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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 256 में से

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( ३१ )
सामान्य गुणों का उल्लेख कुन्तक ने किया है। इन दोनों गुणों के नाम क्रमशः
औचित्य और सौभाग्य रखे गए हैं। औचित्यगुण की परिभाषा करते हुए
उन्होंने कहा है कि—"जिस स्पष्ट वर्णन-प्रकार के द्वारा स्वभाव के महत्त्व का
पोषण होता है वही औचित्य नामक गुण है, इसका मूल है उचित आख्यान अर्थात्
यथानुरूप कथन¹ ।"
इस विवेचन से सिद्ध होता है कि कुन्तक औचित्य को सबसे व्यापक काव्य-
तत्त्व मानते हैं। इतना ही नहीं, वक्रोक्ति के अवान्तर भेदों में भी वे औचित्य
को आधार स्वीकार करते हैं।
वर्णविन्यास-वक्रता के विवेचन में कुन्तक ने स्पष्ट लिखा है कि वक्रतापूर्ण
वर्णयोजना अनिवार्यरूप से प्रस्तुतौचित्यशोभिनी होती है--अर्थात् काव्य में
वर्णों का विन्यास प्रस्तुत प्रसङ्ग के अनुरूप ही होना चाहिए, उससे स्वतन्त्र
नहीं² । इसी प्रकार पद-पूर्वार्ध-वक्रता तथा प्रत्ययवक्रता के अनेक प्रमुख भेद
भी औचित्यमूलक ही हैं :—( १ ) पर्यायवक्रता का आधार है उचित पर्याय का
चयन अथवा पर्यायौचित्य, ( २ ) विशेषणवक्रता का आधार है उचित विशेषण
का निर्वाचन, ( ३ ) वृत्तिवक्रता में समासरचना का औचित्य अपेक्षित होता है
और ( ४ ) लिङ्गवक्रता का आधारभूत सौन्दर्य लिङ्गप्रयोग के औचित्य पर
ही आश्रित है। इसी प्रकार प्रत्ययवक्रता के भी प्रमुख भेदों में कारक, पुरुष,
संख्या, काल, उपग्रह आदि के औचित्य का ही चमत्कार वर्तमान रहता है।
वक्रता का चतुर्थ भेद है वाक्यवक्रता जिसके दो रूप हैं :--( १ ) वस्तुवक्रता,
अर्थालंकार। इन दोनों में भी कुन्तक ने औचित्य को ही प्रमाण माना है।
वस्तुवक्रता के प्रसङ्ग में एक स्थान पर कुन्तक ने औचित्य को वस्तुवर्णन का
आधारभूत अनिवार्य सिद्धान्त घोषित किया है। स्वभावोक्ति का निराकरण
करते हुए उन्होंने लिखा है--:"स्वभाव के ( स्वरूप के ) कथन के बिना वस्तु
का वर्णक ही संभव नहीं हो सकता क्योंकि स्वभाव से रहित वस्तु निरूपाख्य
१. आञ्जसेन स्वभावस्य महत्त्वं येन पोष्यते ।
प्रकारेण तदौचित्यमुचिताख्यानजीवितम् ।। ( १।५३ )
२. वर्गान्तयोगिनः स्पर्शाद्विरुक्तास्तलनादयः ।
शिष्टाश्चरादिसंयुक्ताः प्रस्तुतौचित्यशोभिनः ।। ( २।२ )