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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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दोष है, पर मत्त तथा बालक आदि की उक्ति में यह दोष नहीं माना जा
सकता १. क्योंकि यहाँ औचित्य की हानि नहीं होती ।
६--औचित्यतत्त्व पर आश्रित अनेक अलंकारों का भी वर्णन भोजराज ने
अलंकार प्रकरण में किया है। शब्दालंकार के मध्य में 'जाति' नामक
एक अलंकार का निर्देश उन्होंने किया है। शब्दालंकाररूप यह 'जाति' संस्कृत,
प्राकृत, अपभ्रंश आदि विभिन्न भाषाओं का विशिष्ट प्रकार है, जिसका उचित
अवसरों पर उचित प्रयोग कविकौशल का मुख्य प्रमाण है। अवसरविशेष पर
तथा वस्तुविशेष के लिये तदनुरूप भाषा का प्रयोग करना चाहिए। विषय,
वक्ता, देश और काल के औचित्य पर दृष्टि रख कर ही भाषा का प्रयोग कवि के
लिये सर्वथा समीचीन होता है। अवसरविशेष पर ही विभिन्न भाषाओं का
चमत्कार सहृदयों के हृदय में आनन्द का उन्मेष करता है। यज्ञ के समान
पवित्र अवसरों पर संस्कृत भाषा का ही प्रयोग उचित है। स्त्रियों के मुख से
प्राकृत भाषा का ही प्रयोग न्याय्य है। कुलीन जनों के लिये संकीर्ण भाषा का
प्रयोग गौरवाधायक नहीं होता। मूर्ख जनों को समझाने के लिये संस्कृत में
भाषण उपहासास्पद होता है। २ भाषा के प्रयोग में प्रतिपाद्य विषय के औचित्य
पर भी ध्यान देना चाहिए। अतएव भोज ने कहा है कि कोई अर्थ संस्कृत के ही
द्वारा प्रतिपाद्य हो सकता है तो कोई प्राकृत के द्वारा और कोई अपभ्रंश के द्वारा। ३
कितना गिनाया जाय ? और भी बहुत ऐसी मान्यतायें भोजराज की हैं
जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि भोजराज की दृष्टि में भी औचित्य एक
आवश्यक काव्योपादान है।
कुन्तक
कुन्तक का "वक्रोक्तिजीवित" मौलिकता तथा प्रौढ़ता के कारण संस्कृत के
१. विरोधः सकलेष्वेव कदाचित् कविकौशलात् ।
उत्क्रम्य दोषगणनां गुणवीथीं विगाहते ॥ ( १।१५६ )
समुदायार्थशून्यं यत्तदपार्थं प्रचक्षते ।
तन्मत्तोन्मत्तबालानामुक्तेरन्यत्र दुष्यति ॥ ( १।११६ )
२. न म्लेच्छितव्यं यज्ञादौ, स्त्रीषु नाप्राकृतं वदेत् ।
संकीर्णं नाभिजातेषु, नाप्रबुद्धेषु संस्कृतम् ॥ ( २।८ )
३. संस्कृतेनैव कोऽप्यर्थः, प्राकृतेनैव वा परः ।
शक्यो रचयितुं कश्चिदपभ्रंशेन जायते ॥ ( २।१० )