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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

( २१ )
समीचीन है। ग्राम्य-दोष का स्वरूप ही रुद्रट के मत से देश, कुल, जाति, विद्या
आदि के विषय में व्यवहार, आकार, वेष और वचन का अनौचित्य है।१
रुद्रट के मत की उक्त समीक्षा से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि काव्य
में सब से अधिक व्यापक तत्त्व औचित्य ही है। इसके अपकर्षक होने पर ही
दोषों का दोषत्व सम्पन्न होता है और अवस्था-विशेष में रस की अनुकूलता होने
पर वे ही हेय दोष उपादेय गुण के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। अनुकरण
दोषों के दोषत्व को दूर करने वाला पदार्थ है और वह औचित्य के ऊपर ही
निर्भर है।
आनन्दवर्धन
रुद्रट के बाद औचित्य-सिद्धान्त के विकास में प्रमुख स्थान है आचार्य
आनन्दवर्धन का। आनन्दवर्धन ने अपने ध्वन्यालोक में औचित्यतत्त्व का व्यापक
समीक्षण किया है। ध्वन्यालोक में कहीं औचित्य शब्द के प्रयोग द्वारा व्यापक
रूप में और कही संकेत रूप में इस तत्त्व की विशद अभिव्यक्ति हुई है। आनन्द-
वर्धन से प्राचीन आलंकारिकों ने अलंकार-शास्त्र के कतिपय प्रकीर्ण अङ्गों के
विषय में ही औचित्यतत्त्व का विवेचन किया था पर आनन्दवर्धन ने अलंकार-
शास्त्रीय सभी अङ्गों के साथ घनिष्ठ संबन्ध दिखला कर औचित्य को काव्य के
व्यापक अथ च महनीय तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।
क्षेमेन्द्र ने आनन्दवर्धन के ही विचारों से स्फूर्ति ग्रहण कर अपने विख्यात
ग्रन्थ औचित्यविचारचर्चा में इस तत्त्व का पल्लवन किया है। औचित्यविचार-
चर्चा के मूल स्रोत को जानने के लिए ध्वन्यालोक का अध्ययन नितान्त
अपेक्षित है।
आनन्दवर्धन रस को ही काव्य का सारभूत पदार्थ मानते हैं। उनकी
सम्मति में यह रस कथमपि वाच्य नहीं हो सकता। ध्वनि के द्वारा ही इसकी
अभिव्यक्ति हो सकती है। इस रस में सबसे आवश्यक वस्तु है औचित्य। वस्तु
अलंकार आदि रस के बाह्य परिधान मात्र हैं।
आनन्दवर्धन ने अपने युगान्तरकारी ग्रन्थ ध्वन्यालोक में अलंकारौचित्य,
गुणौचित्य, संघटनौचित्य, प्रबन्धौचित्य और रसौचित्य का विशद निरूपण
किया है।
१. ग्राम्यत्वमनौचित्यं, व्यवहाराकारवेषवचनानाम् ।
देश-कुल-जाति-विद्या-वित्त-वयःस्थान-पात्रेषु ॥ (का. अ. ११।९)

( २२ )
अलंकार्य के बिना अलंकार का स्वतः कोई मूल्य नहीं होता—और काव्य में
रस आदि अलंकार्य वस्तु है । अतः रस आदि को पुष्ट करने के लिए अलं-
कारों का प्रयोग किया जाता है तो अलंकार का अलंकारत्व सिद्ध होता है ।¹
इन अलंकारों के औचित्य-सम्पादन के लिए आनन्दवर्धन ने सुन्दर नियमों
का उल्लेख किया है ।² शब्दालंकारों की रसानुरूपता प्रदर्शित करते समय
उन्होंने विप्रलम्भ आदि कोमल रसों के लिए यमकालंकार को सर्वथा त्याज्य
माना है । इस सिद्धान्त का मौलिक रहस्य यह है कि कवि के द्वारा काव्य में
निबद्ध वस्तु को रस का उद्बोधक अवश्य होना चाहिए ।
काव्य में किसी भी वस्तु की उपादेयता तथा अनुपादेयता, संबद्धता और
असंबद्धता, सुरूपता और कुरूपता, रस के पोषण तथा शोषण पर ही निर्भर है ।
रस-पोषक वस्तु ग्राह्य है, परन्तु रस शोषक सर्वथा वर्ज्य है । अलंकारौचित्य के
संबन्ध में उनका कथन अत्यन्त स्पष्ट और हृदयग्राही है । वे कहते हैं कि अलं
कारों को इतना स्वाभाविक होना चाहिए कि रसाकृष्ट कवि के किसी विशिष्ट
आयास के बिना ही वे स्वतः आविर्भूत हों । वे बाह्य न होकर आभ्यन्तर हों,
उनकी रचना के लिए न तो कवि को किसी प्रकार का यत्न करना पड़े और न
उनका इतना चाकचिक्य हो कि पाठक प्रकृत रस के सौन्दर्य से हट कर उन्हीं के
प्रभाव से आकृष्ट हो जाय ।³
आनन्दवर्धन गुणों का साक्षात् संबन्ध रस-भावादि से मानते हैं । गुण
धर्म है और रस आदि धर्मी ! श्रृङ्गार, विप्रलम्भ और करुणरस के साथ माधुर्य
गुण का प्रधान संबन्ध है । रौद्र, वीर और भयानक रस के साथ ओजगुण का
घनिष्ठ संपर्क है । ऐसी दशा में शब्द-योजना ऐसी होनी चाहिए कि प्रकृत गुण
और रस के साथ उसका सर्वथा सामञ्जस्य हो जाय । वर्णों का अपना एक
विशिष्ट प्रभाव होता है । कुछ वर्ण स्वभावतः कोमलता के द्योतक होते हैं तो
अन्य वर्ण स्वतः कठोरता को प्रकट करते हैं । वर्णों की इस प्रकृति को ध्यान में
रख कर काव्य में उनका प्रयोग सर्वथा श्लाघनीय होता है ।
१. रसभावादितात्पर्यमाश्रित्य विनिवेशनम् ।
अलंकृतीनां सर्वासामलंकारत्वसाधनम् ॥ ( ध्वन्यालोक ३।६ )
२. ध्वन्यालोक २।१५-२० ।
३. रसाक्षिप्ततया यस्य बन्धः शक्यक्रियो भवेत् ।
अपृथग् यत्ननिर्वर्त्यः सोऽलंकारो ध्वनौ मतः ॥ ( ध्वन्यालोक २।१७ )

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शृङ्गार रस में रेफ के साथ संयुक्त सकार और शकार तथा ढकार का
अत्यधिक प्रयोग प्रकृत रस के विरोधी होने के कारण नहीं करना चाहिए क्योंकि
ये वर्ण रस की हानि करने वाले होते हैं । परन्तु ये ही वर्ण बीभत्स आदि रस में
आवश्यक दीप्ति के प्रकट करने के कारण यदि रखे जाँय तो वे रस के उत्पादक
होते हैं ।
प्रथम स्थिति में यदि वर्ण 'रसच्युतः' ( रस को च्युत करने वाले ) होते
हैं—तो द्वितीय स्थिति में ये ही वर्ण 'रसश्च्युतः' ( रस के टपकाने वाले )
होते हैं । १
पदों की विशिष्ट योजना का नाम संघटना है । संघटना प्रायः तीन प्रकार
की होती है । १—असमासा, २—मध्यम-समासा और ३—दीर्घ-समासा । २
गुणों का संघटना के साथ घनिष्ठ संबन्ध है । आनन्दवर्धन ने संघटना को गुणों
के आधार पर रहने वाली तथा रसों को अभिव्यक्त करने वाली कहा है । ३
संघटना के प्रसङ्ग में चार वस्तुओं के औचित्य का विचार करना आनन्द-
वर्धन ने आवश्यक बतलाया है । मुख्य तो रस का औचित्य ही है परन्तु उसके
साथ वक्ता वाक्य और विषय इन तीन गौण पदार्थों के औचित्य पर भी दृष्टि
रखनी चाहिए ।
वक्ता का अभिप्राय है काव्य अथवा नाटक के पात्र । वाच्य का अर्थ है
प्रतिपाद्य वस्तु तथा विषय का तात्पर्य है नाटक, महाकाव्य, गद्य, पद्य और
चम्पू आदि काव्य-प्रकार । संघटना के चुनाव में इन चारों विषयों के औचित्य
का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए ।
१. शषौ सरेफसंयोगौ ढकारश्चापि भूयसा ।
विरोधिनः स्युः शृङ्गारे तेन वर्णा रसच्युतः ॥
त एव तु निवेश्यन्ते बीभत्सादी रसे यदा ।
तदा तं दीपयन्त्येव तेन वर्णा रसश्च्युतः ॥ ( ध्वन्यालोक ३।३४ )
२. असमासा समासेन मध्यमेन च भूषिता ।
तथा दीर्घसमासेति त्रिधा संघटनोदिता ॥ ( ध्वन्यालोक ३।५ )
३. गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा ।
रसास्तन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः ॥
( ध्वन्यालोक ३।६ )

( २४ )
ध्वनिकार का यह कथन सर्वथा सत्य है कि संघटना के इस चतुरस्र औचित्य
का विचार सर्वप्रथम उन्होंने ही किया ।¹
गद्य, पद्य, नाटक तथा महाकाव्य इन काव्य-प्रकारों की अपनी अपनी
विशिष्टता होती है, जिस पर ध्यान देने से संघटना का निवेश श्लाघनीय होता
है । नाटक का मुख्य उद्देश्य दर्शकों के हृदय में रस की अभिव्यक्ति ही है । अतः
उसमें दीर्घ-समास वाली संघटना तथा शब्दाडम्बर वाले अलंकारों के प्रति कवि
को कथमपि आसक्ति नहीं रखनी चाहिए । कारण, इन बाह्य अङ्गों की बहुलता
रस की शीघ्र प्रतीति में बाधा डालती है ।²
आनन्दवर्धन ने प्रबन्धध्वनि के विवेचन के अवसर पर काव्य तथा नाटक के
इतिवृत्त के स्वरूप के सम्बन्ध में विस्तृत समीक्षा की है । इतिहास साधारणतः
दो प्रकार का होता है—एक वृत्त ( पुराण तथा इतिहास आदि में प्रसिद्ध )
और द्वितीय उत्प्रेक्ष्य (कविकल्पना-प्रसूत) । दोनों प्रकार के इतिवृत्तों में औचित्य
का रहना अत्यन्त आवश्यक है ।³
कथानक के संविधानक में वर्णनीय वस्तु को प्रस्तुत रस के अनुकूल बनाने
के लिए कवि को सदा सचेष्ट रहना चाहिए । सर्वथा औचित्यपूर्ण तथा यथा-
शक्ति रसाविर्भावक घटनाओं को ही काव्य में स्थान देना चाहिये । रसाभि-
व्यञ्जक होने के कारण ही किसी कथा की कमनीयता सिद्ध होती है। परम्परा-
गत किसी कथा के काव्य में निबन्धन करते समय कवि के द्वारा प्रस्तुत रस के
प्रतिकूल अंशों का परिवर्तन न्याय्य है ।⁴
१. इति काव्यार्थविवेको योऽयं चेतश्चमत्कृतिविधायी ।
सूरिभिरनुसृतसारैरस्मदुपज्ञो न विस्मार्यः ॥
( ध्वन्यालोक )
२. एवं च दीर्घसमासा संघटना समासानामनेकप्रकारसंभावनया कदाचित्
रसप्रतीतिं व्यवदधातीति तस्यां नात्यन्तमभिनिवेशः शोभते । विशेषतोऽभिनेयार्थे
काव्ये । ( ध्वन्यालोक )
३. विभावभावानुभावसंचार्यौचित्यचारुणः ।
विधिः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षितस्य च ॥ ( ध्वन्यालोक )
४. इतिवृत्तवशायातां त्यक्त्वाऽननुगुणां स्थितिम् ।
उत्प्रेक्ष्योऽप्यन्तराभीष्ट रसोचितकथोन्नयः ॥ ( ध्वन्यालोक )

( २५ )
प्रबन्धौचित्य के विषय में आनन्दवर्धन के सिद्धान्त अत्यन्त मार्मिक हैं। इस
सिद्धान्त के उल्लंघन से १—अङ्ग का अतिविस्तार, २—अङ्गी का अननुसन्धान,
३—अनङ्गकीर्तन, और ४--प्रकृतिविपर्यय--इन चार रस-दोषों की संभावना,
सदा बनी रहती है।
आनन्दवर्धन ने प्रकृति के औचित्य और अनौचित्य के विवेक की सीमा ध्वन्या-
लोक के तृतीय उद्योत में बड़ी मार्मिकता के साथ दिखलाई है। इसी प्रसङ्ग पर—
“अनौचित्यादृते नान्यद्, रसभङ्गस्य कारणम् ।
औचित्योपनिबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ॥”
इस कारिका की अवतारणा उन्होंने की है। इसका अर्थ है कि अनौचित्य
ही रस के विनाश का सब से बड़ा हेतु है और औचित्य का समावेश ही रस का
उत्कृष्ट उपाय है !
औचित्यतत्त्व का सुन्दरतम उपादेय मन्त्र यही है। औचित्यसिद्धान्त
का विशाल प्रासाद इसी तथ्य की दृढ़ भित्ति पर खड़ा है। परवर्ती आलंकारिकों
ने औचित्य-सिद्धान्त की जितनी व्याख्या की है वह सब इस मूल सूत्र का भाष्य-
मात्र है।
ध्वन्यालोककार ने रीति तथा वृत्ति के औचित्य का भी विचार किया है।
उनका कथन है कि भरतमुनि के द्वारा प्रदर्शित कैशिकी आदि वृत्ति अथवा उप-
नागरिका आदि रीतियाँ अनुचित रूप से निबद्ध होने पर रसभङ्ग का कारण
बनती हैं।¹ वृत्ति के विषय में उनका युक्तियुक्त कथन यह है कि रस आदि की
अनुकूलता के अनुसार शब्द और अर्थ का औचित्यपूर्ण व्यवहार ही द्विविध वृत्ति-
नाम से अभिहित होता है।²
रसौचित्य-तो ध्वन्यालोक का मुख्य विषय ही है। मुख्य रस का विवेचन
किस प्रकार से होना चाहिए ? अङ्ग रस किस प्रकार मुख्य रस का पोषक होता
है ? रसों में पारस्परिक विरोध किस प्रकार होता है ? कौन रस किस रस के
साथ किस विधि से निबद्ध होने पर अपनी विरुद्धता का परित्याग करता है—
१. यदि वा वृत्तीनां भरतप्रसिद्धानां कैशिक्यादीनां काव्यालंकारान्तर-
प्रसिद्धानाम् उपनागरिकाद्यानां वा यदनौचित्यं तदपि रसभङ्गहेतुः ।
( ध्वन्यालोक तृ० उ० )
२. रसाद्यनुगुणत्वेन व्यवहारोऽर्थशब्दयोः ।
औचित्यवान् य स्ता एव वृत्तयो द्विविधाः स्मृताः ।। (ध्वन्यालोक ३।३३)
३ औ० भू०

( २६ )
रसौचित्यविषयक इन मार्मिक सिद्धान्तों की समीक्षा ध्वन्यालोक के तृतीय उद्योत
में विस्तार के साथ की गई है।
अन्त में आनन्दवर्धन ने कवियों को उपदेश करते हुए कहा है कि वाच्य
तथा वाचक ( अर्थ तथा शब्द ) की रसानुकूल औचित्यपूर्ण योजना ही महा-
कवियों का मुख्य कर्म है।१
अभिनवगुप्त
औचित्य-तत्त्व के विश्लेषण करने में अभिनवगुप्त का भी प्रमुख स्थान है
और ऐसा होना सुसंगत भी है, क्योंकि अभिनवगुप्त औचित्य-सिद्धान्त के व्यव-
स्थापक आनन्दवर्धन के ध्वन्यालोक के भाष्यकार हैं और औचित्य को काव्य-
जीवित मानने वाले क्षेमेन्द्र के साहित्यिक गुरु हैं। ध्वन्यालोक में प्रतिपादित
औचित्य-पोषक तथ्यों तथा तर्कों को सम्यक् रूप से समझने के लिये अभिनवगुप्त-
रचित 'लोचन' टीका का अध्ययन नितान्त अपेक्षित है।
आनन्दवर्धन ने जिस अलंकारौचित्य का वर्णन अपने निबन्ध में किया है
उसका स्पष्टीकरण करते हुए लोचनकार का कथन है कि काव्य में अलंकारों का
उपयोग दो अवस्थाओं में नहीं हो सकता है--१-जब किसी अलंकार्य की सत्ता
ही न हो अथवा २-अलंकार्य की सत्ता रहने पर भी अलंकार का औचित्य
नहीं हो। शरीर में आत्मा के विद्यमान रहने पर ही आभूषणों से शोभा-सम्पादन
किया जाता है। परन्तु यदि आत्मा ही विद्यमान नहीं हो तो बाह्य आभूषणों का
संभार मृतक शरीर को भूषित करने वाले प्रसाधन के समान है।
इसी तरह वैरागी के शरीर को सोने के आभूषणों से आभूषित करना अ-
चित होने के कारण उपहासास्पद है।
इस प्रकार अभिनवगुप्त की सम्मति में काव्य के प्राणभूत रस आदि के
अभाव में अलंकारों का अलंकारत्व कथमपि सिद्ध नहीं होता और रस आदि
रहने पर भी अनुचित अलंकार भूषक न होकर दूषक ही होते हैं।२
काश्मीरी आलोचकों के समाज में वक्रोक्ति के समान औचित्य भी व्या-
१. वाच्यानां, वाचकानाञ्च यदौचित्येन योजनम् ।
रसादिविषयेणैतद् मुख्यं कर्म महाकवेः ।। ( ध्वन्यालोक ३।३२
२. तथा ह्यचेतनं शवशरीरं कटककुण्डलाद्युपेतमपि न भाति, अलंकार्य-
स्याभावात् । यतिशरीरं कटकादियुक्तं हास्यावहं भवति, अलंकार्यस्यानौचित्यात्
( लोच-

( २७ )
काव्य-तत्त्व के रूप में प्रायः बहुत पहले ही आविर्भूत हो चुका था। अलंकार के
परिशीलन से वक्रोक्ति की उत्पत्ति हुई और रसध्वनि के अध्ययन से औचित्य
का उदय हुआ। ध्वन्यालोक में औचित्य-तत्त्व के साङ्गोपाङ्ग निरूपण से अनेक
आलोचकों की दृष्टि रस से हट कर औचित्य पर जा जमी। वे लोग काव्य में
रस के महत्त्व को न मानकर औचित्य को ही काव्य की आत्मा कहने लगे।
अभिनवगुप्त का ज्ञान किये बिना औचित्य पद का प्रयोग अत्यन्त असंगत है।
औचित्य का तात्पर्य तभी बोधगम्य हो सकता है, जब जिसके प्रति इसे
उचित बतलाया जाय वह वस्तु भी वर्तमान हो। औचित्य तो एक संबन्ध-विशेष
ठहरा और उस वस्तु का ज्ञान हमें प्रथमतः अपेक्षित है जिसके साथ यह संबन्ध
स्थापित किया जा सके। यह आवश्यक वस्तु रस आदि ही है। रस आदि के
बिना औचित्य की सत्ता का प्रतिपादन कोई मूल्य नहीं रखता। रस तथा ध्वनि
के साथ औचित्य का प्रगाढ संबन्ध है। इसका निर्देश अभिनवगुप्त ने स्पष्ट
शब्दों में किया है।१
इस प्रकार रस और ध्वनि के साथ औचित्य के संबन्ध को स्थिर करने के
कारण अभिवगुप्त सदा साहित्य-जगत् में अमर रहेंगे इसमें संदेह नहीं।
भोजराज
‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ तथा ‘शृङ्गारप्रकाश’ ये दो भोजकृत अलंकारशास्त्रीय
विशाल निबन्ध परमप्रसिद्ध हैं। यद्यपि इन दोनों निबन्धों में कहीं भी स्वतन्त्र
काव्यतत्त्व के रूप में औचित्य का उल्लेख भोजराज ने नहीं किया है, तथापि
गौणरूप से औचित्य-सिद्धान्त उनके ग्रन्थों में वर्तमान है यह कथा निस्सन्दिग्ध
रूप में कही जा सकती है। कारण, उनके ग्रन्थों में दोष, गुण तथा अलंकार
के निरूपणप्रसङ्ग में ऐसे अनेक भेद बतलाये गए हैं जिनका मूल आधार यह
‘औचित्य’ ही है।
१—‘अपद’ नामक एक स्वतन्त्र दोष भोज ने माना है।२ इनके मत में पद
छह प्रकार के होते हैं—प्रकृतिस्थ, कोमल, कठोर, ग्राम्य, नागर तथा उपनागर।
१. औचित्यवती ( अतिशयोक्तिः ) जीवितमितिचेद् औचित्यनिबन्धनं
रसभावादि मुक्त्वा नान्यत् किञ्चिदस्ति इति । तदेवान्तर्भासि मुख्यं जीवितम्
इत्यभ्युपगन्तव्यम्, न तु सा । ( लोचन )
२. विभिन्नप्रकृतिस्थादिपदयुक्त्यपदं विदुः । ( स. कण्ठा. ५।२४ )

( २८ )
काव्य अथवा नाटक में वक्ता के अनुरूप ही पद होना चाहिए। ग्रामीण वक्ता
के द्वारा प्रयोग करने योग्य पदों का प्रयोग नागर वक्ता के द्वारा किया जाना
अत्यन्त अरुचिकर है। ऐसा दोष 'अपद' कहलाता है।
२--वाक्यार्थ-दोषों में जिस 'विरस' नामक दोष की चर्चा भोज ने की है
वह रसानौचित्य का एक प्रकार है। स्वयं भी वे उस दोष को अप्रस्तुत रस की
संज्ञा देते हैं। रत्नेश्वर ने ( भोज के टीकाकार ) इस स्थल पर आनन्दवर्धन के
प्रसिद्ध पद्य "अनौचित्यादृते नान्यत्" को अपनी टीका में उद्धृत किया है।
३--देश-विरोध, काल-विरोध, लोक-विरोध, अनुमान-विरोध आदि अनेक
भेदों वाला उनका 'विरुद्ध' नामक दोष अनौचित्य के ऊपर ही अवलंबित है।
अनुमान-विरोध के अन्तर्गत औचित्यविरुद्ध नामक एक नवीन दोष की उन्होंने
कल्पना की है। १
४--भोज के ग्रन्थ में वर्णित 'भाविक' नामक शब्दगुण का भी आधार यह
औचित्य ही ज्ञात होता है। कारण “हे पूर्णचन्द्रस्वरूप, वत्स, रघुनन्दन, आ-
[L15

( २९ )
दोष है, पर मत्त तथा बालक आदि की उक्ति में यह दोष नहीं माना जा
सकता १. क्योंकि यहाँ औचित्य की हानि नहीं होती ।
६--औचित्यतत्त्व पर आश्रित अनेक अलंकारों का भी वर्णन भोजराज ने
अलंकार प्रकरण में किया है। शब्दालंकार के मध्य में 'जाति' नामक
एक अलंकार का निर्देश उन्होंने किया है। शब्दालंकाररूप यह 'जाति' संस्कृत,
प्राकृत, अपभ्रंश आदि विभिन्न भाषाओं का विशिष्ट प्रकार है, जिसका उचित
अवसरों पर उचित प्रयोग कविकौशल का मुख्य प्रमाण है। अवसरविशेष पर
तथा वस्तुविशेष के लिये तदनुरूप भाषा का प्रयोग करना चाहिए। विषय,
वक्ता, देश और काल के औचित्य पर दृष्टि रख कर ही भाषा का प्रयोग कवि के
लिये सर्वथा समीचीन होता है। अवसरविशेष पर ही विभिन्न भाषाओं का
चमत्कार सहृदयों के हृदय में आनन्द का उन्मेष करता है। यज्ञ के समान
पवित्र अवसरों पर संस्कृत भाषा का ही प्रयोग उचित है। स्त्रियों के मुख से
प्राकृत भाषा का ही प्रयोग न्याय्य है। कुलीन जनों के लिये संकीर्ण भाषा का
प्रयोग गौरवाधायक नहीं होता। मूर्ख जनों को समझाने के लिये संस्कृत में
भाषण उपहासास्पद होता है। २ भाषा के प्रयोग में प्रतिपाद्य विषय के औचित्य
पर भी ध्यान देना चाहिए। अतएव भोज ने कहा है कि कोई अर्थ संस्कृत के ही
द्वारा प्रतिपाद्य हो सकता है तो कोई प्राकृत के द्वारा और कोई अपभ्रंश के द्वारा। ३
कितना गिनाया जाय ? और भी बहुत ऐसी मान्यतायें भोजराज की हैं
जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि भोजराज की दृष्टि में भी औचित्य एक
आवश्यक काव्योपादान है।
कुन्तक
कुन्तक का "वक्रोक्तिजीवित" मौलिकता तथा प्रौढ़ता के कारण संस्कृत के
१. विरोधः सकलेष्वेव कदाचित् कविकौशलात् ।
उत्क्रम्य दोषगणनां गुणवीथीं विगाहते ॥ ( १।१५६ )
समुदायार्थशून्यं यत्तदपार्थं प्रचक्षते ।
तन्मत्तोन्मत्तबालानामुक्तेरन्यत्र दुष्यति ॥ ( १।११६ )
२. न म्लेच्छितव्यं यज्ञादौ, स्त्रीषु नाप्राकृतं वदेत् ।
संकीर्णं नाभिजातेषु, नाप्रबुद्धेषु संस्कृतम् ॥ ( २।८ )
३. संस्कृतेनैव कोऽप्यर्थः, प्राकृतेनैव वा परः ।
शक्यो रचयितुं कश्चिदपभ्रंशेन जायते ॥ ( २।१० )

( ३० )

अलंकार ग्रंथों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इसके अनुसार वक्रोक्ति हो—
लोक तथा शास्त्र में प्रसिद्ध शैली से भिन्न शैली द्वारा शब्दार्थों का वैचित्र्यपूर्ण
कथन—काव्य में सबसे सारभूत पदार्थ है। इस वक्रोक्ति को काव्य का जीवित
मानने के कारण ही इनका ग्रन्थ 'वक्रोक्तिजीवित' नाम से प्रसिद्ध है।
कुन्तक के मत से काव्य का प्राण तो निश्चय ही वक्रता है, किन्तु वक्रता का
मूल आधार औचित्य ही है, क्योंकि उन्होंने स्वयं कहा है कि "पादवक्रता का
रहस्य है पद का औचित्य। कारण, उचित (यथानुरूप) कथन ही (वक्रता
का) जीवन है। वक्तव्य अर्थ के एक अंश में भी औचित्य के अभाव से काव्य-
मर्मज्ञों को आह्लादित करना संभव नहीं है।"१ कुन्तक ने अपने काव्य-लक्षण में
भी औचित्य को आधारभूत तत्त्व माना है।
शब्दार्थौ सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनि ।
बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्लादकारिणि ॥
यही उनका काव्य-लक्षण है। यहाँ काव्य के आधार रूप में शब्दार्थ का
'साहित्य' स्वीकृत किया गया है और 'साहित्य' से कुन्तक का अभिप्राय
निश्चित रूप से शब्द और अर्थ का पूर्ण सामञ्जस्य ही है, क्योंकि "समर्थ" शब्द
के अभाव में अर्थ स्वरूपतः स्फुरित होने पर भी निर्जीव-सा ही रहता है। इसी
प्रकार शब्द भी वाक्योपयोगी अर्थ के अभाव में अन्य अर्थ का वाचक होकर
वाक्य का भार-सा प्रतीत होता है"२ ऐसा उन्होंने स्वयं कहा है। इस कथन
से स्पष्ट है कि 'साहित्य' का अर्थ है शब्द और अर्थ का उचित सहभाव
अथवा संबन्ध।
कुन्तक के अनुसार मार्ग (रीति) तीन प्रकार के होते हैं—सुकुमार,
विचित्र तथा मध्यम। इन तीनों मार्गों में समान रूप से रहने३ वाले दो


१. तत्र पदस्य तावदौचित्यं वक्रतायाः परं रहस्यम्, उचिताभिधानजीवि-
त्वात्। वाच्यस्याप्येकदेशेऽप्यौचित्यविरहात् तद्विदाह्लादकारित्वहानिः।
(१ उन्मेष ५७वीं कारिका की वृत्ति)
२. तथा चार्थः समर्थवाचकाऽसद्भावे स्वात्मना स्फुरन्नपि मृतकल्प एवाव-
तिष्ठते। शब्दोऽपि वाक्योपयोगिवाच्यासंभवे वाच्यान्तरवाचकः सन् वाक्यस्य
व्याधिभूतः प्रतिभाति। (१।१७ वीं कारिका की वृत्ति)
३. एतत् त्रिष्वपि मार्गेषु गुणद्वितयमुज्ज्वलम् !
पदवाक्यप्रबन्धानां व्यापकत्वेन वर्तते ॥ (१।५७)

( ३१ )
सामान्य गुणों का उल्लेख कुन्तक ने किया है। इन दोनों गुणों के नाम क्रमशः
औचित्य और सौभाग्य रखे गए हैं। औचित्यगुण की परिभाषा करते हुए
उन्होंने कहा है कि—"जिस स्पष्ट वर्णन-प्रकार के द्वारा स्वभाव के महत्त्व का
पोषण होता है वही औचित्य नामक गुण है, इसका मूल है उचित आख्यान अर्थात्
यथानुरूप कथन¹ ।"
इस विवेचन से सिद्ध होता है कि कुन्तक औचित्य को सबसे व्यापक काव्य-
तत्त्व मानते हैं। इतना ही नहीं, वक्रोक्ति के अवान्तर भेदों में भी वे औचित्य
को आधार स्वीकार करते हैं।
वर्णविन्यास-वक्रता के विवेचन में कुन्तक ने स्पष्ट लिखा है कि वक्रतापूर्ण
वर्णयोजना अनिवार्यरूप से प्रस्तुतौचित्यशोभिनी होती है--अर्थात् काव्य में
वर्णों का विन्यास प्रस्तुत प्रसङ्ग के अनुरूप ही होना चाहिए, उससे स्वतन्त्र
नहीं² । इसी प्रकार पद-पूर्वार्ध-वक्रता तथा प्रत्ययवक्रता के अनेक प्रमुख भेद
भी औचित्यमूलक ही हैं :—( १ ) पर्यायवक्रता का आधार है उचित पर्याय का
चयन अथवा पर्यायौचित्य, ( २ ) विशेषणवक्रता का आधार है उचित विशेषण
का निर्वाचन, ( ३ ) वृत्तिवक्रता में समासरचना का औचित्य अपेक्षित होता है
और ( ४ ) लिङ्गवक्रता का आधारभूत सौन्दर्य लिङ्गप्रयोग के औचित्य पर
ही आश्रित है। इसी प्रकार प्रत्ययवक्रता के भी प्रमुख भेदों में कारक, पुरुष,
संख्या, काल, उपग्रह आदि के औचित्य का ही चमत्कार वर्तमान रहता है।
वक्रता का चतुर्थ भेद है वाक्यवक्रता जिसके दो रूप हैं :--( १ ) वस्तुवक्रता,
अर्थालंकार। इन दोनों में भी कुन्तक ने औचित्य को ही प्रमाण माना है।
वस्तुवक्रता के प्रसङ्ग में एक स्थान पर कुन्तक ने औचित्य को वस्तुवर्णन का
आधारभूत अनिवार्य सिद्धान्त घोषित किया है। स्वभावोक्ति का निराकरण
करते हुए उन्होंने लिखा है--:"स्वभाव के ( स्वरूप के ) कथन के बिना वस्तु
का वर्णक ही संभव नहीं हो सकता क्योंकि स्वभाव से रहित वस्तु निरूपाख्य
१. आञ्जसेन स्वभावस्य महत्त्वं येन पोष्यते ।
प्रकारेण तदौचित्यमुचिताख्यानजीवितम् ।। ( १।५३ )
२. वर्गान्तयोगिनः स्पर्शाद्विरुक्तास्तलनादयः ।
शिष्टाश्चरादिसंयुक्ताः प्रस्तुतौचित्यशोभिनः ।। ( २।२ )

( ३२ )

( असत्कल्प ) हो जाती है¹ ।" कहने की आवश्यकता नहीं कि यह स्वभावकथन
क्षेमेन्द्र के 'सदृशं किल यस्य यत्' अर्थात् यथानुरूप वर्णन से मूलतः अभिन्न है ।
ऐसे ही अर्थालंकार के प्रयोग में भो औचित्य ही प्रमाण है । कुन्तक के मत से
अलंकारों का वर्ण्य-विषय के अनुरूप उचित प्रयोग ही वांछनीय है, क्योंकि उनके
विचार से “वाच्य अलंकार उपमा आदि का अधिक उपयोग उचित नहीं हो
सकता । कारण यह है कि उससे स्वाभाविक सौन्दर्य के अतिशय में मलिनता
आने का भय रहता है² ।"
यह अनधिक प्रयोग वास्तव में अलंकारौचित्य का ही दूसरा नाम है । इसके
अतिरिक्त दोपक आदि कतिपय अलंकारों के प्रसङ्ग में कुन्तक ने औचित्य का
स्पष्ट उल्लेख भी किया है—"औचित्य के अनुरूप सुन्दर और सहृदयों के
आह्लादकारक ( प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत ) पदार्थों के अप्रकट अर्थात् प्रतीयमान
धर्म को प्रकाशित करने वाला अलंकार दीपक है³ ।" अन्त में प्रकरण तथा
प्रबन्धवक्रता के प्रसङ्ग में भी कुन्तक ने अनेक प्रकार से औचित्य की स्तुति
की है । उदाहरण के लिए प्रबन्धवक्रता का एक प्रमुख भेद है उत्पाद्यलावण्य,
जिसके दो रूप हैं :-- ( १ ) अविद्यमान की कल्पना ( २ ) विद्यमान का
संशोधन । इन दोनों वक्रताभेदों का आधार स्पष्ट रूप से औचित्य-कल्पना ही
है । कवि अपनी प्रसिद्ध कथा के अनौचित्य के परिहार और औचित्य के संरक्षण
के निमित्त ही उपर्युक्त चमत्कारपूर्ण पद्धतियों का प्रयोग करता है । कुन्तक ने
स्पष्ट शब्दों में इस तथ्य को स्वीकार किया है । "उत्पाद्यलावण्य के दो रूप
हैं—( १ ) अविद्यमान की कल्पना और ( २ ) सहृदय के आह्लाद के निमित्त
औचित्यरहित विद्यमान का अन्यथा प्रतिपादन ४ ।" उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है
कि वक्रोक्ति तथा औचित्य में घनिष्ठ संबन्ध है ।
१. स्वभावव्यतिरेकेण वक्तुमेव न युज्यते ।
वस्तु तद्रहितं यस्मान्निरुपाख्यं प्रसज्यते ॥ ( १।१२ )
२. तदिदमुक्तं भवति यदेवंविधे भावस्वभावसौकुमार्यवर्णनप्रस्तावे भूयसा
न वाच्यालंकाराणामुपमादीनामुपयोगयोग्यता संभवति, स्वभावसौकुमार्यातिशय-
म्लानताप्रसङ्गात् । ३।१ कारिका की वृत्ति ।
३. औचित्यावहमम्लानं तद्विदाह्लादकारणम् ।
अशक्तं धर्ममर्थानां दीपयद् वस्तु दीपकम् ॥ ( ३।१७ )
४. उत्पाद्यलावण्यमिति द्विधा व्याख्येयम् । क्वचिदसदेवोत्पाद्यम् अथवा

( ३३ )
महिमभट्ट
यद्यपि महिमभट्ट ने आनन्दवर्धन के द्वारा स्थापित ध्वनि-पदार्थ का खण्डन
कर रस आदि व्यङ्ग्य अर्थों को अनुमेय सिद्ध करने के उद्देश्य से अपने प्रसिद्ध
ग्रन्थ व्यक्तिविवेक का निर्माण किया है, तथापि इस मुख्य विषय के उपपादन-
क्रम में अनेक काव्य-सिद्धान्तों का उल्लेख उन्होंने किया है। ऐसी स्थिति में यदि
हम काव्यसम्बन्धी व्यापक तत्त्व औचित्य का भी विश्लेषण व्यक्तिविवेक में
पाते हैं तो यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। व्यक्तिविवेककार ने प्रसङ्गवश
एक जगह लिखा है कि—"औचित्य एक ऐसा काव्यतत्त्व है को काव्य-स्वरूप के
निरूपण की महिमा से स्वतःसिद्ध है, अतः पृथक् उसकी चर्चा व्यर्थ है।
विभाव, अनुभाव और संचारीभाव का वर्णन करना ही कवि का कर्तव्य है,
दूसरा नहीं। वे ही विभावादि शास्त्रानुगार कवि के द्वारा उपनिबद्ध होने पर
रसाभिव्यक्ति के हेतु होते हैं, अन्यथा नहीं। काव्य की आत्मा है रस,
फिर उसमें अनौचित्य के स्पर्श की संभावना भी कैसे हो सकती है? जब
अनौचित्य की काव्य में संभावना ही नहीं तब उसको हटाने के लिये जो
पण्डितगण भिन्न-भिन्न तरह के काव्यलक्षणों की सृष्टि करते हैं वह सर्वथा
व्यर्थ है१। इस प्रतिपादन से सिद्ध होता है कि महिमभट्ट काव्य में औचित्य के
समर्थक थे। प्रसङ्गान्तर्गत उनकी उक्तियों से भी इस बात की पुष्टि होती है।
महिमभट्ट का दोषविवेचन बड़ा प्राञ्जल है। इस प्रसङ्ग पर उन्होंने कहा है कि
“अनौचित्य ही काव्य का एकमात्र सर्वातिशायी दोष है जिसके अन्तर्गत समस्त
दोषों का अन्तर्भाव किया जा सकता है। अनौचित्य का सामान्य लक्षण है कवि
के द्वारा वाञ्छित रस आदि की प्रतीति में विघ्नकारी होना२।” आगे चलकर
आहृतम्, क्वचिदौचित्यत्यक्तं सदप्यन्यथासम्पाद्यम् सहृदयहृदयाह्लादनाय। (४।४
वी कारिका की वृत्ति।)
१. तस्य (अनौचित्यस्य) काव्यस्वरूपनिरूपणसामर्थ्यसिद्धस्य पृथगुपादान-
वैयर्थ्यात्। विभावाद्युपनिबन्ध एव हि कविब्यापारो नापरः। ते च यथाशास्त्र-
मुपनिबध्यमानारसाभिव्यक्तेर्निबन्धनभावं भजन्ते, नान्यथा। रसात्मकं च काव्य-
मिति कुतस्तत्रानौचित्यस्पर्शः संभाव्यते, यन्निरासार्थमित्थं काव्यलक्षणमाचक्षीरन्
विचक्षणम्मन्याः। (व्य० वि० पृ० १२६)
२. एतस्य (अनौचित्यस्य) विवक्षितरसादिप्रतीतिविघ्नविधायित्वं नाम
सामान्यलक्षणम्। (व्य. वि., उन्मेष २, पृ. १५२)

पुनः उन्होंने कहा है कि—"दो प्रकार के अनौचित्य काव्य में हो सकते हैं—
( १ ) अर्थविषयक और ( २ ) शब्दविषयक । उन दोनों में प्रथम—अर्थात्
अर्थविषयक अनौचित्य का लक्षण है विभावादिकों का रसों में अयथायथ
( प्रतिकूलतापूर्ण ) निवेश । यही अनौचित्य अन्तरङ्ग है और इसका विवेचन
प्राचीन आचार्यों ने ही कर दिया है, अतः मैं अपने ग्रन्थ में उसका विस्तार नहीं
करना चाहता ।
दूसरा—अर्थात् शब्दविषयक अनौचित्य के बहुत प्रकार हो सकते हैं, जैसे—
विधेयाविमर्श, प्रक्रममेद, क्रमभेद, पौनरुक्त्य और वाच्यावचन १ ।
रस तथा औचित्य के विषय में महिमभट्ट आनन्दवर्धन के ही अनुयायी हैं ।
आनन्दवर्धन के समान महिमभट्ट ने भी अनौचित्य को प्रधान दोष स्वीकार किया
है । समग्र दोष रस के व्याघातक होते हैं । इसीलिये महिमभट्ट ने रसानौचित्य
अन्तर्गत समस्त दोष प्रकरण का समावेश कर दिया है२ । इन सभी विवेचनों
से वही एक बात पुष्ट होती है कि महिमभट्ट के भी विचारानुसार औचित्य
काव्य का सर्वातिशायी उपादान है ।
क्षेमेन्द्र
ऐतिहासिक क्रम से महिमभट्ट के बाद ही औचित्य के आधार पर एक
नवीन सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य क्षेमेन्द्र ने इस धराधाम में पदार्पण किया
और अमरभारती के भण्डार को विविध ग्रन्थरत्नों से परिपूर्ण करने में अपने
जीवनकाल का उपयोग किया । औचित्यविचारचर्चा इन्हीं की अमर कृति है
१. इह खलु द्विविधमनौचित्यमुक्तम्, अर्थविषयं शब्दविषयं चेति । त
विभावानुभावव्यभिचारिणाम् अयथायथं रसेषु यो विनियोगः तन्मात्रलक्षणमेव
मन्तरङ्गमाचार्यैरेवोक्तमिति नेह प्रतन्यते । अपरं पुनः बहिरङ्गं बहुप्रकारं संभवति
तद्यथा विधेयाविमर्शः, प्रक्रमभेदः, क्रमभेदः, पौनरुक्त्यं, वाच्यावचनञ्चेति ।
( व्य० वि०, उ० २ पृ० १४९-५१
२. कथञ्चिद्वा भिन्नक्रमतयापि अभिमतार्थसंबंधोपकल्पने प्रस्तुतार्थप्रतीतौ
विघ्नितत्वात् तन्निबन्धनो रसास्वादोऽपि विघ्नितः स्यात्, शब्ददोषाणा
अनौचित्योपगमात् तस्य च रसभङ्गहेतुत्वात् । यदाहुः--
अनौचित्यादृते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम् ।
प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत् परा ॥ (व्य० पृ० १३

( ३५ )
यद्यपि औचित्यतत्त्व की उद्भावना सर्वप्रथम इन्हीं के द्वारा इसी ग्रन्थ में नहीं
हुई, अपि तु चिरकाल से सभी आचार्य अपने-अपने ग्रन्थों में थोड़ी-बहुत चर्चा
इस तत्त्व की अवश्य कर गए थे तथापि इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि
मुख्यरूप से औचित्य का साङ्गोपाङ्ग वर्णन इसी ग्रन्थ में आकर हुआ और
औचित्य-सम्प्रदाय का उदय साहित्य-संसार में इस ग्रन्थरत्न के निर्माण हो चुकने
पर ही हुआ ।
अतः क्षेमेन्द्र विदग्ध मण्डली में औचित्य के व्यवस्थापक होने से चिरस्मर-
णीय रहेंगे । औचित्यतत्त्व को काव्य के सर्वातिशायी उपादान के रूप में प्रति-
ष्ठित करने का श्रेय विज्ञ आलोचकवर्ग सदा क्षेमेन्द्र को प्रदान करता रहेगा ।
क्षेमेन्द्र से पश्चाद्भावी आलङ्कारिक
यद्यपि साहित्यिक जगत् के लिये एक प्रकार से इसे दुर्भाग्य का ही विषय
समझा जा सकता है कि क्षेमेन्द्र के द्वारा प्रवर्तित औचित्य-सम्प्रदाय को किसी
अनन्तर्भावी आचार्य ने अग्रसर नहीं किया, तथापि औचित्यतत्त्व का अपलाप
किसी ने नहीं किया है ! मम्मट १ से लेकर पण्डितराज तक की आलंकारिक
परम्परा ने भी अपने-अपने ग्रन्थों में किसी न किसी रूप से इस तत्त्व के प्रति
आस्था अवश्य प्रकट की है। खासकर दोषविवेचन के अवसर पर सभी ने
औचित्य का, निषेधमुखेनैव सही, पर स्मरण अवश्य किया है । यद्यपि यह बात
कही जा सकती है कि औचित्यतत्त्व का स्मरण करते समय इन आचार्यों के
मानसपटल पर, क्षेमेन्द्र नहीं, अपितु आनन्दवर्धन ही उदित थे और उदित थी
आनन्दवर्धन की 'अनौचित्यादृते नान्यत् रसभङ्गस्य कारणम्' यह सुविख्यात
पङ्क्ति, तथापि क्षेमेन्द्र-स्थापित सिद्धान्त-पोषकता तो उन लोगों की सिद्ध होती
ही है। मेरे कथन का उद्देश्य भी उतना ही है।
पाश्चात्त्य आलोचक और औचित्य
अब यहाँ जिज्ञासु पाठकों के लाभ को दृष्टि में रखकर, संक्षेप में, औचित्य
में संबन्ध रखने वाले पाश्चात्य आलोचकों के मतों का दिग्दर्शन कराया जा रहा
रहा है ।
पाश्चात्य साहित्य-शास्त्रकारों में प्राचीन आलोचकों ने 'औचित्य' का
१. मम्मट-क्षेमेन्द्र समकालीन थे।

( ३६ )
विचार किया है, नवीन आलोचकों ने नहीं। प्राचीनों की भी औचित्यविषयक
आलोचना भारतीय आचार्यों की आलोचना के सामने नगण्य-सी है, क्योंकि
पाश्चात्यों की आलोचना के अनुसार 'औचित्य' काव्य का बहिरङ्ग साधन मात्र
है और भारतीयों की आलोचना के अनुसार वह काव्य का ही नहीं, अपितु सकल
ललित कलाओं का अन्तरङ्ग साधन है--प्राण है।
पाश्चात्यों ने प्रकृत्यौचित्य, घटनौचित्य, वर्णौचित्य—आदि औचित्य के
कतिपय प्रकारों का ही विवेचन किया है जो काव्य के बहिरङ्ग साधन हैं। उन
लोगों की पहुँच रस तक प्रायः नहीं हो सकी, अतः वे उक्त बहिरङ्ग तत्त्वों में
ही उलझे रहे। फलतः उनकी औचित्यसमीक्षा उतनी मौलिक अथच गूढ़ नहीं
हो सकी, जितनी रसवादी भारतीयों की।
औचित्य के ऊपर प्रकाश डालने वाले पाश्चात्य आलोचकों में अरस्तू
लाञ्जिनस, होरेस और पोप के नाम विशेषरूप से लिए जा सकते हैं।
अरस्तू के दो ग्रन्थ पाश्चात्य आलोचना-जगत् में परम प्रसिद्ध हैं--(१)
पोएटिक्स तथा (२) रेटारिक। दोनों ही ग्रन्थों में औचित्य-तत्त्व की समीक्षा की
गई है।
(१) नाटक का दृश्य वास्तविक होना चाहिए, काल्पनिक नहीं, जिससे द्रष्टा
को उन दृश्यों के देखते समय असत्यता का भान नहीं हो। इस प्रसङ्ग पर अरस्तू
का कथन है कि "नाटक में जो दृश्य दिखलाये जाँय उन्हें उचित होना चाहिए।
उचित घटनाओं के प्रदर्शन से ही नाटककार की अभीष्ट-सिद्धि होती है। वस्तु-
जगत् से असंबद्ध घटनाओं का प्रदर्शन नाटक में सर्वथा वर्जनीय होता है।१"
यह है अरस्तू का घटनौचित्य।
(२) पद्य को ललित बनाने के अनेक उपाय हैं, परन्तु गद्य को सुन्दर
बनाने का एकमात्र उपाय रूपक की योजना है, ऐसा अरस्तू मानते हैं। साथ-
साथ यह भी मानते हैं कि रूपक को औचित्य-युक्त होना चाहिए, क्योंकि
अनौचित्यपूर्ण रूपक गद्य का भूषण नहीं, दूषण हो जाता है। "वर्णनीय वस्तु
की उत्कृष्टता दिखलाने के लिये तज्जातीय उत्कृष्ट गुणयुक्त वस्तु के साथ और
निकृष्टता दिखलाने के लिये हीनगुणसम्पन्न वस्तु के साथ रूपक बाँधना
चाहिए।२" यह है अरस्तू का रूपकौचित्य।
१. देखिए—पोएटिक्स, पृ० ६१
२. देखिए—अरस्तू : रिटॉरिक, पृ० २३२

( ३७ )
(३) भाषणकला के कुछ नियम हैं भाषण की शैली भावद्योतक तथा
नीतिपूर्ण होनी चाहिए । साथ ही विषय के अनुरूप होनी चाहिए । अनुरूप-शैली
से अभिप्राय है कि¹--विषय के उदात्त होने पर रचनाप्रकार को क्षुद्र नहीं होना
चाहिए । विषय के साधारण होने पर रचनाप्रकार को क्षुद्र नहीं होना चाहिए ।
विषय के साधारण होने पर रचना-प्रकार को उदात्त कभी नहीं होना चाहिए ।
इसी प्रकार महत्त्वहीन शब्द के संबन्ध में अलंकृत तथा विचित्र विशेषणों का
प्रयोग सर्वथा अनुचित होता है । अतः भाषण करते समय अथवा लिखते समय
विषय की अनुरूपता का ध्यान अवश्य रखना चाहिए । यह है अरस्तू का
विषयौचित्य ।
(४) अरस्तू ने 'रेटारिक' के तृतीय खण्ड के सप्तम परिच्छेद में 'औचित्य'
( Propriety ) का विस्तृत वर्णन किया है । वक्ता को श्रोतृ-हृदय-वशीकरण-
रूप निजोद्देश्य को सिद्ध करने के लिये अपने मनोभावों का प्रभाव श्रोताओं के
ऊपर डालना पड़ता है । श्रोताओं के हृदय को वशीभूत करने का मुख्य उपाय
है रसानुकूल भाषा का प्रयोग² । अनादर-भावाभिव्यञ्जन के लिये क्रोधपूर्ण
भाषा का प्रयोग करना चाहिए । क्षुद्रता की अभिव्यक्ति के लिये वक्ता को उस
( क्षुद्र वस्तु ) का नाम ग्रहण भी नहीं करना चाहिए । प्रशंसनीय वस्तु के वर्णन
में भाषा भी तदनुरूप होनी चाहिए । हार्दिक भावों की अभिव्यक्ति भाषा के
द्वारा ही होती है । अतः भाव तथा भाषा में अनुरूपता नितान्त अपेक्षित है । इन
दोनों का सामञ्जस्य ही वक्ता तथा लेखकों की सफलता का रहस्य है ।
लाङ्गिनस ( २१३ ई०-२७३ ई० ) द्वारा रचित ग्रन्थ On the
Sublime पाश्चात्य आलोचनाशास्त्र का मौलिक ग्रन्थ माना जाता है । वे
कविता में ही नहीं, अपितु समग्र ललित कलाओं में चमत्कृतिजनक वस्तु—
'भव्यता' ( Sublimity ) को मानते हैं । इस भव्यता के विधान के विविध
प्रकारों के विवेचन-क्रम में ही उन्होंने औचित्य का भी विचार किया है ।
(१) लाङ्गिनस अलंकारों के द्वारा भी काव्य में भव्यता का उदय मानते
हैं । अलंकार शब्द तथा अर्थ को सुन्दर बनाते हुए काव्य में भव्यता के प्रधान
कारण होते हैं । अलंकार और भव्यता में परस्परोपकार्योपकारकभाव सा होता
१. देखिए--रिटॉरिक, खण्ड ३, परि० ७, पृ० २४५
२. देखिए--रिटॉरिक, खण्ड ३, परि० ७, पृ० २४५

है--अलंकार भव्यता का वर्धक होता है और भव्यता से अलंकार की चमत्कृति
चौगुनी हो उठती है ।
किन्तु समस्त अलंकारों में यह क्षमता नहीं रहती है । जिनको सत्ता पृथक्
रूप से पाठकों को भासित नहीं हो वे ही अलंकार काव्य में श्रेष्ठ समझे जा सकते
हैं । अलंकारों की अलंकारत्वभावना यदि पाठक के ध्यान में नहीं आवे तो
वही अलंकार सुन्दरतम प्रतीत होता है । लाङ्गिनस का यह अलंकारौचित्य बहुत
कुछ आनन्दवर्धन के 'अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यः सोऽलंकारो ध्वनौ मतः' से समानता
रखता है ।
(२) लाङ्गिनस ने शब्दौचित्य पर अधिक ध्यान दिया है । उचित शब्दों के
चुनाव पर कविता का प्रभाव विशेषरूप से अवलम्बित रहता है । उचित पद-
विन्यास से काव्य अथवा भाषण में जीवनीशक्ति की वृद्धि होती है । जिस
काव्य अथवा भाषण में जितनी अधिक सप्राणता होगी वह उतना ही अधिक
पाठकों अथवा श्रोताओं को चमत्कृत-प्रभावित कर सकेगा । शब्दौचित्य की महिमा
विलक्षण होती है । सुन्दर तथा उचित शब्द अर्थ का वास्तविक आलोक है ।
उचित अर्थ की अभिव्यक्ति करने की योग्यता उचित शब्द ही में रहती है ।
परन्तु कवि को इस विषय में सदा सावधान रहना चाहिए कि भव्य तथा
माहात्म्यमण्डित शब्दों का प्रयोग भव्य विषय के वर्णन में ही किया जाय । यदि
भव्य पद का प्रयोग तुच्छ--अभव्य पदार्थ के वर्णन में किया जायगा तो वह
उपहासास्पद होता है ।
इस प्रकार लाङ्गिनस काव्य में औचित्य के प्रबल पक्षपाती हैं । उनके
विचार से शब्दौचित्य का विधान काव्य में सौन्दर्य, शक्ति, प्रभाव, महत्त्व तथा
भव्यता का उत्पादक होता है तथा अन्य आवश्यक काव्यगुण का भी उदय स्वतः
हो जाता है ।
होरेस (६५ ई० पू०-८ ई० पू०)--लैटिन भाषा के अति लोकप्रिय कवि
हैं । आलोचना के विषय में इनकी प्रसिद्ध पुस्तक है--Art Poetica-Art of
Poetry--'काव्यकला' । यह अपूर्ण ग्रन्थ है । फिर भी काव्यविवेचना में यह
ग्रन्थ अप्रतिम समझा जाता है । होरेस 'औचित्य' के परम पुजारी हैं । इन्होंने
कवियों को लक्ष्य कर तीन उपदेश दिये हैं-- ( १ ) ग्रीक आदर्शों का अनुकरण
करो, ( २ ) पात्र के स्वरूप की रक्षा करो तथा ( ३ ) औचित्य के संरक्षण

( ३९ )
पर सर्वाधिक ध्यान दो। औचित्य के विषय में होरेस के सिद्धान्त भरत के
नाट्यशास्त्र में प्रतिपादित अनेक तथ्यों के साथ पूर्ण सादृश्य रखते हैं। होरेस
नाटक अथवा काव्य के कथानक के विषय में अपना मन्तव्य प्रकट करते हुए
लिखते हैं कि कविपरम्परागत अथवा नवकल्पित—दोनों प्रकार के कथानकों का
ग्रहण कर सकता है, पर परम्परागत कथानक के ग्रहण करने पर उस परम्परा
का विधिवत् पालन करना चाहिए और नवीन कथानक की कल्पना में इस बात
पर ध्यान रखना चाहिए कि जो पात्र प्रथमबार जिस रूप में अङ्कित किया जाय
उस पात्र के उस रूप का निर्वाह अन्त तक हो। उग्र रूप में अवतीर्ण पात्र का
स्वरूप-निर्वाह अन्त तक उसकी उग्रता की रक्षा करने में ही होता है। दया का
अवतार पात्र यदि दानवता का नग्न नर्तन करने लगे तो वह अपने स्वरूप से
अत्यन्त च्युत हो जाता है१। होरेस का यह नियम भरत के 'प्रकृत्यौचित्य' के
अन्तर्गत आता है।
होरेस ने अभिनय-कला के विषय में बड़ा ही मार्मिक विवेचन किया है।
उनका कथन है कि अभिनय एक विशिष्ट कला है और इसमें औचित्य का
आश्रय प्रधान है। दुःखद शब्दों के उच्चारण करते समय अभिनेता का चेहरा
उदास होना चाहिए, डाट-डपट करते समय उसकी मुखमुद्रा क्रुद्ध की-सी होनी
चाहिए, हँसी की वार्ता में चेहरा खिलता होना चाहिए और गम्भीर वार्ता
के लिये मुखमंडल को गंभीरता नितान्त आवश्यक है। होरेस का यह
अभिनयोचित्य है।
अभिनय रङ्गमञ्च पर वस्तु के प्रदर्शन से अथवा वस्तु के कथन से आरम्भ
होता है। परन्तु कौन वस्तु रङ्गमञ्च के ऊपर अभिनययोग्य है ? कौन-सी
नेपथ्यगृह से सूचनीय है ? इसके लिए कवि को सदा सावधान रहना चाहिए।
जो घटना दर्शकों के चित्त में घृणा अथवा अश्लीलता का भाव उत्पन्न कर
सकती है उसका प्रदर्शन किसी भी प्रकार से उचित नहीं माना जा सकता।
मीड़िया के द्वारा अपने पुत्रों का वध क्या कभी रङ्गमञ्च के ऊपर दर्शकों के
समक्ष अभिनीत किया जा सकता है ? कारण स्पष्ट है—अनौचित्य। होरेस का
यह नियम क्षेमेन्द्र का घटनौचित्य है। संस्कृत के आलोचकों में भरत से लेकर
विश्वनाथ तक—सभी नाट्यवस्तु के दो प्रकार मानते हैं—एक 'संसूच्य' तथा
१. देखिए--होरेस : आर्ट ऑफ पोयट्री।

( ४० )
दूसरा 'दृश्य'। पहली की केवल अर्थोपक्षेपक के द्वारा सूचना दी जाता है, परन्तु
दूसरी घटना रङ्गमञ्च के ऊपर अभिनीत होती १ है ।
इसके अतिरिक्त होरेस ने छन्दों के औचित्य की भी चर्चा की है । इस
प्रकार ग्रीक आलोचकों ने औचित्य ( Propriety ) की कमनीयता ललित
कलाओं में पर्याप्तरूप से स्वीकृत की है । सचमुच यूनानी आलोचनापद्धति
( Classical Criticism ) का सर्वस्व औचित्य रहा है ।
महाकवि पोप ने भी औचित्य के अनेक प्रकारों को अपने आलोचना-ग्रन्थ
में स्थान दिया है । पोप का ग्रंथ ( Essay of Criticism ) प्राचीन मान्य
सिद्धान्तों का पद्यबद्ध समुच्चय है । इनमें वर्णौचित्य के ऊपर उन्होंने बहुत
जोर दिया है । उनका कथन है कि कविता में केवल उद्वेगकारी कर्णकटुता
का अभाव ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता, अपितु वर्ण्य अर्थ की प्रतिध्वनि
अवश्य होनी चाहिए । मलयानिल के बहने के अवसर पर प्रयुक्त शब्दों में
सुकुमारता तथा कोमलता होनी चाहिए, मन्द लहरिका का प्रवाह कोमल पदों
में प्रवाहित होता है, परन्तु जब प्रचण्ड झंझावात से आन्दोलित भीषण तरङ्ग
तटों पर टकराता है; तब ओजस्वी पद्य भी तुमुल प्रवाह की तरह घोर गंभीर
गर्जन करता है । पोप का अभिप्राय है कि वर्णनीय वस्तु तथा तत्प्रतिपादक
शब्दों में मधुर सामञ्जस्य होना चाहिए । पोप का यह काव्यतत्त्व होगा-आनन्द-
वर्धन का वर्णध्वनि, कुन्तक का वर्णवक्रता तथा क्षेमेन्द्र का वर्णौचित्य । एक ही
तत्त्व भिन्न-भिन्न आलंकारिकों की कल्पना में भिन्न-भिन्न अभिधान से अभिव्यक्त
किया गया है ।
ऊपर के विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है कि औचित्य-तत्त्व की महत्ता जिस
तरह भारतीय आलोचकों ने स्वीकार की है उसी तरह पाश्चात्य आलोचकों
भी । अन्तर केवल यह है कि पाश्चात्य आलोचना-पद्धति में रस-सत्ता के प्रति-
पादन नहीं होने से औचित्य काव्य का एक बहिरङ्ग उपादान के रूप में अङ्गीकृत
१. द्वेधा विभागः कर्तव्यः सर्वस्यापीह वस्तुनः ।
सूच्यमेव भवेत् किञ्चिद् दृश्यश्रव्यमथापि वा ॥
नीरसोऽनुचितस्तत्र संसूच्यो वस्तुविस्तरः ।
दृश्यस्तु मधुरोदात्तरसभावनिरन्तरः ॥
( दशरूपक १।५६, ५७ )