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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 256 में से

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पृष्ठ 34

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अलंकार ग्रंथों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इसके अनुसार वक्रोक्ति हो—
लोक तथा शास्त्र में प्रसिद्ध शैली से भिन्न शैली द्वारा शब्दार्थों का वैचित्र्यपूर्ण
कथन—काव्य में सबसे सारभूत पदार्थ है। इस वक्रोक्ति को काव्य का जीवित
मानने के कारण ही इनका ग्रन्थ 'वक्रोक्तिजीवित' नाम से प्रसिद्ध है।
कुन्तक के मत से काव्य का प्राण तो निश्चय ही वक्रता है, किन्तु वक्रता का
मूल आधार औचित्य ही है, क्योंकि उन्होंने स्वयं कहा है कि "पादवक्रता का
रहस्य है पद का औचित्य। कारण, उचित (यथानुरूप) कथन ही (वक्रता
का) जीवन है। वक्तव्य अर्थ के एक अंश में भी औचित्य के अभाव से काव्य-
मर्मज्ञों को आह्लादित करना संभव नहीं है।"१ कुन्तक ने अपने काव्य-लक्षण में
भी औचित्य को आधारभूत तत्त्व माना है।
शब्दार्थौ सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनि ।
बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्लादकारिणि ॥
यही उनका काव्य-लक्षण है। यहाँ काव्य के आधार रूप में शब्दार्थ का
'साहित्य' स्वीकृत किया गया है और 'साहित्य' से कुन्तक का अभिप्राय
निश्चित रूप से शब्द और अर्थ का पूर्ण सामञ्जस्य ही है, क्योंकि "समर्थ" शब्द
के अभाव में अर्थ स्वरूपतः स्फुरित होने पर भी निर्जीव-सा ही रहता है। इसी
प्रकार शब्द भी वाक्योपयोगी अर्थ के अभाव में अन्य अर्थ का वाचक होकर
वाक्य का भार-सा प्रतीत होता है"२ ऐसा उन्होंने स्वयं कहा है। इस कथन
से स्पष्ट है कि 'साहित्य' का अर्थ है शब्द और अर्थ का उचित सहभाव
अथवा संबन्ध।
कुन्तक के अनुसार मार्ग (रीति) तीन प्रकार के होते हैं—सुकुमार,
विचित्र तथा मध्यम। इन तीनों मार्गों में समान रूप से रहने३ वाले दो


१. तत्र पदस्य तावदौचित्यं वक्रतायाः परं रहस्यम्, उचिताभिधानजीवि-
त्वात्। वाच्यस्याप्येकदेशेऽप्यौचित्यविरहात् तद्विदाह्लादकारित्वहानिः।
(१ उन्मेष ५७वीं कारिका की वृत्ति)
२. तथा चार्थः समर्थवाचकाऽसद्भावे स्वात्मना स्फुरन्नपि मृतकल्प एवाव-
तिष्ठते। शब्दोऽपि वाक्योपयोगिवाच्यासंभवे वाच्यान्तरवाचकः सन् वाक्यस्य
व्याधिभूतः प्रतिभाति। (१।१७ वीं कारिका की वृत्ति)
३. एतत् त्रिष्वपि मार्गेषु गुणद्वितयमुज्ज्वलम् !
पदवाक्यप्रबन्धानां व्यापकत्वेन वर्तते ॥ (१।५७)