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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 256 में से

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पृष्ठ 29

( २५ )
प्रबन्धौचित्य के विषय में आनन्दवर्धन के सिद्धान्त अत्यन्त मार्मिक हैं। इस
सिद्धान्त के उल्लंघन से १—अङ्ग का अतिविस्तार, २—अङ्गी का अननुसन्धान,
३—अनङ्गकीर्तन, और ४--प्रकृतिविपर्यय--इन चार रस-दोषों की संभावना,
सदा बनी रहती है।
आनन्दवर्धन ने प्रकृति के औचित्य और अनौचित्य के विवेक की सीमा ध्वन्या-
लोक के तृतीय उद्योत में बड़ी मार्मिकता के साथ दिखलाई है। इसी प्रसङ्ग पर—
“अनौचित्यादृते नान्यद्, रसभङ्गस्य कारणम् ।
औचित्योपनिबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ॥”
इस कारिका की अवतारणा उन्होंने की है। इसका अर्थ है कि अनौचित्य
ही रस के विनाश का सब से बड़ा हेतु है और औचित्य का समावेश ही रस का
उत्कृष्ट उपाय है !
औचित्यतत्त्व का सुन्दरतम उपादेय मन्त्र यही है। औचित्यसिद्धान्त
का विशाल प्रासाद इसी तथ्य की दृढ़ भित्ति पर खड़ा है। परवर्ती आलंकारिकों
ने औचित्य-सिद्धान्त की जितनी व्याख्या की है वह सब इस मूल सूत्र का भाष्य-
मात्र है।
ध्वन्यालोककार ने रीति तथा वृत्ति के औचित्य का भी विचार किया है।
उनका कथन है कि भरतमुनि के द्वारा प्रदर्शित कैशिकी आदि वृत्ति अथवा उप-
नागरिका आदि रीतियाँ अनुचित रूप से निबद्ध होने पर रसभङ्ग का कारण
बनती हैं।¹ वृत्ति के विषय में उनका युक्तियुक्त कथन यह है कि रस आदि की
अनुकूलता के अनुसार शब्द और अर्थ का औचित्यपूर्ण व्यवहार ही द्विविध वृत्ति-
नाम से अभिहित होता है।²
रसौचित्य-तो ध्वन्यालोक का मुख्य विषय ही है। मुख्य रस का विवेचन
किस प्रकार से होना चाहिए ? अङ्ग रस किस प्रकार मुख्य रस का पोषक होता
है ? रसों में पारस्परिक विरोध किस प्रकार होता है ? कौन रस किस रस के
साथ किस विधि से निबद्ध होने पर अपनी विरुद्धता का परित्याग करता है—
१. यदि वा वृत्तीनां भरतप्रसिद्धानां कैशिक्यादीनां काव्यालंकारान्तर-
प्रसिद्धानाम् उपनागरिकाद्यानां वा यदनौचित्यं तदपि रसभङ्गहेतुः ।
( ध्वन्यालोक तृ० उ० )
२. रसाद्यनुगुणत्वेन व्यवहारोऽर्थशब्दयोः ।
औचित्यवान् य स्ता एव वृत्तयो द्विविधाः स्मृताः ।। (ध्वन्यालोक ३।३३)
३ औ० भू०