिर करने के
कारण अभिवगुप्त सदा साहित्य-जगत् में अमर रहेंगे इसमें संदेह नहीं।
भोजराज
‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ तथा ‘शृङ्गारप्रकाश’ ये दो भोजकृत अलंकारशास्त्रीय
विशाल निबन्ध परमप्रसिद्ध हैं। यद्यपि इन दोनों निबन्धों में कहीं भी स्वतन्त्र
काव्यतत्त्व के रूप में औचित्य का उल्लेख भोजराज ने नहीं किया है, तथापि
गौणरूप से औचित्य-सिद्धान्त उनके ग्रन्थों में वर्तमान है यह कथा निस्सन्दिग्ध
रूप में कही जा सकती है। कारण, उनके ग्रन्थों में दोष, गुण तथा अलंकार
के निरूपणप्रसङ्ग में ऐसे अनेक भेद बतलाये गए हैं जिनका मूल आधार यह
‘औचित्य’ ही है।
१—‘अपद’ नामक एक स्वतन्त्र दोष भोज ने माना है।२ इनके मत में पद
छह प्रकार के होते हैं—प्रकृतिस्थ, कोमल, कठोर, ग्राम्य, नागर तथा उपनागर।
१. औचित्यवती ( अतिशयोक्तिः ) जीवितमितिचेद् औचित्यनिबन्धनं
रसभावादि मुक्त्वा नान्यत् किञ्चिदस्ति इति । तदेवान्तर्भासि मुख्यं जीवितम्
इत्यभ्युपगन्तव्यम्, न तु सा । ( लोचन )
२. विभिन्नप्रकृतिस्थादिपदयुक्त्यपदं विदुः । ( स. कण्ठा. ५।२४ )