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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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( असत्कल्प ) हो जाती है¹ ।" कहने की आवश्यकता नहीं कि यह स्वभावकथन
क्षेमेन्द्र के 'सदृशं किल यस्य यत्' अर्थात् यथानुरूप वर्णन से मूलतः अभिन्न है ।
ऐसे ही अर्थालंकार के प्रयोग में भो औचित्य ही प्रमाण है । कुन्तक के मत से
अलंकारों का वर्ण्य-विषय के अनुरूप उचित प्रयोग ही वांछनीय है, क्योंकि उनके
विचार से “वाच्य अलंकार उपमा आदि का अधिक उपयोग उचित नहीं हो
सकता । कारण यह है कि उससे स्वाभाविक सौन्दर्य के अतिशय में मलिनता
आने का भय रहता है² ।"
यह अनधिक प्रयोग वास्तव में अलंकारौचित्य का ही दूसरा नाम है । इसके
अतिरिक्त दोपक आदि कतिपय अलंकारों के प्रसङ्ग में कुन्तक ने औचित्य का
स्पष्ट उल्लेख भी किया है—"औचित्य के अनुरूप सुन्दर और सहृदयों के
आह्लादकारक ( प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत ) पदार्थों के अप्रकट अर्थात् प्रतीयमान
धर्म को प्रकाशित करने वाला अलंकार दीपक है³ ।" अन्त में प्रकरण तथा
प्रबन्धवक्रता के प्रसङ्ग में भी कुन्तक ने अनेक प्रकार से औचित्य की स्तुति
की है । उदाहरण के लिए प्रबन्धवक्रता का एक प्रमुख भेद है उत्पाद्यलावण्य,
जिसके दो रूप हैं :-- ( १ ) अविद्यमान की कल्पना ( २ ) विद्यमान का
संशोधन । इन दोनों वक्रताभेदों का आधार स्पष्ट रूप से औचित्य-कल्पना ही
है । कवि अपनी प्रसिद्ध कथा के अनौचित्य के परिहार और औचित्य के संरक्षण
के निमित्त ही उपर्युक्त चमत्कारपूर्ण पद्धतियों का प्रयोग करता है । कुन्तक ने
स्पष्ट शब्दों में इस तथ्य को स्वीकार किया है । "उत्पाद्यलावण्य के दो रूप
हैं—( १ ) अविद्यमान की कल्पना और ( २ ) सहृदय के आह्लाद के निमित्त
औचित्यरहित विद्यमान का अन्यथा प्रतिपादन ४ ।" उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है
कि वक्रोक्ति तथा औचित्य में घनिष्ठ संबन्ध है ।
१. स्वभावव्यतिरेकेण वक्तुमेव न युज्यते ।
वस्तु तद्रहितं यस्मान्निरुपाख्यं प्रसज्यते ॥ ( १।१२ )
२. तदिदमुक्तं भवति यदेवंविधे भावस्वभावसौकुमार्यवर्णनप्रस्तावे भूयसा
न वाच्यालंकाराणामुपमादीनामुपयोगयोग्यता संभवति, स्वभावसौकुमार्यातिशय-
म्लानताप्रसङ्गात् । ३।१ कारिका की वृत्ति ।
३. औचित्यावहमम्लानं तद्विदाह्लादकारणम् ।
अशक्तं धर्ममर्थानां दीपयद् वस्तु दीपकम् ॥ ( ३।१७ )
४. उत्पाद्यलावण्यमिति द्विधा व्याख्येयम् । क्वचिदसदेवोत्पाद्यम् अथवा

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