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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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काव्य अथवा नाटक में वक्ता के अनुरूप ही पद होना चाहिए। ग्रामीण वक्ता
के द्वारा प्रयोग करने योग्य पदों का प्रयोग नागर वक्ता के द्वारा किया जाना
अत्यन्त अरुचिकर है। ऐसा दोष 'अपद' कहलाता है।
२--वाक्यार्थ-दोषों में जिस 'विरस' नामक दोष की चर्चा भोज ने की है
वह रसानौचित्य का एक प्रकार है। स्वयं भी वे उस दोष को अप्रस्तुत रस की
संज्ञा देते हैं। रत्नेश्वर ने ( भोज के टीकाकार ) इस स्थल पर आनन्दवर्धन के
प्रसिद्ध पद्य "अनौचित्यादृते नान्यत्" को अपनी टीका में उद्धृत किया है।
३--देश-विरोध, काल-विरोध, लोक-विरोध, अनुमान-विरोध आदि अनेक
भेदों वाला उनका 'विरुद्ध' नामक दोष अनौचित्य के ऊपर ही अवलंबित है।
अनुमान-विरोध के अन्तर्गत औचित्यविरुद्ध नामक एक नवीन दोष की उन्होंने
कल्पना की है। १
४--भोज के ग्रन्थ में वर्णित 'भाविक' नामक शब्दगुण का भी आधार यह
औचित्य ही ज्ञात होता है। कारण “हे पूर्णचन्द्रस्वरूप, वत्स, रघुनन्दन, आ-
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