औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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रसौचित्यविषयक इन मार्मिक सिद्धान्तों की समीक्षा ध्वन्यालोक के तृतीय उद्योत
में विस्तार के साथ की गई है।
अन्त में आनन्दवर्धन ने कवियों को उपदेश करते हुए कहा है कि वाच्य
तथा वाचक ( अर्थ तथा शब्द ) की रसानुकूल औचित्यपूर्ण योजना ही महा-
कवियों का मुख्य कर्म है।१
अभिनवगुप्त
औचित्य-तत्त्व के विश्लेषण करने में अभिनवगुप्त का भी प्रमुख स्थान है
और ऐसा होना सुसंगत भी है, क्योंकि अभिनवगुप्त औचित्य-सिद्धान्त के व्यव-
स्थापक आनन्दवर्धन के ध्वन्यालोक के भाष्यकार हैं और औचित्य को काव्य-
जीवित मानने वाले क्षेमेन्द्र के साहित्यिक गुरु हैं। ध्वन्यालोक में प्रतिपादित
औचित्य-पोषक तथ्यों तथा तर्कों को सम्यक् रूप से समझने के लिये अभिनवगुप्त-
रचित 'लोचन' टीका का अध्ययन नितान्त अपेक्षित है।
आनन्दवर्धन ने जिस अलंकारौचित्य का वर्णन अपने निबन्ध में किया है
उसका स्पष्टीकरण करते हुए लोचनकार का कथन है कि काव्य में अलंकारों का
उपयोग दो अवस्थाओं में नहीं हो सकता है--१-जब किसी अलंकार्य की सत्ता
ही न हो अथवा २-अलंकार्य की सत्ता रहने पर भी अलंकार का औचित्य
नहीं हो। शरीर में आत्मा के विद्यमान रहने पर ही आभूषणों से शोभा-सम्पादन
किया जाता है। परन्तु यदि आत्मा ही विद्यमान नहीं हो तो बाह्य आभूषणों का
संभार मृतक शरीर को भूषित करने वाले प्रसाधन के समान है।
इसी तरह वैरागी के शरीर को सोने के आभूषणों से आभूषित करना अ-
चित होने के कारण उपहासास्पद है।
इस प्रकार अभिनवगुप्त की सम्मति में काव्य के प्राणभूत रस आदि के
अभाव में अलंकारों का अलंकारत्व कथमपि सिद्ध नहीं होता और रस आदि
रहने पर भी अनुचित अलंकार भूषक न होकर दूषक ही होते हैं।२
काश्मीरी आलोचकों के समाज में वक्रोक्ति के समान औचित्य भी व्या-
१. वाच्यानां, वाचकानाञ्च यदौचित्येन योजनम् ।
रसादिविषयेणैतद् मुख्यं कर्म महाकवेः ।। ( ध्वन्यालोक ३।३२
२. तथा ह्यचेतनं शवशरीरं कटककुण्डलाद्युपेतमपि न भाति, अलंकार्य-
स्याभावात् । यतिशरीरं कटकादियुक्तं हास्यावहं भवति, अलंकार्यस्यानौचित्यात्
( लोच-